काली शाम और ठंडी पड़ी रहीं रात की थालियां : कोतमा बस स्टैंड पर गूंज रहीं चीखें, SDRF के जवानों के छिल गए हाथ, देखिए खूनी मंजर की 15 तस्वीरें
4 अप्रैल, शाम 5:30 बजे। कोतमा बस स्टैंड की वह शाम, जहाँ हर दिन सैकड़ों सपने आते-जाते थे, अचानक कयामत में बदल गई। चार मंजिला अग्रवाल लॉज – वही लॉज जिसकी छाँव में दुकानदार अपनी दुकानें सजाते थे, वही लॉज जिसकी सीढ़ियों पर मजदूर हर सुबह चढ़ते थे – एक सेकंड में जमींदोज हो गया।
पहले एक गहरी दरार की आवाज़, फिर ऐसा धमाका मानो आसमान फट गया हो। और फिर धूल का वह तूफान... इतना घना कि मां अपने बच्चे को नहीं पहचान पाई, पति अपनी पत्नी का हाथ नहीं पकड़ पाया। जब धूल छंटी, तो लॉज वहाँ नहीं था। सिर्फ कंक्रीट, सरिया, टूटी टाइलें और मिट्टी का ढेर था – जिसके नीचे दब गई थीं कितनों की साँसें।

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चीखें जो अब भी कानों में गूंजती हैं
मलबे के नीचे से आवाज़ें आ रही थीं। कोई कराह रहा था, कोई फुसफुसा रहा था, कोई पूरी ताकत से चीख रहा था – "बचाओ... बचाओ... कोई तो बचाओ।" एक महिला अपने पति को पुकार रही थी – "सुनील... सुनील... बोलो तो सुनील..." उसकी आँखों से पानी बह रहा था, हाथ मलबा हटा रहे थे, खून निकल आया पर उसे पता ही नहीं चला।
प्रत्यक्षदर्शी अरुण सोनी ने कहा – "बिल्डिंग एकतरफा गड्ढे की ओर गिरी, पूरा इलाका धुआँ-धुआँ हो गया, और मलबे के अंदर से चीखने की आवाजें अब भी आ रही हैं।" उस रात कोतमा में कोई सोया नहीं। हर किसी के कानों में वही चीखें गूंज रही थीं – बचाओ... बचाओ...
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दो मजदूर, दो कहानियां, दो ही मौत
हनुमान दीन यादव, 55 साल। टाइल्स लगाने वाला एक साधारण मजदूर। उसकी उँगलियाँ सीमेंट से सख्त हो चुकी थीं, उसकी पीठ दर्द से टूट रही थी, पर वह रोज़ चौथी मंजिल पर चढ़ता था। उसकी पत्नी उसके लिए रात का खाना बनाकर रखती थी, उसके बच्चे पिता के लौटने का इंतजार करते थे। हादसे के वक्त वह चौथी मंजिल पर था। जब शव मिला, तो मुंह से खून बह रहा था, शरीर की हर हड्डी टूट चुकी थी।
उसके चेहरे पर दर्द और हैरानी दोनों थीं – जैसे वह सोच रहा हो, "मैं तो घर जा रहा था, मेरा खाना ठंडा हो रहा होगा।" और राम कृपाल यादव, 40 साल, फुनगा वाला। एक और गरीब मजदूर, जो दो वक्त की रोटी के लिए अपनी जान की परवाह नहीं करता था। उनके शव मॉर्च्यूरी में रखे हैं। ठंडे बॉडी बैग में लिपटे, अकेले, चुप। बाहर उनके घरों में माँ-बीवी-बच्चे अभी भी इंतजार कर रहे हैं – वह इंतजार जो अब कभी खत्म नहीं होगा।
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वह गड्ढा जो काल बन गया
यह हादसा कोई भूकंप नहीं था। कोई बाढ़ नहीं थी। कोई आसमानी आफत नहीं थी। यह इंसानी लापरवाही थी – जिसने दो जानें ले लीं, और कितनों को रुला दिया। लॉज के ठीक बगल में 20 बाई 50 फीट के प्लॉट पर नया निर्माण शुरू हुआ था। नींव के लिए 12 फीट गहरा गड्ढा खोदा गया। उस गड्ढे में पानी भर गया – शायद बारिश का, शायद किसी पाइप के लीक से।
उस पानी ने धीरे-धीरे लॉज की नींव को कमजोर कर दिया। जैसे दीमक लकड़ी को खोखला कर देती है, वैसे ही। नींव धँसी, इमारत झुकी, और पूरा लॉज उसी गड्ढे के अंदर समा गया। नगर पालिका उपाध्यक्ष बद्री प्रसाद ताम्रकार ने कहा – "12 फीट गहरे गड्ढे में पानी भर गया था, जिससे लॉज की नींव कमजोर हो गई।"
वह रात जो कोतमा कभी नहीं भूलेगा
पूरी रात रेस्क्यू चलता रहा। SDRF के 100 जवान, पुलिसकर्मी, आम लोग – सब मलबा हटा रहे थे। हाथों से मिट्टी हटाई, उँगलियाँ छिल गईं, खून निकल आया, पर कोई रुका नहीं। तीन क्रेन और जेसीबी मशीनें रात भर चलती रहीं। दस-बारह एंबुलेंस एक के जाने के बाद दूसरी आती रहीं।
तीन घायलों को निकाला गया – उनके शरीर पर गहरे जख्म थे, आँखों में डर था, होठों पर बस एक ही शब्द था – "पानी... पानी..." उन्हें शहडोल मेडिकल कॉलेज भेजा गया। दो शव मिले – हनुमान दीन और राम कृपाल। उनके परिवार वाले अभी भी मॉर्च्यूरी के बाहर बैठे रो रहे हैं।
सीएम मोहन यादव ने दुख जताया, मुआवजे का वादा किया, पर क्या मुआवजा लौटा सकता है हनुमान दीन की उन हाथों को, जो टाइल्स लगाते थे? क्या लौटा सकता है राम कृपाल की उन आँखों को, जो हर शाम अपने बच्चों को देखने के लिए तरसती थीं?
कोतमा की उस रात ने सिखा दिया
एक छोटी सी लापरवाही, एक गड्ढा, थोड़ा सा पानी, और बस... कितनी जिंदगियाँ मिट जाती हैं। सुबह हुई, सूरज निकला, पर कोतमा बस स्टैंड पर वैसी रौनक कभी नहीं लौटेगी। वहाँ अब हर दिन हनुमान दीन और राम कृपाल की यादें रोएँगी। और मलबे के नीचे दबी वह चीखें सदियों तक गूंजती रहेंगी।
अंत में... यह सिर्फ एक खबर नहीं है। यह दो मजदूरों की पूरी दुनिया का मलबा है। यह कोतमा के उन सैकड़ों चेहरों का दर्द है,जिन्होंने उस शाम अपने अपनों को खो दिया। पढ़कर आंखें नम हो गईं न? तो सोचिए, उन लोगों का क्या हाल होगा, जिनका अपना इस मलबे में दब गया।
15 तस्वीरों में देखिए कोतमा लॉज त्रासदी
















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