21 जनवरी 2016 की सुबह, गोरखपुर।
एक औरत लगातार दरवाजा पीट रही थी।
“सुनिए… दरवाजा खोलिए। मैं मजाक के मूड नहीं हूं।”
कोई जवाब नहीं आया। उसकी आवाज तेज होती गई। घर में रेनोवेशन का काम चल रहा था। आवाज मजदूरों तक पहुंची तो उन्होंने दरवाजा खोला। औरत गुस्से में पैर पटकते हुए, बगल के कमरे में गई। दरवाजा खोलते ही उसके होश उड़ गए, चीख पड़ी-
“हे भगवान…”
बिस्तर पर उसके पति और चार साल के मासूम बेटे की लाशें पड़ी थीं। आदमी के सिर पर किसी भारी चीज से वार किया गया था। पूरा बिस्तर खून के गाढ़े भूरे दागों से सना था।
'खूनी शादी' के पहले एपिसोड में पढ़िए गोरखपुर की अर्चना और उसके फेसबुक फ्रेंड की कहानी। कमरे में पति और बेटे की लाशें पड़ी थी और वो पड़ोस के कमरे में प्रेमी के साथ...
साल 2008, गोरखपुर
आई स्पेशलिस्ट डॉ. ओमप्रकाश यादव की शादी को छह महीने ही हुए होंगे, लेकिन तलाक की नौबत आ चुकी थी। सिंगापुर में पली-बढ़ी लड़की जॉइंट फैमिली में एडजस्ट नहीं कर पा रही थी।
वहीं, ओम के लिए परिवार छोड़ना नामुमकिन था। पिता की मौत के बाद बड़े भाई और मां ने ओम की पढ़ाई में रुकावट नहीं आने दी थी।
अशोकनगर कॉलोनी में ओम के घर का माहौल अच्छा नहीं था। वे अपनी मां और भाई के साथ बैठे थे। शाम का सन्नाटा और ज्यादा बोझिल लग रहा था।
बड़े भाई राजकुमार ने चुप्पी तोड़ी-
“शादी में समझौता करना पड़ता है।”
ओम ने कहा-
“भइया, मैंने बहुत कोशिश की, लेकिन वो कुछ सुनने को तैयार ही नहीं है।”
मां बागेश्वरी देवी ने पूछा-
“बेटा, उसे परेशानी क्या है?”
ओम-
“मां, वो जॉइंट फैमिली में नहीं रहना चाहती। उसे लगता है कि उसकी आजादी खत्म हो गई है।”
राजकुमार-
“तो क्या तुमने तलाक का मन बना ही लिया है?”
ओम ने नजर उठाकर कहा-
“मैंने नहीं, उसने बना लिया है। उसकी दुनिया अलग है भइया और मेरी अलग…।”
कमरे में फिर खामोशी छा गई। कुछ ही महीनों में तलाक भी हो गया। ओमप्रकाश की जिंदगी में फिर से खालीपन आ गया था, लेकिन ये ज्यादा दिन का नहीं था। पड़ोसियों से लेकर रिश्तेदारों तक सबको बस एक ही बात याद थी कि लड़का ‘डॉक्टर’ है।
एक शाम राजकुमार ने ओम से कहा-
“लखनऊ से एक रिश्ता आया है।”
ओमप्रकाश चौंक गए।
“इतनी जल्दी…?”
राजकुमार-
“लड़की कुंवारी है। परिवार इज्जतदार है। सबने हालात जान लिए हैं, फिर भी रिश्ता भेजा है।”
ओम कुछ देर चुप रहे। फिर बोले-
“आपने मां से बात की?”
राजकुमार ने हां में सिर हिलाया, बोले-
“मां को लड़की पसंद है। अर्चना नाम है उसका…।”
ओम ने कहा-
“आप लोगों को जैसा ठीक लगे।”
राजकुमार ने टोकते हुए कहा-
“ये तुम्हारी जिंदगी का सवाल है। ऐसे कैसे अलग हो जाते हो?”
