गरियाबंद में काले पत्थर ने छीनी मजदूरों की पहचान : खदानों से घिस गईं हाथों की रेखाएं, बायोमीट्रिक मशीन फेल, राशन नहीं मिल रहा, अरबों का कारोबार, लेकिन गांव में कीचड़-गड्ढे
गरियाबंद/राजिम से पुरुषोत्तम पात्र की रिपोर्ट। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में राजिम तहसील का बासीन और बरभाठा गांव देश-प्रदेश में अपने उच्च किस्म के काले फर्शी पत्थर के लिए जाना जाता है। 200 सालों से यहां की खदानों से पत्थर निकल रहा है, जिसकी मांग मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल तक है। खदानों और 50 से अधिक उद्योगों से सालाना आधा अरब रुपये (50 करोड़ से ज्यादा) का कारोबार होता है और सरकार को करोड़ों का राजस्व मिलता है।
लेकिन इस चमकते कारोबार के पीछे का सच बेहद खौफनाक और अमानवीय है। खदानों में काम करते-करते मजदूरों के बूढ़े और लाचार हाथों की रेखाएं (फिंगरप्रिंट) पूरी तरह घिस चुकी हैं। नतीजतन, आधार आधारित बायोमीट्रिक मशीनें इनके अंगूठे को ट्रेस नहीं कर पा रही हैं। फिंगरप्रिंट मैच न होने के कारण ये मजदूर राशन, पेंशन और सरकारी हितग्राही योजनाओं से पूरी तरह वंचित हो गए हैं।

'किस्मत की रेखा बची रहे, इसलिए रोजाना जतन': बजरी तोड़कर 300 परिवारों का गुजर-बसर
3 हजार परिवारों की आबादी वाले बासीन गांव में गलियों में कीचड़, गड्ढे और बहता गंदा पानी सरकारी विकास के दावों की धज्जियां उड़ाता है। खदानों में बरसों काम कर थक चुके मजदूर अब खदान संचालकों से वेस्टेज (बेकार) पत्थर खरीदकर उसकी बजरी (गिट्टी) बनाते हैं। बासीन के 300 से ज्यादा परिवार इसी मामूली आय पर टिके हैं।
काम करते नजर आए लक्ष्मी बाई, कांशीराम चंदेल, भगवती देवी और गायत्री बाई ने बताया कि बजरी तोड़ते समय पत्थर के टुकड़े आंखों में लगते हैं, जिससे चश्मा लगाना पड़ता है। उड़ने वाली धूल (डस्ट) से फेफड़े खराब होने और दमा होने का डर हमेशा सताता है।
ग्रामीणों ने दर्द बयां किया कि फिंगरप्रिंट घिस जाने से आधार की केवाईसी (KYC) नहीं हो पाती। राशन दुकान पर अंगूठा नहीं लगता, तो राशन के लिए घंटों गुहार लगानी पड़ती है।

केस स्टडी: 15 साल पहले पति खदान में समाया, अब ट्राइ-साइकिल पर दिव्यांग जमुना कूट रही बजरी
खदान किनारे ट्राइ-साइकिल पर बैठकर अपने दिव्यांग बेटे के साथ बजरी तोड़ रही जमुना बाई की कहानी रोंगटे खड़े करने वाली है। जमुना ने बताया कि 15 साल पहले उसके पति पकलू भतपहरी की मौत खदान हादसे में हो गई थी। मौत के बाद पूरे परिवार का बोझ इस दिव्यांग महिला पर आ गया।
क्षेत्र के उद्योगों और खदानों में काम करने वाले 90 फीसदी मजदूरों का श्रम और उद्योग विभाग के नियमों के तहत कोई सरकारी पंजीयन नहीं है। हादसों में मजदूर की जान जाए या वह अपाहिज हो जाए, खदान मालिक और उद्योगपति अपनी जिम्मेदारी से साफ मुकर जाते हैं।
कैग (CAG) रिपोर्ट का सनसनीखेज खुलासा: प्रभावित ग्रामीणों का पैसा अफसरों के 'स्वागत द्वार' और 'बगीचे' में उड़ा
ग्रामीणों के इस शोषण के बीच हाल ही में विधानसभा में पेश भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की परफॉर्मेंस ऑडिट रिपोर्ट ने शासन-प्रशासन के भ्रष्टाचार को बेनकाब कर दिया है।
खनन प्रभावित गांवों के विकास के लिए बने जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट (DMFT) और 'प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना' के फंड में भारी धांधली पाई गई है।
कैग के अनुसार, पीड़ितों के उत्थान के बजाय ₹4,536.58 करोड़ (81% राशि) अधिकारियों के लिए गाड़ियां खरीदने, दफ्तरों में बगीचे सजाने और स्वागत द्वार (वेलकम गेट) बनाने में उड़ा दिए गए। 11 सैंपल जिलों के 1,734 सीधे प्रभावित गांवों में से 754 गांव (44%) विकास कार्यों से पूरी तरह अछूते रहे।
बिना मास्टर प्लान के ₹1,060.70 करोड़ के काम मंजूर किए गए और टेंडर नियमों की अनदेखी कर ₹41.8 करोड़ का व्यर्थ खर्च किया गया।

खदानों को असुरक्षित छोड़ा, अफसर कैमरे के सामने से भागे
बासीन और बरभाठा में खदान संचालकों की मनमानी चरम पर है। 'माइनिंग क्लोजर' (खनन समाप्ति के बाद खदानों को भरने) के नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है। विशालकाय खदानों को खुले और असुरक्षित छोड़ दिया गया है, जो कभी भी बड़े हादसों को न्योता दे सकती हैं।
जब इस पूरे मामले पर गरियाबंद के खनिज अधिकारियों से सवाल किया गया, तो उन्होंने कैमरे के सामने कुछ भी बोलने और खदानों की जानकारी देने से साफ मना कर दिया।
प्रशासन और जनप्रतिनिधियों का पक्ष
विशाल महाराणा (SDM, राजिम): "खदान संचालन में अनियमितता की शिकायत पर जांच टीम गठित कर दी गई है। जांच जारी है और रिपोर्ट जल्द ही कलेक्टर के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी।"
रोहित साहू (विधायक, राजिम): "क्षेत्र में डीएमएफ (DMF) फंड का लाभ विधिवत दिया जाता है। बासीन और बरभाठा के सर्वांगीण विकास के लिए नई कार्ययोजना बनाई जाएगी।"
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