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'3 बार के विधायक का ससुराल, फिर भी सड़क को तरस रहा गांव' : ग्रामीणों का गुस्सा फूटा, मौहारी-देवरा मार्ग के लिए खुद उठाई कुदाली, 15 हजार वोटर करेंगे चुनाव बहिष्कार और आंदोलन

'3 बार के विधायक का ससुराल, फिर भी सड़क को तरस रहा गांव' : ग्रामीणों का गुस्सा फूटा, मौहारी-देवरा मार्ग के लिए खुद उठाई कुदाली, 15 हजार वोटर करेंगे चुनाव बहिष्कार और आंदोलन

पुष्पराजगढ़ (अनूपपुर)। अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ विधानसभा क्षेत्र से तीन बार लगातार विधायक चुने गए फुन्देलाल सिंह मार्को के अपने ससुराल इलाके में ही विकास की धज्जियां उड़ रही हैं। ग्राम मौहारी से देवरा और जरही को जोड़ने वाली कोई पक्की सड़क न होने से परेशान ग्रामीणों का सब्र का बांध अब पूरी तरह टूट चुका है।

मौहारी के लोगों को सड़क नहीं होने के चलते 25 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है। यदि सड़क बन जाए, तो 12 किमी ही सफर करना पड़ेगा।

कच्चे और गड्ढों में तब्दील हो चुके रास्तों पर जब जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की नजर नहीं पड़ी, तो ग्रामीणों ने खुद ही रास्ता सुधारने का बीड़ा उठा लिया है।

रोजमर्रा की जिंदगी ठप, 15 हजार की आबादी प्रभावित

मौहारी से देवरा और मौहारी से जरही मार्ग की स्थिति इतनी बदतर है कि पैदल चलना भी किसी जोखिम से कम नहीं है।

रोजाना काम पर जाने वाले मजदूरों, स्कूल-कॉलेज जाने वाले बच्चों और इलाज के लिए निकलने वाले बुजुर्गों को मुख्य मार्ग से कई किलोमीटर घूमकर जाना पड़ता है।

एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती और किसानों को अपनी उपज मंडी तक ले जाने में भारी मशक्कत करनी पड़ती है।

भूख हड़ताल से लेकर वोट बहिष्कार तक की चेतावनी

नेताओं के खोखले आश्वासनों से तंग आकर ग्रामीणों ने अब आर-पार की लड़ाई का रोडमैप तैयार कर लिया है।

मुख्यमंत्री, कलेक्टर, सीईओ, सांसद और स्थानीय विधायक को ज्ञापन सौंपकर जल्द सड़क निर्माण की मांग की जाएगी।

मांग पूरी न होने पर मौहारी गांव में ग्रामीण एकजुट होकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठेंगे।

इलाके के प्रभावित करीब 15 हजार मतदाताओं ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया है कि यदि सड़क का काम शुरू नहीं हुआ, तो आगामी चुनावों में पूर्ण रूप से मतदान का बहिष्कार करेंगे।

'जनता बनाएगी अपना रास्ता'— ग्रामीणों का बड़ा संदेश

ग्रामीणों का कहना है कि जब तीन बार विधायक रहने के बावजूद उनके अपने ससुराल भालूचुआ और आसपास के गांवों की सुध नहीं ली गई, तो अब प्रशासन का मुंह ताकने का कोई औचित्य नहीं है। ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से श्रमदान शुरू कर दिया है ताकि अस्थायी रूप से रास्ते को चलने लायक बनाया जा सके, जो क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली पर सीधा करारा तंज है।

बाइक सवारों के लिए सड़क बनी खतरा

ग्रामीणों के मुताबिक, सड़क पर जगह-जगह बड़े गड्ढे और कीचड़ हैं। बारिश के बाद कई गड्ढों में पानी भर जाता है और उनकी गहराई का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में बाइक सवारों के फिसलकर गिरने का खतरा बना रहता है।