ओम ने धीमी आवाज में कहा-
“भइया, पिछली बार भी यही सोचा था।”
राजकुमार-
“हर लड़की एक जैसी नहीं होती। अर्चना घरेलू है, सब संभाल लेगी।”
ओम-
“आप लोग देख लीजिए।”
इतने में बागेश्वरी देवी कमरे में आईं। ओम की तरफ देखकर बोलीं-
“भगवान इस बार सब अच्छा करेंगे।”
साल 2009,
बड़े धूमधाम से ओमप्रकाश की दूसरी शादी हो गई। अर्चना धार्मिक थी। मायके में वो रोज मंदिर जाती थी। ससुराल आई तो यहां भी दिनचर्या वैसी ही रही। अर्चना ने टूटे घर को समेट लिया था। घरवाले खुश थे, रौनक फिर लौट आई थी।
ओम को क्लिनिक से लौटने में अक्सर देर हो जाती थी। उस दिन भी काफी रात हो गई। वो घर आए, खाना खाया और चुपचाप कमरे में चले गए। अर्चना पहले से जाग रही थी।
उसने धीमी आवाज में कहा-
“आज फिर देर हो गई।”
ओम-
“मरीज ज्यादा थे।”
कुछ देर दोनों खामोश बैठे रहे। फिर अर्चना ने अचानक कहा-
“एक बात पूछूं?”
ओम ने उसकी तरफ देखा। अर्चना बोली-
“क्या हम अलग नहीं रह सकते?”
ओमप्रकाश चौंक गए।
“अलग… क्या मतलब?”
अर्चना-
“मतलब यही कि जहां सिर्फ हम हों।”
ओम ने भौंहें सिकोड़ लीं-
“ये कैसी बातें कर रही हो?”
अर्चना मायूस होकर बोली-
“आप दिन भर क्लिनिक में रहते हैं। कभी जल्दी आते भी हैं तो सबके साथ नीचे बैठ जाते हैं। खाना खाकर ऊपर आते हैं और सो जाते हैं।”
ओम-
“घर में तो ऐसा ही होता है।”
अर्चना ने नजरें झुका लीं-
“और मैं, मेरा क्या? मेरा भी तो हक है।”
ये कहते हुए उसने अपना चेहरा घुमा लिया। ओम के सामने एक बार फिर वही सवाल था जो कुछ महीने पहले किसी और ने पूछा था। ओम ने धीरे से कहा-
“देखो, मैं घर नहीं छोड़ सकता।”
दिन बीतने लगे। अर्चना का व्यवहार बदलने लगा। वो अब पूजा के लिए जल्दी नहीं उठती। एक दिन अर्चना और बागेश्वरी की कहासुनी भी हो गई। बागेश्वरी के मन में ओम की पहली पत्नी की यादें लौटने लगीं। उसी शाम ओमप्रकाश क्लिनिक से आए। मां चुप बैठी थी। ओम ने कारण पूछा।
बागेश्वरी ने धीरे से कहा-
“एक बात कहूं… मेरी कहा मानेगा?”
ओम बिना कुछ कहे मां को देखते रहे। बागेश्वरी बोलीं-
“बहू को नए जमाने के रंग लग गए हैं। रोज घर में कलह हो रही है। तुम दोनों अलग हो जाओ”
मां के मुंह से ये सुनकर ओम को झटका लगा। वे कुछ पल चुप रहे। फिर बोले-
“अगर इससे शांति रहेगी तो ठीक है।”
घर में नया बंटवारा हो गया। तय हुआ कि ओम और अर्चना ऊपरी मंजिल पर रहेंगे, खाना भी अलग बनेगा। ऊपर और नीचे के बीच एक दीवार खड़ी हो गई, जो दिखती नहीं थी, लेकिन महसूस जरूर होती थी।
साल 2012
अर्चना और ओम के लिए खुशियों से भरा था। अर्चना ने एक बेटे को जन्म दिया। शादी के तीन साल बाद आई इस खबर से पूरा परिवार खुश था। घर में किलकारियां गूंजने लगीं और दोनों की दुनिया बेटे के इर्द-गिर्द सिमट गई।
ओमप्रकाश सुबह क्लिनिक निकल जाते और रात तक लौटते। घर की जिम्मेदारी और बच्चे की देखभाल में अर्चना का दिन कटता, लेकिन दोपहर भारी लगती। बच्चे के सो जाने के बाद वो अकेलेपन से जूझती रहती।
बेटा तीन साल का हुआ तो प्री नर्सरी में एडमिशन हो गया। घर में अचानक सन्नाटा हो गया। अर्चना ज्यादा अकेली हो गई। समय काटने के लिए उसने फेसबुक आईडी बना ली। एक दिन अजय यादव नाम के शख्स ने फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी।
अर्चना ने उसकी प्रोफाइल चेक की… फिरोजाबाद का रहने वाला, प्राइवेट स्कूल टीचर और पॉलिटिक्स में एक्टिव। अजय ने प्रोफाइल पर कई बड़ी राजनीतिक हस्तियों के साथ फोटो डाली थीं। अर्चना को जाने क्या हुआ, वो सभी फोटो लाइक करती गई। फ्रेंड रिक्वेस्ट भी एक्सेप्ट कर ली।
कुछ देर बाद अजय मैसेज आया-
"लगता है कोई चाहने वाला ही है।"
अर्चना मैसेज देखकर रुक गई। इतने डायरेक्ट मैसेज की उसे उम्मीद नहीं थी। मैसेज सीन करके छोड़ दिया। उधर से भी कोई मैसेज नहीं आया। अर्चना देर तक सोचती रही।
फिर जवाब दिया-
"नहीं, बस आपकी प्रोफाइल पसंद आई।"
कुछ देर बाद अजय ने मैसेज किया-
"बस प्रोफाइल...?"
