20 साल की बेटी ने तड़प-तड़प कर दोड़ा दम : मां डॉक्टरों के आगे खून के लिए गिड़गिड़ाई; स्टाफ ने 1 यूनिट ब्लड नहीं दिया, थम गईं सांसें
छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिला अस्पताल से मानवता को शर्मसार कर देने वाला मामला सामने आया है। भिलाई की रहने वाली एक 20 साल की सिकल सेल पीड़ित युवती की इलाज के दौरान दर्दनाक मौत हो गई। परिजनों का आरोप है कि युवती के शरीर में खून की भारी कमी थी और वह जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही थी।
इसके बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने उसे एक यूनिट ब्लड तक नहीं दिया। समय पर खून न मिलने के कारण आखिरकार उसने दम तोड़ दिया। मृतका की मां डॉक्टरों और अस्पताल स्टाफ के सामने हाथ जोड़कर अपनी बेटी के लिए खून की भीख मांगती रही, लेकिन सिस्टम का दिल नहीं पघला।
हीमोग्लोबिन बचा था सिर्फ 5 ग्राम, फिर भी स्टाफ ने नहीं दिया खून
मरोदा (भिलाई) की रहने वाली 20 वर्षीय दीपिका गाड़ा पिछले कई दिनों से गंभीर रूप से बीमार थी। शनिवार रात करीब 11 बजे जब उसके हाथ-पैर और पूरे शरीर का दर्द असहनीय हो गया, तो परिजन उसे एम्बुलेंस से जिला अस्पताल लेकर पहुंचे।
डॉक्टरों ने जांच के बाद बताया कि दीपिका सिकल सेल एनीमिया से पीड़ित है और उसके शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर गिरकर महज 5 ग्राम रह गया है, उसे तुरंत खून चढ़ाने की जरूरत है।
परिजनों के मुताबिक, अस्पताल स्टाफ ने उनसे तुरंत 3 यूनिट ब्लड के लिए डोनर (रक्तदाता) की व्यवस्था करने को कहा। परिवार बेहद गरीब और असहाय था, इसलिए वे आधी रात को तुरंत डोनर नहीं जुटा सके।

नहीं पिघला सिस्टम
दीपिका की मां ने ब्लड बैंक और ड्यूटी स्टाफ से मिन्नतें कीं कि "अभी मेरी बेटी को बचा लो, एक यूनिट ब्लड दे दो, बाकी की व्यवस्था हम सुबह कर लेंगे।" लेकिन नियमों का हवाला देकर उसे टाल दिया गया। सोमवार शाम को बिना खून मिले तड़प-तड़प कर दीपिका की मौत हो गई। बेटी की मौत के बाद बदहवास मां अस्पताल के गेट पर बैठकर रोती रही।
अस्पताल के 'बॉस' ने भी माना- "खून मिल जाता, तो शायद बच जाती जान"
इस पूरे मामले में जब हड़कंप मचा, तो जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. आशीषन मिंज का बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने खुद माना कि अस्पताल के सिस्टम से गंभीर लापरवाही हुई है:
"युवती का ब्लड ग्रुप ओ-पॉजिटिव था। अगर परिजनों के पास तुरंत डोनर नहीं था, तो भी इमरजेंसी को देखते हुए अस्पताल के अपने रिजर्व स्टॉक से उसे कम से कम एक या दो यूनिट ब्लड दिया जाना चाहिए था। अगर समय पर खून चढ़ाया जाता, तो शायद बच्ची की जान बचाई जा सकती थी। मुझे इस बात की जानकारी नहीं दी गई, अगर परिजन सीधे मेरे पास आते, तो मैं खुद ब्लड की व्यवस्था करवाता।" — डॉ. आशीषन मिंज, सिविल सर्जन
अब मौत के बहाने तलाश रहा प्रशासन, जांच टीम गठित
एक तरफ जहां लापरवाही जगजाहिर है, वहीं दूसरी तरफ सिविल सर्जन ने यह भी कहा कि मौत की असली वजह केवल खून की कमी नहीं हो सकती। आईसीयू (ICU) के डॉक्टरों के हवाले से उन्होंने आशंका जताई है कि युवती को 'एस्पिरेशन' (Aspiration) की समस्या भी हो सकती है, यानी खाना या कोई अन्य पदार्थ सांस की नली के रास्ते फेफड़ों में पहुंच गया हो, जिससे दम घुट गया।
सिविल सर्जन ने कहा कि मौत की असली वजह पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही साफ होगी। हालांकि, मामले की गंभीरता को देखते हुए एक उच्चस्तरीय जांच टीम बना दी गई है और परिजनों को दोषियों पर कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिया गया है। परिजनों ने सिविल सर्जन को लिखित आवेदन सौंपकर पूरी घटना की न्यायिक जांच और अस्पताल स्टाफ को सस्पेंड करने की मांग की है।
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