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: गरियाबंद में कितने लाख में बिका सिस्टम ? 44 महीने नो वर्क, लेकिन सेटिंगबाज को फुल पेमेंट और मनचाही पोस्टिंग, करप्शन तले किसने खोदी सिस्टम की कब्र ?

गिरीश जगत, गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिला पंचायत में भ्रष्टाचार और सेटिंग का खेल एक बार फिर सुर्खियों में है। सरकारी आदेश की खुलेआम अवहेलना करने वाले पंचायत सचिव को जिला पंचायत ने न केवल बचा लिया, बल्कि उसे मनपसंद पंचायत में पदस्थापना भी दे दी।

इतना ही नहीं, 44 महीने तक अनुपस्थित रहने के बावजूद उसे लाखों रुपए का भुगतान कर दिया गया। जबकि दूसरी ओर, जीवकोपार्जन राशि के लिए भटक रहे 10 से ज्यादा पंचायत सचिवों की पुकार किसी ने नहीं सुनी। इस दोहरे रवैये ने पंचायत व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

बोगस एंट्री से लेकर सचिव पर मेहरबानी तक

पिछले दिनों पीएम आवास की प्रगति रिपोर्ट में बोगस एंट्री को लेकर जिला पंचायत गरियाबंद की कलई उच्चस्तरीय बैठक में खुल चुकी थी। अब नया मामला पंचायत सचिव समारु राम ध्रुव से जुड़ा है। यह वही सचिव है जिसे शोभा पंचायत में रहते हुए निर्माण कार्यों में गड़बड़ी के आरोप में निलंबित किया गया था।

बाद में 2021 में बहाल कर उसे तेतलखूंटी पंचायत पदस्थ किया गया, लेकिन नियम-कानून को ताक पर रखकर सचिव ने आदेश मानने से ही इंकार कर दिया और पूरे 44 माह तक कार्य से अनुपस्थित रहा। जनपद पंचायत लगातार नोटिस जारी करती रही, जानकारी जिला पंचायत को भी भेजी गई, लेकिन सचिव न तो जवाब देता और न ही हाजिर हुआ।

"नो वर्क, नो पे" की धज्जियां – फिर भी लाखों की पेमेंट

जिला पंचायत सदस्य संजय नेताम ने कलेक्टर भगवान सिंह को सौंपे ज्ञापन में आरोप लगाया है कि पंचायत सचिवों को अर्जित अवकाश का कोई प्रावधान नहीं है। बावजूद इसके, समारु राम ध्रुव को “नो वर्क, नो पे” की अवधि में भी लाखों रुपये का भुगतान कर दिया गया। इतना ही नहीं, जिला पंचायत ने जनपद की राय लिए बिना उसे सीधे मनचाही पंचायत में पदस्थ कर दिया।

संजय नेताम का कहना है कि जब पूरा रिकॉर्ड जनपद पंचायत के पास मौजूद था, तब संबंधित सचिव को उपकृत करने से पहले जनपद से अभिमत लेना जरूरी था। लेकिन सेटिंग और संरक्षण के चलते नियम-कायदे ताक पर रख दिए गए।

साधारण सचिव भूखे – मगर सेटिंग वालों पर मेहरबानी

संजय नेताम ने बताया कि मैनपुर जनपद क्षेत्र में 10 से अधिक निलंबित पंचायत सचिव ऐसे हैं जिन्हें नियम अनुसार गुजारा भत्ता (पगार का आधा) तक नहीं दिया गया है। वजह साफ है – ये सचिव "सेटिंग" नहीं कर पाए। जबकि समारु राम ध्रुव को नियम विरुद्ध लाखों का भुगतान कर जिला पंचायत ने उसे उपकृत कर दिया।

उन्होंने पूर्व जिला पंचायत सीईओ के कार्यकाल पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि एक कर्मचारी ने नियम विरुद्ध खुद को पंचायत उप संचालक बनाकर बैठा और उसी दौरान इस गड़बड़ी को अंजाम दिया।

अफसरों की चुप्पी और कलेक्टर का वादा

मामले पर जब जिला पंचायत सीईओ प्रखर चंद्राकर से संपर्क करने की कोशिश की गई तो उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया और न ही संदेश का जवाब दिया। दूसरी ओर, कलेक्टर भगवान सिंह उईके ने शिकायत मिलने के बाद कहा कि इस पूरे मामले की विधिवत जांच कर आवश्यक कार्यवाही की जाएगी।

सवालों के घेरे में जिला पंचायत

यह मामला सिर्फ एक सचिव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरा सिस्टम सवालों के घेरे में है। एक ओर नियम पालन करने वाले सचिव महीनों से गुजारा भत्ता पाने के लिए भटक रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आदेश की अवहेलना करने वाले को संरक्षण, मनपसंद पदस्थापना और लाखों का भुगतान मिल रहा है।

आखिर यह दोहरा मापदंड क्यों? क्या नियम सिर्फ उन पर लागू होते हैं जो सेटिंग नहीं कर पाते? गरियाबंद की पंचायत व्यवस्था में फैले इस भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद ने सरकारी योजनाओं और ग्रामीण विकास के पूरे सिस्टम की साख पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।

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