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: Gandhi Jayanti: दमोह में डॉ.दुआ की शेव्रले कार से बापू ने घूमा था शहर, यहां रखी थी गुरुद्वारे की नींव

News Desk / Sat, Oct 1, 2022


राष्ट्रपिता महात्मा गांधी आजादी के अहिंसावादी योद्धा थे। स्वतंत्रता आंदोलनों के समय महात्मा गांधी ने देश के कई राज्यों समेत मध्यप्रदेश का भी दौरा किया था। 1933 में बापू पहली बार दमोह आए थे, तब उस समय की सबसे महंगी कार शेव्रले में उन्हें शहर का भ्रमण कराया गया था।  बापू को गढ़ाकोटा से दमोह तक उसी कार से लाया गया था। वह कार दमोह के प्रतिष्ठित डॉक्टर दुआ की थी, उस समय कार को जगन्नाथ पटेरिया ने चलाया था। बापू ने दमोह पहुंचकर शहर के मोरगंज गल्ला मंडी में सभा की थी, जिसमें करीब 10 हजार लोग शामिल हुए थे। उसके बाद वह मलिन बस्ती वर्तमान में गड़रयाओ मोहल्ला पहुंचे और वहां गुरुद्वारे की नींव रखी थी। आज भी उस गुरुद्वारे का संचालन वाल्मीकि समाज कर रहा है।

शहर के प्रतिष्ठित डॉक्टर तरुण दुआ बताते हैं कि उनके दादा डॉक्टर बीडी दुआ उस समय जेल डॉक्टर थे, लेकिन गांधी जी से प्रभावित होकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी थी और देश की आजादी के लिए कूद पड़े थे। दमोह आने से पहले गांधी जी गढ़ाकोटा में रुके थे, जहां से उन्हें दमोह आना था। इसलिए उनके दादा ने उनके करीबी जगन्नाथ पटेरिया को अपनी शेव्रले कार दी और कहा कि वह गांधी जी को इसी कार से दमोह लेकर आए। जगन्नाथ पटेरिया भी देशभक्त थे और हमेशा खादी पहनते थे। उस समय उनके दादा की कार में चमड़े के सीट कवर थे। इसलिए उन्हें निकालकर खादी के कपड़े के सीट कवर लगाए गए और फिर गांधी जी को गढ़ाकोटा से दमोह लाया गया। उसी कार से उन्हें दमोह की सैर कराई गई थी।

डॉक्टर तरुण दुआ का कहना है कि जब भी उनके परिजन उन्हें देश की आजादी में उनके दादा का योगदान बताते थे, तो उन्हें काफी गर्व होता था। आज भी उन्हें इस बात पर गर्व है कि उनके परिजनों ने भी देश की आजादी में अपना योगदान दिया। हालांकि लंबा समय होने के कारण उनके पास उस समय की कोई फोटो नहीं है।
 

गांधी जी के दमोह आगमन के एक प्रत्यक्ष गवाह पूर्व विधायक स्वर्गीय आनंद श्रीवास्तव हमेशा बताते थे कि जब गांधी जी दमोह आए थे, उस समय अंग्रेजों ने सिक्के के रूप में एक चांदी की चवन्नी यानी 25 पैसे के चलन को शुरू किया था। उसी चवन्नी को लेकर दमोह में एक नारा तैयार किया गया, जिसमें कहा गया था, एक चवन्नी चांदी की जय बोल महात्मा गांधी की। दमोह में बना यह नारा पूरे देश में चलन में आया था। वह बताते थे कि उस समय वह छोटे थे, लेकिन उन्होंने घंटाघर पर गांधीजी को करीब से देखा था और उस नारे की गूंज सुनी थी।

दमोह प्रवास के दौरान गांधीजी ने शहर के गड़रयाओ मोहल्ले में गुरुद्वारे की स्थापना की थी जिसका एक शिलालेख वहां मौजूद है। गुरुद्वारे की देखरेख वाल्मीकि समाज द्वारा की जाती है।


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