ग्रामीणों का कहना है कि कई बार बाइक सवार कीचड़ में संतुलन खो देते हैं। सामान लेकर आने-जाने वाले लोगों के लिए भी रास्ता बेहद मुश्किल हो जाता है। उनका कहना है कि सड़क सुविधा देने के बजाय लोगों के लिए रोज की परीक्षा बन गई है।

फोर व्हीलर तो छोड़िए, गाड़ी निकालना भी मुश्किल

ग्रामीणों के मुताबिक, बारिश के दौरान हालात ऐसे हो जाते हैं कि फोर व्हीलर वाहनों का निकलना तक मुश्किल हो जाता है। कीचड़ में वाहन फंसने का खतरा रहता है और बड़े गड्ढों के कारण वाहन चालकों को काफी सावधानी से निकलना पड़ता है।

ग्रामीणों का कहना है कि सामान्य दिनों में किसी तरह आवागमन हो जाता है, लेकिन बारिश में सड़क की हालत पूरी तरह बिगड़ जाती है। मरीज को अस्पताल ले जाना हो या जरूरी काम से बाहर जाना हो, हर बार रास्ता चुनौती बन जाता है।

मरीजों और जरूरतमंदों की परेशानी अलग

ग्रामीणों का कहना है कि सड़क खराब होने का सबसे गंभीर असर आपात स्थिति में दिखाई देता है। बीमार व्यक्ति को अस्पताल ले जाने के दौरान खराब रास्ते से वाहन निकालना मुश्किल होता है। बारिश के समय यह परेशानी और बढ़ जाती है।

ग्रामीणों का सवाल है कि गांव की सड़क सिर्फ आने-जाने का रास्ता नहीं है। इसी रास्ते से स्कूल, अस्पताल, बाजार और रोजमर्रा की जरूरतों तक पहुंचना है। फिर भी वर्षों से सड़क की समस्या को गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया?

किसानों का काम भी प्रभावित

खराब सड़क का असर किसानों पर भी पड़ रहा है। ग्रामीणों के मुताबिक, बारिश के मौसम में कीचड़ और गड्ढों के कारण कृषि सामग्री लाने-ले जाने और उपज बाहर पहुंचाने में परेशानी होती है।

ग्रामीणों का कहना है कि जब सड़क पर वाहन आसानी से नहीं चल सकते तो खेती से जुड़े सामान और उपज के परिवहन की लागत और परेशानी दोनों बढ़ती हैं। जिस सड़क से गांव की अर्थव्यवस्था चलती है, उसी सड़क की हालत वर्षों से बदहाल है।

नेताओं से सवाल- मंच पर जो कहा था, वह जमीन पर कब उतरेगा?

ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव और राजनीतिक कार्यक्रमों में गांव की सड़क, विकास और सुविधाओं की बातें होती हैं, लेकिन चुनाव बीतने के बाद वही समस्याएं पीछे छूट जाती हैं। ग्रामीण बीजेपी और कांग्रेस दोनों से सवाल कर रहे हैं। उनका कहना है कि कांग्रेस विधायक फुंदेलाल सिंह मार्को और शहडोल की बीजेपी सांसद हिमाद्री सिंह भी इस क्षेत्र की जनता की समस्या पर जवाब दें।

ग्रामीणों का सवाल है कि अगर सड़क बनाना सरकार और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है तो चार साल से सड़क का इंतजार क्यों? क्या घोषणा सिर्फ मंच और भाषण तक सीमित थी? ग्रामीणों का कहना है कि अब उन्हें नेताओं के दौरे या आश्वासन नहीं, सड़क पर काम दिखाई देना चाहिए।

15 हजार वोटर, अब सवाल वोट का भी

ग्रामीणों के मुताबिक, मौहारी, परसेल, देवरा, भालूचुआ समेत संबंधित पंचायतों को मिलाकर करीब 15 हजार वोटर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इतने बड़े इलाके की आबादी वर्षों से सड़क की समस्या झेल रही है, लेकिन उनकी आवाज को गंभीरता से नहीं लिया गया।