अर्चना ने टाइप किया-
"मतलब?"
अजय-
"मतलब प्रोफाइल तो मेरी है, फिर आपको सिर्फ प्रोफाइल ही पसंद आई?"
अर्चना मुस्कुरा दी। फिर कुछ टाइप करते हुए रुक गई। उसे याद आया वो शादीशुदा है। बातचीत वहीं रुक गई। दिन फिर ऐसे ही बीतने लगे।
करीब 10 दिन बाद अजय का मैसेज आया-
"मैंने अब देखा कि आप भी यादव हैं।"
अर्चना बोर हो रही थी। उसने रिप्लाई कर दिया-
"मैंने तो रिक्वेस्ट इसलिए ही एक्सेप्ट की थी कि आप यादव हैं। मुझे लगा था शायद कोई रिश्तेदार है।"
यहीं से बातों का सिलसिला चल पड़ा। धीरे-धीरे दोपहर का वक्त कटने लगा। घर की चुप्पी मोबाइल की स्क्रीन पर खुलती और बातचीत से भर जाती। अजय भी शादीशुदा था, लेकिन रोज मैसेज करता। कभी हाल पूछता, कभी अपनी बातें बताता।
वो रोज नई पोस्ट डालने लगा। नेताओं के साथ खिंची तस्वीरें, बड़ी गाड़ियों के सामने सेल्फी और रसूख भरे कैप्शन। अर्चना ये देखकर काफी इंप्रेस हो रही थी। बातचीत बढ़ी, भरोसा गहराया। अर्चना धीरे-धीरे अजय की ओर में खिंचती जा रही थी।
एक दिन अर्चना ने लिखा-
“आप लोगों का ही जलवा है।”
अजय ने तुरंत जवाब दिया-
“हां, जलवा तो है।”
अर्चना ने कुछ देर रुककर टाइप किया-
“मुझे ऐसे लोग बहुत पसंद आते हैं। खैर छोड़िए क्या रखा है इन सबमें…”
अजय ने कहा-
“लगता है आपके हसबैंड आपको टाइम नहीं देते।”
अर्चना और अजय अब-तक अच्छे दोस्त बन चुके थे। अर्चना की उंगलियां तेजी से चलने लगीं। उसने लिखा-
“अरे छोड़िए, क्या ही कहूं।”
अजय ने फ्लर्टिंग के अंदाज में लिखा-
“समय देना भी एक आर्ट है। हर किसी को नहीं आती।”
अर्चना की तरफ से कोई जवाब नहीं आया। अजय ने लिखा-
“एक बार जिसका हाथ पकड़ लूं, छोड़ता नहीं हूं। चाहे कुछ हो जाए।”
अर्चना की धड़कनें तेज हो गईं। स्क्रीन देखते हुए उसे खुद पर हैरानी हुई। फिर भी उसने कांपते हाथों से लिखा-
“चाहे कुछ भी हो जाए?”
