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: परसा कोयला ब्लॉक: हसदेव अरण्य खनन परियोजना पर रोक से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, कहा- विकास के रास्ते में न आएं

News Desk / Mon, Dec 19, 2022


सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social media

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छत्तीसगढ़ के सरगुजा में हसदेव अरण्य स्थित परसा कोल ब्लॉक खनिज परियोजना पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को रोक लगाने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा है कि विकास के रास्ते में न आएं। वहीं परियोजना का विरोध कर रहे लोग फिर से एकत्र हो गए। उनके आंदोलन के 275 दिन पूरे हो गए हैं। ग्रामीणों ने छत्तीसगढ़ सरकार की नीतियों पर रोष जताते हुए आंदोलन तेज करने की बात कही है। 

लंबित याचिकाओं को खनन के खिलाफ नहीं माना जाएगा
दरअसल, परसा कोल ब्लॉक के आदिवासी भू-विस्थापितों ने शुक्रवार को याचिका दायर की थी। इस पर जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस विक्रम नाथ की बेंच में सुनवाई हुई। बेंच ने किसी भी तरह की अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि, परसा कोयला ब्लॉक के लिए भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली लंबित याचिकाओं को खनन के खिलाफ किसी भी तरह के प्रतिबंध के रूप में नहीं माना जाएगा।

कोर्ट ने कहा- हम अंतरिम राहत देने से इनकार करते हैं
बेंच ने कहा कि, 'हम विकास के रास्ते में नहीं आना चाहते हैं और हम इस पर बहुत स्पष्ट हैं। हम कानून के तहत आपके अधिकारों का निर्धारण करेंगे लेकिन विकास की कीमत पर नहीं।' कहा कि, 'अंतरिम राहत से इनकार किया जाता है। हम स्पष्ट करते हैं कि इन अपीलों का लंबित रहना परियोजना के रास्ते में नहीं आएगा। कोर्ट अपीलकर्ताओं की ओर से तर्कों में ठोस पाता है तो क्षतिपूर्ति के लिए निर्देशित किया जा सकता है।  

यह भी पढ़ें...राजस्थान में उजाले के लिए 'हसदेव' पर आरी:6 घंटे में 2000 पेड़ काटे, खदान का विरोध कर रहे ग्रामीण गिरफ्तार

आंदोलनकारी बोले- स्वीकृति रद्द होने तक जारी रहेगा आंदोलन
वहीं हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति के संयोजक उमेश्वर आर्मो ने कहा कि राज्य सरकार ने परसा खदान की वन स्वीकृति को निरस्त करने केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को पत्र लिखा है। इसमें जन आक्रोश की बात है, लेकिन फर्जी ग्राम सभा और पर्यावरणीय चिंताओं के कोई उल्लेख नहीं किया। वे स्वयं ही अंतिम वन स्वीकृति निरस्त कर सकते हैं। जब तक सभी खदानें आधिकारिक रूप से निरस्त नहीं कि जाती, आंदोलन जारी रहेगा। 

फर्जी एफआईआर कराने का आरोप 
साल्ही गांव से रामलाल करियाम, फत्तेपुर से मुनेश्वर पोर्ते ने कहा कि हमारे आंदोलन को कमजोर करने लगातार कंपनी और प्रशासन फर्जी एफआईआर करा रहे हैं। इन हथकंडों से हम कमजोर नहीं होंगे। यह आंदोलन भी तेज होगा। व्यापक जन समर्थन इस संघर्ष के साथ जुड़ा है। हसदेव अरण्य को बचाने नए साल में अगले महीने हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति छत्तीसगढ़ के सभी जनवादी संघर्षों और प्रकृति प्रेमी लोगों से सम्मेलन में शामिल होने का आह्वान करेगी।

राजस्थान की बिजली के लिए हो रहा खनन
हसदेव अरण्य से पेड़ों को काटने का पूरा मामला राजस्थान की बिजली से जुड़ा हुआ है। राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम को परसा ईस्ट केते बासन कोयला खदान 2012 में आवंटित हुई थी। 2019 में इसके दूसरे फेज का प्रस्ताव आया था। इसमें परियोजना के लिए 348 हेक्टेयर राजस्व भूमि, 1138 हेक्टेयर वन भूमि के अधिग्रहण सहित करीब 4 हजार की आबादी वाले पूरे घाटबर्रा गांव को विस्थापित करने का प्रस्ताव है। इसको लेकर मार्च में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने CM भूपेश बघेल से रायपुर में मुलाकात भी की थी। इसके बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने अप्रैल में मंजूरी दे दी। जबकि केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय जुलाई 2019 में ही माइंस को मंजूरी दे चुका है। 

