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गरियाबंद का झरगांव बनेगा रोल मॉडल : Gariaband में सिस्टम की नाकामी से बच्चे बने शराबी, ओडिशा की शराब घर-घर बिकी, अब पूर्ण शराबबंदी का संकल्प

MP CG Times / Tue, Dec 23, 2025

गिरीश जगत, गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल गरियाबंद जिले के देवभोग क्षेत्र में स्थित झरगांव आज एक मिसाल बन गया है। करीब 3300 आबादी और 20 वार्डों वाले इस गांव ने वह कर दिखाया, जिसकी कल्पना तक मुश्किल मानी जाती है। यहां स्कूली बच्चों तक में शराब की लत (Alcohol Addiction among School Children) लगने लगी थी। गांव की गलियों में कच्ची महुआ शराब और ओडिशा से लाई गई शराब खुलेआम बिक रही थी। हालात इतने बिगड़ चुके थे कि घर-घर कलह, हिंसा और शिक्षा से दूरी आम बात बन गई थी।

लेकिन इसी बिगड़ते हालात के बीच गांव की महिलाओं (Women Power Movement) ने मोर्चा संभाला और झरगांव को पूर्ण शराब बंदी (Complete Liquor Ban) वाला पंचायत बनाने का ऐतिहासिक फैसला लिया। यह मैनपुर आदिवासी ब्लॉक की पहली पंचायत है, जिसने ग्रामसभा में सर्वसम्मति से शराबबंदी का प्रस्ताव पारित किया।

जब शराब बच्चों तक पहुंचने लगी, तब जागी गांव की अंतरात्मा

ग्रामसभा अध्यक्ष बनाई गईं शशिकला पाथर बताती हैं कि चर्चा के दौरान सबसे ज्यादा चिंता स्कूल जाने वाले बच्चों की बिगड़ती आदतों (Impact of Alcohol on Education) को लेकर थी। शराब की वजह से बच्चों की पढ़ाई, सेहत और भविष्य तीनों खतरे में पड़ रहे थे। गांव की बदनामी बढ़ रही थी और बाहर से आने वाले शराबी तत्व गांव को असुरक्षित बना रहे थे।

इसी गंभीर स्थिति ने महिलाओं को एकजुट किया। उन्होंने तय किया कि अब सिर्फ शिकायत नहीं, बल्कि स्थायी समाधान (Permanent Solution) चाहिए।

ग्रामसभा में उठा ऐतिहासिक कदम

देवभोग पुलिस की मौजूदगी में आयोजित ग्रामसभा में महिला सरपंच बेलमति पाथर ने पूर्ण शराब बंदी प्रस्ताव (Liquor Prohibition Resolution) रखा। इसके बाद गांव के हर वर्ग से राय ली गई। लंबी चर्चा के बाद आम सहमति बनी कि झरगांव में:

  • अब कच्ची महुआ शराब नहीं बनेगी

  • ओडिशा से आने वाली शराब पर पूरी तरह रोक लगेगी

  • गांव का कोई भी व्यक्ति शराब का सेवन नहीं करेगा

यह निर्णय सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ दिया गया।

Women-led Social Reform: हर घर से शुरू होगी शराबबंदी

इस अभियान की सबसे बड़ी ताकत बनीं गांव की महिलाएं। तय किया गया कि हर महिला अपने घर से शराबबंदी की शुरुआत करेगी। पुरुषों को समझाना, बच्चों को रोकना और घर में शराब प्रवेश न करने देना महिलाओं की सामूहिक जिम्मेदारी होगी।

यह फैसला एक तरह से Grassroots Social Reform का उदाहरण बन गया है, जहां कानून से पहले समाज ने खुद बदलाव का बीड़ा उठाया।

जिस वार्ड में शराब बिकी, जिम्मेदार होगा पंच

ग्रामसभा में एक बेहद सख्त और अनोखा निर्णय भी लिया गया। तय हुआ कि अगर किसी वार्ड में शराब बिकती पाई गई, तो उस वार्ड का पंच जिम्मेदार माना जाएगा। सिर्फ कानूनी कार्रवाई ही नहीं, बल्कि जनता उसके राजनीतिक भविष्य (Political Accountability) पर भी फैसला करेगी।

शराब बेचने वालों के खिलाफ ग्राम स्तर पर सामाजिक बहिष्कार और पुलिस कार्रवाई दोनों रास्ते अपनाए जाएंगे।

21 से ज्यादा ठिकानों पर बिक रही थी शराब

हकीकत यह थी कि झरगांव में 21 से ज्यादा स्थानों पर अवैध शराब बिक्री (Illegal Liquor Trade) चल रही थी। शाम होते ही आसपास के गांवों से लोग यहां शराब पीने पहुंचते थे। कच्ची महुआ शराब के साथ-साथ पड़ोसी राज्य ओडिशा से लाई गई शराब धड़ल्ले से बिकती थी।

महिला समूहों ने एक महीने पहले ही शराब बेचने वालों की सूची पुलिस को सौंपी थी। इसके बाद पुलिस ने Liquor Crackdown शुरू किया।

पुलिस का भरोसा, हर कदम पर साथ

थाना प्रभारी फैजुल शाह हुदा ने बताया कि उच्च अधिकारियों के निर्देश पर पूरे थाना क्षेत्र में अवैध शराब के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है। झरगांव से सूचना मिलते ही कार्रवाई की गई और कई ठिकानों को बंद कराया गया।

ग्रामसभा में पुलिस अधिकारियों ने भरोसा दिलाया कि नियमित पेट्रोलिंग (Regular Police Patrolling) होगी और शराबबंदी अभियान को सफल बनाने में पुलिस हर समय गांव के साथ खड़ी रहेगी।

24 दिसंबर को जागरूकता रैली

यह आंदोलन यहीं नहीं रुकेगा। तय किया गया है कि 24 दिसंबर को गांव की महिलाएं पुलिस के साथ मिलकर Awareness Rally against Alcohol निकालेंगी। पंचायत और पुलिस मिलकर लगातार जागरूकता अभियान चलाएंगे, ताकि शराबबंदी सिर्फ फैसला नहीं, बल्कि स्थायी सामाजिक बदलाव (Sustainable Social Change) बने।

झरगांव बना रोल मॉडल

झरगांव की नारी शक्ति (Women Empowerment in Tribal Areas) ने यह साबित कर दिया कि अगर महिलाएं ठान लें, तो सामाजिक बुराइयों की जड़ हिलाई जा सकती है। यह पहल सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि उन तमाम पंचायतों के लिए प्रेरणा है, जहां शराब आज भी परिवार, शिक्षा और भविष्य को निगल रही है।

आज झरगांव सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि शराब के खिलाफ आदिवासी चेतना (Tribal Resistance against Alcohol) की पहचान बन चुका है।

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