अजय का जवाब तुरंत आया-
“हां… सोच रहा हूं आपका हाथ पकड़ लूं। अगर इजाजत हो।”
बात काफी आगे बढ़ चुकी थी। फेसबुक फ्रेंडशिप और मजाक-मस्ती एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर में बदल चुकी थी। नंबरों की अदला-बदली के बाद फोन पर घंटों बातचीत होने लगी। कभी-कभी वीडियो कॉल भी हो जाती। अब दोनों एक-दूसरे से मिलने को बेताब थे।
एक दिन यूं ही अजय ने कहा-
“तुम कहो तो सही, गोरखपुर कितनी दूर है। अगले ही दिन तुम्हारे सामने होऊंगा।”
अर्चना बोली-
“तो आ जाओ…।”
कुछ दिन बाद अजय का मैसेज आया-
“मैं गोरखपुर आ रहा हूं।”
अर्चना ने पढ़कर फोन साइलेंट कर दिया। दिल जोर से धड़क रहा था। अगले दिन अजय गोरखपुर पहुंच गया।
शाम करीब 5 बजे,
अर्चना अपनी सास से बोली-
“मांजी मैं बाजार जा रही हूं। उधर से मंदिर भी जाऊंगी।”
सास ने पूछा-
“इस समय मंदिर...?”
अर्चना-
“हां, कुछ जरूरी सामान लेना है और आज मन भी थोड़ा ठीक नहीं लग रहा। थोड़ी देर लग जाएगी।”
बागेश्वरी ने आगे कोई सवाल नहीं किया। वो अर्चना का स्वभाव जानती थीं। अर्चना ने बेटे नितिन को भी सास के पास छोड़ दिया। घर से निकलते ही उसने अजय को मैसेज कर दिया। जवाब तुरंत आ गया।
होटल का नाम और पता साफ लिखा था। अर्चना ने फोन पर्स में रखा और कदम बढ़ा दिए। होटल के बाहर पहुंचकर उसके पांव कुछ पल के लिए ठिठक गए। भीतर जाने से पहले उसने खुद को संभाला।
मन में अजीब सी हलचल थी। दिल तेजी से धड़क रहा था। कमरे के बाहर पहुंचकर वो कुछ देर खड़ी रही। दरवाजे की ओर हाथ बढ़ा तो उंगलियां कांप रही थीं। फिर भी उसने दस्तक दी।
दरवाजा खुला, सामने अजय था। वही चेहरा जिसे अर्चना महीनों से स्क्रीन पर देखती आ रही थी। वो मुस्कुरा रहा था, अर्चना ने नजरें झुका लीं। अजय सामने से हट गया। अर्चना चुपचाप अंदर चली गई।
दरवाजा बंद हुआ। बोरियत से शुरू हुई बातचीत कब आदत बनी और फिर जरूरत ये अर्चना को खुद पता नहीं चला। उस होटल के कमरे का बंद दरवाजा सिर्फ एक मुलाकात नहीं, बल्कि ऐसे सफर की शुरुआत था, जिसका अंजाम से दोनों अनजान थे।
अर्चना खुश थी। अजय की मौजूदगी उसे भरोसा देती थी। मुलाकातें बढ़ने लगीं। अजय अक्सर गोरखपुर आने लगा। फोन पर बातें और लंबी होने लगीं। अर्चना की दुनिया दो हिस्सों में बंट गई थी। एक तरफ घर, पति और बच्चा, वहीं दूसरी तरफ अजय।
एक दिन अजय ने कहा-
"हमेशा मैं ही तुमसे मिलने आता हूं। कभी तुम भी तो आओ।"
अर्चना चौंक गई-
"पागल हो गए हो क्या? मैं शादीशुदा हूं, फिरोजाबाद नहीं आ सकती।"
अजय-
"तो क्या हुआ, मैं भी तो शादीशुदा हूं।"
अर्चना-
"तुम मर्द हो, किसी बहाने से आ सकते हो। मैं कैसे आऊंगी?"
अजय-
“मैं कुछ नहीं जानता, इस बार तुमको ही आना होगा।”
इतना कहकर अजय ने फोन काट दिया। अर्चना को समझ नहीं आ रहा था। वो फिरोजाबाद नहीं जा सकती थी। काफी सोचने के बाद उसने अजय को मैसेज किया-
“मैं किसी भी तरह फिरोजाबाद नहीं आ सकती। तुम सिर्फ इतना ही चाहते हो न कि मैं तुमसे मिलने आऊं? तो मैं लखनऊ आकर तुमसे मिल सकती हूं।”
लखनऊ में अर्चना का मायका था। वो यहां आसानी से आ सकती थी। अजय भी किसी तरह मान गया। उस दिन ओमप्रकाश घर पहुंचे तो देखा अर्चना बैग पैक कर रही है।
ओमप्रकाश बोले-
"अरे… कहां जा रही हो?"
