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: Kabirdham: छत्तीसगढ़ के 'खजुराहो' को 'प्रसाद' में करें शामिल, लोकसभा में सांसद ने कहा- यह सभी की आंखों का तारा

News Desk / Sun, Dec 18, 2022


सांसद संतोष पांडेय।

सांसद संतोष पांडेय। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

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छत्तीसगढ़ का खजुराहो कहे जाने वाले कबीरधाम (कवर्धा) स्थित भोरमदेव मंदिर का मुद्दा लोकसभा में भी उठा। राजनांदगांव से भाजपा सांसद संतोष पांडेय ने भोरमदेव मंदिर को भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय अंतर्गत प्रसाद योजना में शामिल करने की मांग रखी है। उन्होंने कहा कि, यह बैगा आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र सभी की आंखों का तारा है। इसे निहारने के लिए देश-विदेश से बड़ी संख्या में पर्यटक यहां आते हैं।

लोकसभा में संतोष पांडेय ने कहा कि, प्रसिद्ध भोरमदेव मंदिर कवर्धा से करीब 16 किमी दूर स्थित है। यहां भगवान भोरमदेव (शिव) विराजमान हैं। जो आस्था का बड़ा केंद्र है। छत्तीसगढ़ के कला तीर्थ के नाम से विख्यात यह मंदिर मैंकल पर्वत श्रृंखला के गोद में बसा हुआ है। 10वीं सदी मे निर्मित मंदिर धर्म, आध्यात्म, लौकिक जीवन के विविध पक्षों के साथ वन्यजीव अभ्यारण्य, साल और बीजा के पेड़ो की निर्मल छाया को संजोए हुए है।

उन्होंने कहा कि, गोंड जाति के उपास्य देव भोरमदेव, महादेव शिव का नाम हैं। इस मंदिर की स्थापत्य कला शैली, मालवा की परमार कला शैली की प्रति छाया हैं। इन्हीं खूबियों के कारण और इसकी स्थापत्य कला, पुरातात्विक संपदा व धार्मिक आस्था के लिए जाना जाता है। कहा कि, डोंगरगढ़ स्थित मां बमलेश्वरी मंदिर और प्रज्ञागिरी पर्वत का विकास प्रसाद योजना अंतर्गत किया जा रहा है। इसी तरह भोरमदेव को भी शामिल करें। 

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छत्तीसगढ़ का खजुराहो कहे जाने वाले कबीरधाम (कवर्धा) स्थित भोरमदेव मंदिर का मुद्दा लोकसभा में भी उठा। राजनांदगांव से भाजपा सांसद संतोष पांडेय ने भोरमदेव मंदिर को भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय अंतर्गत प्रसाद योजना में शामिल करने की मांग रखी है। उन्होंने कहा कि, यह बैगा आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र सभी की आंखों का तारा है। इसे निहारने के लिए देश-विदेश से बड़ी संख्या में पर्यटक यहां आते हैं।

लोकसभा में संतोष पांडेय ने कहा कि, प्रसिद्ध भोरमदेव मंदिर कवर्धा से करीब 16 किमी दूर स्थित है। यहां भगवान भोरमदेव (शिव) विराजमान हैं। जो आस्था का बड़ा केंद्र है। छत्तीसगढ़ के कला तीर्थ के नाम से विख्यात यह मंदिर मैंकल पर्वत श्रृंखला के गोद में बसा हुआ है। 10वीं सदी मे निर्मित मंदिर धर्म, आध्यात्म, लौकिक जीवन के विविध पक्षों के साथ वन्यजीव अभ्यारण्य, साल और बीजा के पेड़ो की निर्मल छाया को संजोए हुए है।

उन्होंने कहा कि, गोंड जाति के उपास्य देव भोरमदेव, महादेव शिव का नाम हैं। इस मंदिर की स्थापत्य कला शैली, मालवा की परमार कला शैली की प्रति छाया हैं। इन्हीं खूबियों के कारण और इसकी स्थापत्य कला, पुरातात्विक संपदा व धार्मिक आस्था के लिए जाना जाता है। कहा कि, डोंगरगढ़ स्थित मां बमलेश्वरी मंदिर और प्रज्ञागिरी पर्वत का विकास प्रसाद योजना अंतर्गत किया जा रहा है। इसी तरह भोरमदेव को भी शामिल करें। 


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