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: इस मंदिर में हिंदू-मुस्लिम एक साथ टेकते हैं माथा: पट खुलते ही पहले जलता है लोबान, फिर होती है मां चंडी की पूजा

News Desk

News Desk / Mon, Feb 6, 2023

इस मंदिर में हिंदू-मुस्लिम एक साथ टेकते हैं माथा: पट खुलते ही पहले जलता है लोबान, फिर होती है मां चंडी की पूजा

एक ओर जब देश में जाति और धर्म को लेकर माहौल गरमाया हुआ है, वहां छत्तीसगढ़ का एक मंदिर हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल है। इस मंदिर में दोनों ही धर्म के लोग एक साथ माथा टेकते हैं। मंदिर के पट खुलते हैं तो पहले लोबान जलाई जाती है और वहां से प्रांगण में स्थित मजार के लिए चादर निकलती है। इसके बाद दोनों मिलकर मां चंडी की पूजा-अर्चना करते हैं। खास बात यह है किदेवी की मूर्ति पर इस्लामिक झंडा भी लगा हुआ है। 

सब मिल-जुलकर करते हैं पूजा
यह मंदिर है, बालोद जिले में गुंडरदेही के हटरी बाजार में। इसे चंडी मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर पर जहां एक और चंडी मैया की पूजा की जाती है तो वहीं दूसरी ओर सैयद बाबा का हरे रंग का पवित्र 786 का पताका भी लहरा रहा है। यहां पर सभी धर्म मिल-जुलकर पूजा अर्चना करते हैं। पूर्व विधायक और मंदिर के संस्थापक परिवार के सदस्य राजेंद्र कुमार राय ने बताया कि हिंदू मुस्लिम का टकराव कभी नहीं हुआ, सब मिलकर रहते हैं। 

100 साल पुराना है मंदिर का इतिहास
स्थानीय लोग बताते हैं कि मंदिर का इतिहास करीब 100 साल पुराना है। सैयद बाबा की पूजा और मां चंडी की पूजा भी उतनी ही पुरानी है। पुजारी खोरबाहरा राम ने बताया कि, सैयद बाबा की मजार पूर्वजों ने स्थापित की थी। जितनी पूजा माता की होती है, उतनी ही सैयद बाबा की भी। हिंदू-मुस्लिम के बीच कोई भी दूरी नहीं हैं। सैयद बाबा के नाम से दुख-दर्द दूर होते हैं। नवरात्रि पर विधि-विधान से ज्योति कलश स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती है।

किसी ने नहीं किया कोई दावा
गुंडरदेही नगर के सदर मोहम्मद आरिफ खान ने बताया कि, यहां पर बाबा अलाउद्दीन बगदादी और चंडी मंदिर समिति का लगाव है। यहां पर कभी कोई भेदभाव नहीं हुआ। यहां पर जो राजपरिवार है, राजा साहब है, उन्होंने मजार का एक टुकड़ा या फिर सेहरा मंदिर में रखा हुआ है। कभी किसी मुसलमान ने इसे अपना होने का दावा किया, ना किसी हिंदू ने इस मंदिर पर अपना अधिकार जताया। यह ऐसी जगह है जहां हिंदू-मुस्लिम सब एक हैं।

तालाब से निकली थी मूर्ति और पवित्र चांद
स्थानीय लोगों ने बताया कि चंडी माता की मूर्ति स्थानीय रामसागर तालाब से निकली थी और उसके साथ ही मुस्लिम समुदाय का पवित्र चांद भी निकला। राजेंद्र कुमार राय ने बताया कि उनके दादाजी ठाकुर निहाल सिंह जो क्षेत्र के अंतिम जमीदार हुए, उन्होंने इस मंदिर की स्थापना की थी। माता की स्थापना के साथ यहां पर एक हरा पवित्र सैयद बाबा साहब का 786 वाला चादर भी लगाया गया। तब से आज तक यह मंदिर वसुधैव कुटुंबकम के तर्ज पर लोगों को जोड़े हुए है।


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