पैथोलॉजी लैब का काला कारोबार, 30,000 में लाइसेंस : MP में 20,00 में किराये का डॉक्टर, डिजिटल सिग्नेचर तक बेच रहे; सिंडिकेट में मंत्री का करीबी भी
MP CG Times / Fri, Oct 16, 2026
इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट। मध्य प्रदेश में पैथोलॉजी का काला कारोबार चल रहा है। पैथोलॉजी लैब की मंजूरी के लिए 30 हजार रुपए, 20 हजार रुपए महीने में किराये का डॉक्टर और जांच पर 50% तक कमीशन।
हमारी टीम के 10 दिन के अंडरकवर स्टिंग में लैब की फाइल आगे बढ़ाने से लेकर डॉक्टर के डिजिटल सिग्नेचर और प्रदूषण NOC तक के सौदे रिकॉर्ड हुए। इस नेटवर्क में CMHO कार्यालय के कर्मचारी, बिचौलिए और एक मंत्री का करीबी भी शामिल है।
रीवा में हुई इस पड़ताल में एक अस्पताल में चक्कर आने की शिकायत पर मरीज को पीलिया, टाइफाइड और लिवर खराब होने की आशंका बताकर महंगे इलाज की सलाह देने का मामला भी सामने आया।
दो अलग-अलग लैब की रिपोर्ट में टाइफाइड बताया गया, जबकि भोपाल के CMHO डॉ. मनीष शर्मा ने रिपोर्ट में सामान्य WBC स्तर पर सवाल उठाए। हमारी टीम ने लैब की मंजूरी, डॉक्टर के डिजिटल साइन, कमीशन और जरूरी प्रमाणपत्रों की व्यवस्था से जुड़े दावों की पड़ताल की।

चक्कर आने की शिकायत पर बताया पीलिया, लिवर-किडनी खराब होने की बात कही
रीवा के घूमा स्थित प्रयाग हॉस्पिटल में खुद को MBBS फिजिशियन बताने वाले यूके श्रीवास्तव ने हमारी टीम के अंडरकवर रिपोर्टर से कहा, “तुम्हें भूख नहीं लगती होगी। चेहरा पीला है। ये पीलिया की शुरुआत है। किडनी और लिवर की जांच के 800-800 रुपए लगेंगे।”
रिपोर्टर ने सिर्फ चक्कर आने की शिकायत की थी। इसके बाद श्रीवास्तव ने पांच जांचें लिखीं। करीब एक घंटे बाद आई सतगुरू पैथोलॉजी की रिपोर्ट में टाइफाइड का स्तर '320 काउंट' बताया गया, जबकि रिपोर्टर को बुखार या टाइफाइड का कोई अन्य लक्षण नहीं था।
श्रीवास्तव ने शुगर कम होने, आंतें चिपकने और लिवर खराब होने की बात कहकर रोज तीन बोतलें चढ़ाने और 10 दिन अस्पताल में इलाज कराने की सलाह दी। रोज का खर्च 1,000 से 1,200 रुपए बताया।
संदेह होने पर रिपोर्टर ने सात किलोमीटर दूर गढ़ स्थित मातेश्वरी पैथोलॉजी लैब में दोबारा जांच कराई। वहां डॉक्टर या विशेषज्ञ मौजूद नहीं था। संचालक ने खुद सैंपल लेकर रिपोर्ट दी। इस रिपोर्ट में भी टाइफाइड बताया गया।
विशेषज्ञ ने दोनों लैब की रिपोर्ट पर उठाए सवाल
हमारी टीम ने दोनों लैब की रिपोर्ट भोपाल के CMHO डॉ. मनीष शर्मा को दिखाई। उन्होंने रिपोर्ट का विश्लेषण कर उनमें संभावित गड़बड़ी पर सवाल उठाए।
डॉ. शर्मा ने कहा, “टाइफाइड के मामले में WBC (व्हाइट ब्लड सेल्स) का स्तर बढ़ सकता है। लेकिन 'सतगुरू पैथोलॉजी' (प्रयाग हॉस्पिटल से संबद्ध) और 'मातेश्वरी पैथोलॉजी' की रिपोर्ट में यह स्तर सामान्य था।”
डॉ. शर्मा ने इसे रिपोर्ट में संभावित हेरफेर का संकेत बताया। उन्होंने सवाल उठाया, “अगर डॉक्टर को लिवर और किडनी खराब होने की आशंका थी, तो उन्होंने LFT (लिवर फंक्शन टेस्ट) और KFT (किडनी फंक्शन टेस्ट) क्यों नहीं लिखे?”
लैब की फाइल आगे बढ़ाने के लिए 25 से 30 हजार रुपए की मांग
पहले स्टिंग के बाद हमारी टीम ने पड़ताल की कि ग्रामीण इलाकों में पैथोलॉजी लैब खोलने की प्रक्रिया कैसे पूरी होती है। इसके लिए रिपोर्टर पैथोलॉजी कंपनी का प्रतिनिधि बनकर रीवा के CMHO कार्यालय पहुंचा। स्टिंग के दौरान कथित रिश्वतखोरी और बिचौलियों की भूमिका से जुड़े आरोप सामने आए।
CMHO कार्यालय: कार्यवाहक CMHO डॉ. सुधाकर पांडेय ने रिपोर्टर को कार्यालय के कर्मचारी मनोज तिवारी के पास भेजा। तिवारी ने कहा कि डॉक्टर के बिना लैब नहीं चल सकती। इसके बाद उन्होंने रिपोर्टर को पास स्थित शिव जनसेवा केंद्र के संचालक मनीष से मिलने को कहा।