अर्चना कपड़े पैक करते हुए बोली-
"काफी दिन से मायके नहीं गई। सोच रही हूं परसों निकल जाऊं। घरवालों से मिलकर आ जाऊंगी।"
ओम ने मजाकिया लहजे में कहा-
"मुझे लगा कहीं भाग तो नहीं रही।"
दोनों हंस दिए। अर्चना बोली-
"नहीं, नहीं… इतने भोले-भाले पति को छोड़कर मैं कहीं नहीं जा रही।"
पत्नी को मायके जाता देख ओम के भीतर प्यार उमड़ रहा था। वे बोले-
"अच्छा, ये बात है…। ऐसा क्या पसंद है मुझमें।"
अर्चना, ओम के गाल खींचते हुए बोली-
"आपकी मासूमियत।"
ओम-
"बहुत याद आएगी तुम्हारी…।"
अर्चना ने रूठने के अंदाज में कहा-
"काश… जब पास थी तो मिस करते। मैं जाती ही नहीं।"
ओम ने अर्चना का चेहरा दोनों हाथों में लेकर माथा चूम लिया। फिर गले से लगाकर बोले-
“जल्दी आना। तुम्हारे और नितिन के बिना मन नहीं लगेगा मेरा।”
दो दिन बाद अर्चना लखनऊ के लिए निकल गई। मायके पहुंचकर उसने अजय को मैसेज कर दिया। अजय पहले ही लखनऊ आ चुका था। अगली सुबह अर्चना खरीदारी करने के बहाने घर से निकली। बेटे को घर पर ही छोड़ दिया और सीधे अजय के होटल पहुंच गई। एक ही कमरे में सुबह से शाम हो गई।
अर्चना ने अजय से कहा-
"मैं तो तुमसे मिलने आ गई, अब तुममें हिम्मत है तो मेरे घर चलो।"
अब हड़बड़ाने की बारी अजय की थी। वो बोला-
"क्या… मैं तुम्हारे घर कैसे आ सकता हूं। बाहर का मिलना ठीक है।"
अर्चना मुस्कुराकर बोली-
"इतनी सी बात पर डर गए। तुमसे तो मेरे पति ही ठीक हैं।"
हंसी ठिठोली और प्यार के बीच तय हुआ कि अजय रिश्तेदार बनकर अर्चना के घर यानी गोरखपुर आएगा। यादव है तो किसी को शक भी नहीं होगा। हुआ भी यही, दोनों गोरखपुर आए। शाम को ओमप्रकाश घर लौटे तो कमरे में अजय को देखकर चौंक गए।
अर्चना ने कहा-
"ये मेरे पापा की बुआ के बेटे हैं। पापा अकेले नहीं आने दे रहे थे, तो इन्हें भेज दिया।"
ओमप्रकाश बोले-
"अच्छा, अच्छा… इनको चाय-वाय पिलाई? पहली बार हमारे घर आए हैं।"
अर्चना-
"हां, हां… खूब अच्छी खातिरदारी की है। ऐसी कोई न किया होगा।"
सभी हंस पड़े। इसके बाद अजय, अर्चना की ससुराल भी आने लगा। अर्चना का स्वभाव अचानक बदल सा गया था। ओमप्रकाश उसे कॉल करते तो फोन बिजी आता। घर पर भी अर्चना मोबाइल से चिपकी रहती।
ओम टोकते तो कहती-
"आपके पास तो टाइम होता नहीं है। अब मैं किसी से बात करना भी छोड़ दूं।”
अजय के साथ अर्चना की नजदीकियां बढ़ रही हैं और ओमप्रकाश से दूरियां। ओम को शक होने लगा था। एक दिन उन्होंने चिढ़कर पूछा-
"क्या तुम्हारा कहीं चक्कर चल रहा है?"
ये सुनते ही अर्चना एक पल को ठिठक गई। चेहरे पर गुस्सा उतर आया। उसने तेज आवाज में कहा-
“तुम्हें क्या लगता है, मैं कैसी औरत हूं?”
ओम चुप हो गए। उन्होंने बात बढ़ाना ठीक नहीं समझा, लेकिन शक का बीज गहराई से जम चुका था। घर का माहौल बदलने लगा। ओमप्रकाश अब छोटी-छोटी बातों पर अर्चना को टोकने लगे। देर रात फोन, अचानक बाहर जाना, बातों में चिड़चिड़ापन… सब कुछ उन्हें खटकने लगा।
अर्चना भी अब संभलकर नहीं, बल्कि खुली बगावत पर उतर आई थी। वो साफ कहने लगी-
“मुझ पर भरोसा नहीं तो साथ रहने का क्या मतलब?”