विस्तार

छत्तीसगढ़ के सरगुजा में हसदेव अरण्य स्थित परसा कोल ब्लॉक खनिज परियोजना पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को रोक लगाने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा है कि विकास के रास्ते में न आएं। वहीं परियोजना का विरोध कर रहे लोग फिर से एकत्र हो गए। उनके आंदोलन के 275 दिन पूरे हो गए हैं। ग्रामीणों ने छत्तीसगढ़ सरकार की नीतियों पर रोष जताते हुए आंदोलन तेज करने की बात कही है। 

लंबित याचिकाओं को खनन के खिलाफ नहीं माना जाएगा
दरअसल, परसा कोल ब्लॉक के आदिवासी भू-विस्थापितों ने शुक्रवार को याचिका दायर की थी। इस पर जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस विक्रम नाथ की बेंच में सुनवाई हुई। बेंच ने किसी भी तरह की अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि, परसा कोयला ब्लॉक के लिए भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली लंबित याचिकाओं को खनन के खिलाफ किसी भी तरह के प्रतिबंध के रूप में नहीं माना जाएगा।

कोर्ट ने कहा- हम अंतरिम राहत देने से इनकार करते हैं
बेंच ने कहा कि, 'हम विकास के रास्ते में नहीं आना चाहते हैं और हम इस पर बहुत स्पष्ट हैं। हम कानून के तहत आपके अधिकारों का निर्धारण करेंगे लेकिन विकास की कीमत पर नहीं।' कहा कि, 'अंतरिम राहत से इनकार किया जाता है। हम स्पष्ट करते हैं कि इन अपीलों का लंबित रहना परियोजना के रास्ते में नहीं आएगा। कोर्ट अपीलकर्ताओं की ओर से तर्कों में ठोस पाता है तो क्षतिपूर्ति के लिए निर्देशित किया जा सकता है।  

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आंदोलनकारी बोले- स्वीकृति रद्द होने तक जारी रहेगा आंदोलन
वहीं हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति के संयोजक उमेश्वर आर्मो ने कहा कि राज्य सरकार ने परसा खदान की वन स्वीकृति को निरस्त करने केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को पत्र लिखा है। इसमें जन आक्रोश की बात है, लेकिन फर्जी ग्राम सभा और पर्यावरणीय चिंताओं के कोई उल्लेख नहीं किया। वे स्वयं ही अंतिम वन स्वीकृति निरस्त कर सकते हैं। जब तक सभी खदानें आधिकारिक रूप से निरस्त नहीं कि जाती, आंदोलन जारी रहेगा। 

फर्जी एफआईआर कराने का आरोप 
साल्ही गांव से रामलाल करियाम, फत्तेपुर से मुनेश्वर पोर्ते ने कहा कि हमारे आंदोलन को कमजोर करने लगातार कंपनी और प्रशासन फर्जी एफआईआर करा रहे हैं। इन हथकंडों से हम कमजोर नहीं होंगे। यह आंदोलन भी तेज होगा। व्यापक जन समर्थन इस संघर्ष के साथ जुड़ा है। हसदेव अरण्य को बचाने नए साल में अगले महीने हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति छत्तीसगढ़ के सभी जनवादी संघर्षों और प्रकृति प्रेमी लोगों से सम्मेलन में शामिल होने का आह्वान करेगी।


राजस्थान की बिजली के लिए हो रहा खनन
हसदेव अरण्य से पेड़ों को काटने का पूरा मामला राजस्थान की बिजली से जुड़ा हुआ है। राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम को परसा ईस्ट केते बासन कोयला खदान 2012 में आवंटित हुई थी। 2019 में इसके दूसरे फेज का प्रस्ताव आया था। इसमें परियोजना के लिए 348 हेक्टेयर राजस्व भूमि, 1138 हेक्टेयर वन भूमि के अधिग्रहण सहित करीब 4 हजार की आबादी वाले पूरे घाटबर्रा गांव को विस्थापित करने का प्रस्ताव है। इसको लेकर मार्च में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने CM भूपेश बघेल से रायपुर में मुलाकात भी की थी। इसके बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने अप्रैल में मंजूरी दे दी। जबकि केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय जुलाई 2019 में ही माइंस को मंजूरी दे चुका है। 

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