फाइल आगे बढ़ाने के लिए रकम की मांग: स्टिंग में मनोज तिवारी ने आवेदन की फाइल आगे बढ़ाने के बदले 25 से 30 हजार रुपए की मांग की।
जनसेवा केंद्र की भूमिका: CMHO कार्यालय से करीब 50 मीटर दूर स्थित शिव जनसेवा केंद्र के संचालक मनीष ने ऑनलाइन आवेदन कराने से लेकर डॉक्टर की व्यवस्था करने तक में मदद का दावा किया।

20 हजार रुपए महीने में डॉक्टर, घर बैठे डिजिटल सिग्नेचर
मनीष के जरिए हमारी टीम रीवा के न्यू बस स्टैंड स्थित मातेश्वरी पैथोलॉजी लैब के संचालक रामायण सिंह तक पहुंची। स्टिंग में सिंह ने डॉक्टर की व्यवस्था और कमीशन को लेकर दावे किए।

डिजिटल साइन का कथित सौदा: रामायण सिंह के मुताबिक, 20 हजार रुपए महीने पर डॉक्टर की व्यवस्था हो सकती है। डॉक्टर को लैब आने की जरूरत नहीं होती और वह घर से ही डिजिटल सिग्नेचर कर देता है। इसके लिए छह महीने का अग्रिम भुगतान यानी 1.20 लाख रुपए मांगे गए।
50% तक कमीशन का दावा: रामायण सिंह के मुताबिक, “बाजार में प्रतिस्पर्धा इतनी है कि कई लैब संचालक जांच की कुल रकम का 50% तक डॉक्टरों को कमीशन देते हैं। यानी 1,000 रुपए की जांच लिखने पर 500 रुपए कमीशन दिया जा सकता है।”
बायोमेडिकल वेस्ट प्रमाणपत्र के लिए 10 हजार और 3,500 रुपए महीने
पैथोलॉजी लैब के लिए जरूरी अन्य मंजूरियों की प्रक्रिया में भी स्टिंग के दौरान कथित भुगतान की मांगें सामने आईं।
सिविल लाइंस स्थित चित्रकिरण वेस्ट मैनेजमेंट के मैनेजर शुभम ने कथित तौर पर बायोमेडिकल वेस्ट प्रमाणपत्र के लिए 10 हजार रुपए सदस्यता शुल्क और 3,500 रुपए मासिक शुल्क मांगा। वार्षिक शुल्क 42 हजार रुपए बताया गया। शुभम ने डॉक्टर की व्यवस्था कराने का भरोसा भी दिया।