एक दिन ओम ने अर्चना का मोबाइल चेक करने की कोशिश की। अर्चना ने झपटकर फोन छीन लिया। बात बढ़ी, आवाजें ऊंची हुईं। झगड़ा इस कदर बढ़ा कि दोनों घर में रहते हुए भी अलग हो गए। ओम और अर्चना अलग-अलग कमरे में सोने लगे।
10 जनवरी 2016 की दोपहर।
दोनों में झगड़ा हुए दो हफ्ते से ज्यादा हो चुका था। बातचीत अब भी बंद थी। अर्चना अकेले कमरे में बैठी थी। उसके जेहन में कई चीजें चल रही थीं। तभी फोन बजा। दूसरी तरफ अजय था। अर्चना की आवाज में घबराहट थी।
अजय ने पूछा-
“सब ठीक है?"
अर्चना-
"अभी तो ठीक है, लेकिन ज्यादा दिन तक ठीक नहीं रहेगा। ऐसे कब तक चलेगा।”
अजय-
“मैं समझ रहा हूं, लेकिन ये बहुत बड़ा रिस्क है।”
अर्चना तमककर बोली-
“रिस्क तब है जब हम छुपकर मिलते हैं। अब या तो एक रहेंगे या सब खत्म। बीच का कुछ नहीं बचा।”
अजय चुप रहा। अर्चना फिर बोली-
"या तो तुम मेरी जिंदगी से चले जाओ या मेरे पति को मेरी दुनिया से हटा दो।"
अजय-
"तुम्हारी दुनिया से या इस दुनिया…।"
अर्चना-
"इस दुनिया से…।"
अजय-
“पक्का…? फिर पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं रहेगा।”
अर्चना-
“पीछे हटने को कुछ बचा ही नहीं। वो रहा तो हम कभी साथ नहीं हो पाएंगे।”
दोनों चुप हो गए। फिर अजय की आवाज आई-
"ठीक है… बताओ कब और कैसे करना है।"
20 जनवरी की रात।
कॉलोनी में शादी थी। ओमप्रकाश पूरे परिवार के साथ जा रहे थे। बेटा नितिन भी साथ था, लेकिन अर्चना ने जाने से मना कर दिया। ये प्लानिंग का हिस्सा था। अजय सुबह ही गोरखपुर पहुंच चुका था। घरवालों के जाते ही वो अर्चना के घर आया।
पूरा घर खाली था। दोनों ने इसका फायदा उठाया। अजय और अर्चना हमबिस्तर हुए। रात करीब 12 बजे ओमप्रकाश शादी से लौटे। अर्चना का कमरा अंदर से बंद था इसलिए बेटे को अपने ही कमरे में सुलाने ले गए।
अर्चना अपने कमरे में बैठी, बाहर की आहट ले रही थी। उसे इंतजार था कि कब घरवाले गहरी नींद में सोएं और वो अपना काम करे।
रात करीब 1ः30 बजे,
अर्चना ने अजय को जगाया-
"उठो… वो आ गया।"
अजय बुरी तरह थका हुआ था। गहरी नींद में था। अर्चना ने अजय को जोर से हिलाया-
"कपड़े पहनो। वो आ गया है। चलो… काम खत्म करते हैं।"
अजय की नींद अचानक खुल गई। कुछ देर बाद दोनों कमरे से बाहर आए। अर्चना आगे चल रही थी। उसने धीरे से ओम के कमरे का दरवाजा खोला। वो बेटे की तरफ करवट लेकर सो रहे थे। अर्चना अंदर घुसी, अजय भी उसके पीछे था।
सर्दी की उस रात अजीब सा सन्नाटा था। अर्चना ओम के सिरहाने पहुंची और आहिस्ता से रजाई को हटाया। अजय आगे बढ़ा, उसके हाथ में हथौड़ा था। उसने पूरी ताकत से वार किया। हथौड़ा ओम के सिर में धंस गया।
आवाज निकालने की कोशिश तक नाकाम रही। अजय ने हथौड़ा खींचकर निकाला और बिना रुके दूसरा वार किया, फिर तीसरा और चौथा। कमरे में कुछ ही पलों में सन्नाटा छा गया। एक मिनट से भी कम समय में सब खत्म हो चुका था।
ओमप्रकाश की लाश और बिस्तर पर फैला खून उस फैसले की गवाही दे रहा था, जिसे अब बदला नहीं जा सकता था। तभी उस सन्नाटे को चीरते हुए हल्की सी आहट हुई। हथौड़े की आवाज से चार साल का नितिन जाग गया था।
बच्चा सहम गया, वो रोता हुआ अर्चना से लिपट गया। अर्चना के हाथ कांप रहे थे। वो बच्चे के सिर पर हाथ फेरती रही, जैसे उसे चुप करा रही हो। अर्चना ने अजय से पूछा-
“अब इसका क्या करें?”