अब ग्रामीणों का कहना है कि जिस वोट की जरूरत नेताओं को चुनाव के समय होती है, उसी वोटर को सड़क के लिए चार साल इंतजार क्यों करना पड़े? अगर सड़क को लेकर ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो ग्रामीण सामूहिक रूप से चुनाव बहिष्कार के विकल्प पर विचार करेंगे।

चार साल की घोषणा का पूरा हिसाब चाहिए

ग्रामीण अब जानना चाहते हैं कि विकास यात्रा के दौरान सड़क को लेकर वास्तव में क्या घोषणा हुई थी। सड़क की लंबाई कितनी बताई गई थी, बजट कितना था, किस योजना से सड़क बननी थी, काम कब शुरू होना था और किस विभाग को इसकी जिम्मेदारी दी गई थी—इन सभी सवालों के जवाब मांगे जा रहे हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि अगर सड़क के लिए सरकारी स्तर पर प्रस्ताव बना था तो उसकी फाइल कहां पहुंची? बजट स्वीकृत हुआ था तो काम क्यों नहीं हुआ? टेंडर हुआ था तो ठेकेदार कौन था? और अगर कुछ भी नहीं हुआ तो चार साल तक ग्रामीणों को किस आधार पर उम्मीद दिखाई गई?

अब अधिकारियों से भी सीधा जवाब मांगेंगे

ग्रामीणों का कहना है कि अब अधिकारी सिर्फ यह कहकर जिम्मेदारी नहीं टाल सकते कि मामला प्रक्रिया में है। उन्हें स्पष्ट बताया जाए कि सड़क किस विभाग के जिम्मे है, DPR बनी या नहीं, प्रशासनिक और तकनीकी स्वीकृति मिली या नहीं, बजट स्वीकृत हुआ या नहीं और काम शुरू होने की तारीख क्या है।

ग्रामीणों की मांग है कि सड़क निर्माण की लिखित समयसीमा दी जाए। उनका कहना है कि अब ‘जल्द काम होगा’, ‘प्रस्ताव भेजा है’ या ‘देख रहे हैं’ जैसे जवाब स्वीकार नहीं किए जाएंगे।

आवेदन बहुत हुए, अब आंदोलन की तैयारी

ग्रामीणों के मुताबिक, सड़क के लिए पहले भी आवेदन और शिकायतें की जा चुकी हैं। लेकिन जब लगातार मांग के बावजूद समस्या दूर नहीं हुई तो अब आंदोलन का रास्ता अपनाने की तैयारी है।

ग्रामीण बैठक कर आंदोलन की तारीख और स्वरूप तय करने की तैयारी कर रहे हैं। इसमें धरना-प्रदर्शन से लेकर चक्काजाम तक का फैसला लिया जा सकता है। ग्रामीणों का कहना है कि आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से शुरू होगा, लेकिन अगर प्रशासन ने गंभीरता नहीं दिखाई तो इसे व्यापक किया जाएगा।

इस बार सवाल सिर्फ सड़क का नहीं, जवाबदेही का है

ग्रामीणों का कहना है कि चार साल पहले जिस ‘विकास यात्रा’ में विकास के बड़े-बड़े दावे किए गए थे, आज उसी विकास का हिसाब जनता मांग रही है। मंच पर भाषण हुए, तालियां बजीं और नेता आगे बढ़ गए—लेकिन गांव की सड़क वहीं की वहीं रह गई।

अब मौहारी समेत आसपास की पंचायतों के ग्रामीण कह रहे हैं कि उन्हें फिर कोई नया भाषण नहीं चाहिए। पुरानी घोषणा का हिसाब चाहिए और सड़क चाहिए। करीब 15 हजार वोटरों वाले इस इलाके की चेतावनी साफ है कि अगर सड़क नहीं बनी तो इस बार सिर्फ ज्ञापन नहीं दिया जाएगा।

आंदोलन होगा, जरूरत पड़ी तो चक्काजाम होगा और चुनाव बहिष्कार का फैसला भी लिया जा सकता है। चार साल का इंतजार खत्म हुआ या नहीं, यह अब घोषणा से नहीं, सड़क पर उतरती मशीनों से तय होगा।

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