प्रदूषण विभाग की NOC के लिए 20 हजार रुपए की मांग
बायोमेडिकल वेस्ट कंपनी और मनीष के संपर्क के जरिए हमारी टीम प्रदूषण विभाग के कर्मचारी रंजीत साहू तक पहुंची। स्टिंग में साहू ने 20 हजार रुपए मांगे और दस्तावेज वॉट्सऐप पर भेजने को कहा। उसने 15 दिन में NOC मिलने का दावा किया।
साहू ने यह भी कहा कि अधिकारी जांच के लिए आएंगे, लेकिन भुगतान के बाद परेशानी नहीं होगी।

स्टिंग के बाद आरोपों पर क्या बोले संबंधित लोग?
हमारी टीम ने स्टिंग में सामने आए सभी संबंधित लोगों से आरोपों पर प्रतिक्रिया मांगी। इस दौरान कुछ लोगों ने आरोपों से इनकार किया, जबकि कुछ ने अपने पहले के दावों से अलग बात कही।
यूके श्रीवास्तव, प्रयाग हॉस्पिटल: वे पर्चे पर लिखे अस्पताल के रजिस्ट्रेशन नंबर को अपनी MBBS डिग्री का नंबर बताते रहे। भर्ती करने की सलाह पर उनका कहना था कि मरीज को कमजोरी थी और प्लेटलेट्स कम थीं।
मनोज तिवारी, CMHO कार्यालय: उन्होंने पैसे मांगने के आरोप से इनकार किया। तिवारी के मुताबिक, ऑनलाइन आवेदन के बाद चार सदस्यीय कमेटी जांच करती है और फिर CMHO के हस्ताक्षर होते हैं। उन्होंने सवाल किया कि इस प्रक्रिया में पैसे क्यों लगेंगे?
मनीष, शिव जनसेवा केंद्र: स्टिंग में 30 हजार रुपए में डॉक्टर की व्यवस्था कराने का दावा करने के बाद मनीष ने कहा कि उनके पास कोई डॉक्टर नहीं है।
रामायण सिंह, मातेश्वरी पैथोलॉजी: डिजिटल साइन और कमीशन के दावों पर उन्होंने कहा, “मुझे कोई जानकारी नहीं है। आपकी टीम कब आई थी? मुझसे किसी की बात नहीं हुई।”
शुभम, चित्रकिरण वेस्ट मैनेजमेंट: उन्होंने 3,500 रुपए मासिक शुल्क लेने की बात स्वीकार की। अन्य सवालों पर उन्होंने HOD से बात करने को कहा।
रंजीत साहू, प्रदूषण विभाग: 20 हजार रुपए की कथित मांग और 15 दिन में NOC मिलने के दावे पर सवाल पूछे जाने के बाद साहू ने फोन काट दिया।
मंजूरी से जांच तक, कई स्तरों पर रिकॉर्ड हुई बातचीत
हमारी टीम के 10 दिन के अंडरकवर स्टिंग में पैथोलॉजी लैब की मंजूरी, डॉक्टर के डिजिटल सिग्नेचर, जांच पर कमीशन, बायोमेडिकल वेस्ट प्रमाणपत्र और प्रदूषण विभाग की NOC से जुड़े दावे रिकॉर्ड हुए। मरीज को बीमारी बताने और महंगे इलाज की सलाह देने का मामला भी इसी पड़ताल का हिस्सा है।
एक ओर विशेषज्ञ ने दोनों लैब की रिपोर्ट में सामान्य WBC स्तर और LFT-KFT नहीं लिखे जाने पर सवाल उठाए, दूसरी ओर स्टिंग में सामने आए लोगों ने अपने-अपने पक्ष रखे। रिकॉर्ड की गई बातचीत, रिपोर्ट और संबंधित लोगों के बयानों के आधार पर लैब संचालन और जांच की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
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