अजय घबरा गया, बोला-
“नहीं… मैं बच्चे को नहीं मारूंगा।”
दोनों के बीच कुछ देर बहस होती रही। बच्चा अर्चना के सीने से चिपका हुआ था। आखिर मां के आंचल से ज्यादा सुरक्षित और क्या हो सकता है।
तभी अर्चना बोली-
“अगर तुम नहीं मारोगे तो मैं ही मार देती हूं।"
उसने झटके से बेटे को खुद से अलग किया और बिस्तर पर पटककर गला दबाने लगी। चार साल का मासूम मां के चंगुल में छटपटाता रहा। आखिर में उसने भी दम तोड़ दिया। अर्चना ने अजय की तरफ देखा। वो बुरी तरह हांफ रही थी।
अर्चना ने बाल ठीक करते हुए कहा-
"अलमारी में जो भी पैसे-जेवर हैं उसे लेकर निकल जाओ। जल्दी करो…"
अजय ने अलमारी का दरवाजा तोड़ा और कपड़े इधर-उधर फेंक दिए। लॉकर तोड़कर उसमें रखे गहने और नकदी एक बैग में भरी। सब कुछ जल्दी में किया गया, लेकिन इतने हिसाब से कि लूट दिखे। अजय ने कमरे के दरवाजे की कुंडी भी तोड़ दी।
इसके बाद अर्चना अपने कमरे में चली गई। अजय भी उसके साथ था। दोनों ने जैसे खुद को आसपास की हकीकत से अलग कर लिया था। बंद कमरे में हवस का वो रिश्ता कायम हुआ, जिसे उन्होंने सब कुछ दांव पर लगाकर चुना था।
जाते वक्त अजय ने अर्चना के कमरे में बाहर से कुंडी लगा दी। वो अंधेरे में तेजी से वहां से निकल गया। कमरे के अंदर अर्चना अकेली थी। उस रात वो इस तरह सोई, जैसे कुछ हुआ ही न हो। सुबह सब बदले वाला था।
घर में रेनोवेशन का काम चल रहा था। मजदूर आ गए थे। अर्चना की नींद खुली तो याद आया रात में दो मर्डर हुए हैं। वो उठी और दरवाजा खोलने लगी, लेकिन बाहर से कुंडी बंद थी। नीचे से हथौड़े और ड्रिल की आवाजें आ रही थीं।
अर्चना ने दरवाजा पीटना शुरू कर दिया।
“सुनिए… दरवाजा खोलिए। इतनी देर से क्या कर रहे हो? देखो, मैं मजाक के मूड नहीं हूं।”
कोई जवाब नहीं आया। उसकी आवाज तेज होती गई।
“सुबह-सुबह क्यों तमाशा बना रहे हैं?”
अर्चना लगातार दरवाजा पीट रही थी। आवाज मजदूरों तक पहुंच रही थी। एक ने कहा-
“भइया, ऊपर से आवाज आ रही है।”
दूसरा बोला-
“शायद कुंडी बाहर से बंद है। खोल दें क्या…?”
एक-दो मजदूर ऊपर गए और कुंडी खोल दी। अर्चना बेहद गुस्से में बाहर आई और भागती हुई बगल के कमरे की तरफ गई। जैसे ही दरवाजा खुला, वो चीख पड़ी-
“हे भगवान…”
बिस्तर पर ओमप्रकाश और नितिन की लाश पड़ी थी। मजदूर सन्न रह गए। अर्चना वहीं जमीन पर बैठकर छाती पीटने लगी।
“सब बर्बाद हो गया। मेरे सुहाग मिटा दिया… बच्चे को भी नहीं छोड़ा।”
कमरे का हाल देखकर लग रहा था कि लूट के इरादे से मर्डर किया गया है। इतने में सास बागेश्वरी देवी आ गईं। उन्होंने अंदर झांका और चीखकर गिर पड़ीं-
“हाय मेरा बेटा… मेरा पोता…”
कुछ ही देर में मोहल्ला जमा हो गया। पुलिस आई, मीडिया भी पहुंच गया। अर्चना बार-बार एक ही बात दोहरा रही थी-
“मैं तो दूसरे कमरे में सो रही थी। मुझे कुछ नहीं पता… दरवाजा भी बाहर से बंद था। सब कुछ लूट लिया…मेरे सुहाग भी लूट लिया।"
ओमप्रकाश के बड़े भाई राजकुमार पुलिस इंस्पेक्टर थे। वहीं, अर्चना के पिता दीपचंद यादव तब के सीएम की सिक्योरिटी में थे। मामला पूरे प्रदेश में आग की तरह फैला गया। गोरखपुर पुलिस पर लखनऊ से दबाव आने लगा।
तब के DIG (डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल) आरके चतुर्वेदी ने SSP (सीनियर सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस) लव कुमार को फोन किया-
"मौके पर पहुंचिए और पूरा मामला पता करके मुझे बताइए।"
लव कुमार तुरंत मौके पर पहुंचे। एक-एक चीज का ठीक से मुआयना किया। लाश, कमरा, अलमारी सब बारीकी से देखा। इसके बाद लव कुमार ने DIG को फोन किया। उधर से आवाज आई-
"कहिए, क्या लग रहा है?"
लव कुमार ने कहा-
"सर मुझे नहीं लग रहा है कि लूट के लिए मर्डर हुआ है। मामला कुछ और है।"
DIG चतुर्वेदी-
"क्यों, क्या बात है?"
लव कुमार-
"कमरे की कुंडी अंदर से तोड़ी गई है। देखकर ऐसा लग ही नहीं रहा कि बाहर से धक्का देकर टूटी है। मर्डर के बाद लूट दिखाने की कोशिश हुई है।"
DIG-
"सिर्फ यही वजह है या और भी कुछ है?"
लव कुमार-
"स्पॉट पर लुटेरों से झड़प के कोई निशान भी नहीं हैं। जिस हथौड़े से सिर फोड़ा गया, वो उसी कमरे में मिला है। पेशेवर इस तरह की गलती नहीं करते।”
DIG-
"ठीक है, अपने हिसाब से हैंडल कीजिए। ध्यान रहे मामला सेंसेटिव है।"
पुलिस को बार-बार अर्चना पर शक हो रहा था, लेकिन बिना किसी सबूत के उसे हिरासत में नहीं ले सकते थे। उसका रोना भी ढोंग लग रहा था। उसकी आंखें सूखी थीं। आवाज में शोर था, दर्द नहीं।
पुलिस आस-पड़ोस और घरवालों से पूछताछ कर रही थी। ओमप्रकाश की मां ने बताया, बीते कुछ महीनों से दोनों के बीच झगड़ा होता था। दिसंबर, 2015 से दोनों अलग कमरों में सोने लगे थे।
अर्चना की कॉल डिटेल निकाली गई। पता चला वो फिरोजाबाद के किसी नंबर पर घंटों बात करती है। नंबर अजय का था। लोकेशन ट्रेसिंग से पता चला, मर्डर की रात वो नंबर गोरखपुर के उस इलाके में एक्टिव था।
इतना काफी था, SSP लव कुमार ने फिरोजाबाद पुलिस से कॉन्टैक्ट किया। अजय यादव गिरफ्तार हो गया। पूछताछ में उसने गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन पुलिस के सवालों ने उसे तोड़ दिया। अजय के जुर्म कुबूल करते ही पुलिस ने अर्चना को गिरफ्तार कर लिया।
24 घंटे के भीतर ही यानी 22 जनवरी, 2016 को ही केस सॉल्व हो गया। इसके बाद अदालती दांव-पेंच शुरू हुए। चार साल तक केस चलता रहा। आखिरकार, 17 अक्टूबर 2020 को गोरखपुर सेशन कोर्ट ने अर्चना और अजय को उम्रकैद की सजा सुना दी। दोनों फिलहाल जेल में हैं और अपने कर्मों की सजा भुगत रहे हैं।
नोट-
सीनियर जर्नलिस्ट्स और केस से जुड़े जानकारों से बात करने के बाद सभी कड़ियों को जोड़कर ये स्टोरी लिखी है। कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी ली गई है।