Mahakal के 5 बड़े Myth का Fact Check : महाकाल में क्या चिता की भस्म चढ़ती है, रात में नेता क्यों नहीं रुकते, क्या कुर्सी चली जाती है; जानिए सच्चाई ?
MP CG Times / Mon, Aug 17, 2026
Mahakal Bhasma Aarti Booking: Easy Darshan Guide & Entry Rules: महाकाल मंदिर को लेकर जितनी आस्था है, उतने ही इससे जुड़े मिथक भी हैं। कोई कहता है कि भगवान महाकाल को श्मशान की चिता की भस्म चढ़ाई जाती है, कोई मानता है कि जींस-टीशर्ट पहनकर मंदिर जाने पर एंट्री नहीं मिलती, तो कोई दावा करता है कि उज्जैन में कोई राजा या मुख्यमंत्री रात नहीं रुकता।
Mahakal Bhasma Aarti Booking: Easy Darshan Guide & Entry Rules: आखिर इनमें कितना सच है? इसे जानने के लिए हमने उन लोगों से सीधे बात की, जो रोज भस्म आरती और मंदिर की परंपराओं का हिस्सा होते हैं। 5 सवालों में समझते हैं इन दावों की सच्चाई...

सवाल 1: क्या महाकाल को चिता यानी श्मशान की भस्म चढ़ती है?
जवाब: नहीं, यह धारणा गलत है।
भस्म तैयार करने वाले महानिर्वाणी अखाड़े के महंत विनीत गिरी इस धारणा को खारिज करते हैं। उनके मुताबिक, ऐसी कहानियां जरूर सुनने को मिलती हैं, लेकिन इसका कोई दस्तावेज या प्रमाण नहीं है। मंदिर करीब 1000 साल पुराना है और परंपरा के अनुसार शुरू से ही यहीं के अपने धूने (हवनकुंड) से तैयार भस्म भगवान को चढ़ाई जाती रही है, किसी श्मशान से भस्म नहीं लाई जाती।
भगवान शिव को 'मसानवासी', यानी श्मशान में रहने वाला कहा जाता है। माना जाता है कि इसी वजह से यह धारणा बनी कि महाकाल को श्मशान की चिता की भस्म चढ़ाई जाती है। धार्मिक ग्रंथ 'शिव महिम्न स्तोत्र' में चिता-भस्म का उल्लेख जरूर मिलता है, लेकिन इसमें माता सती की भस्म का जिक्र है, किसी आम इंसान की नहीं।
ऐसे तैयार होती है महाकाल की भस्म
तो फिर महाकाल को चढ़ाई जाने वाली भस्म तैयार कैसे होती है? यह जिम्मेदारी मंदिर के पुजारियों की नहीं, बल्कि महानिर्वाणी अखाड़े की है। अखाड़े के 4-5 संत रोज भस्म तैयार करने की प्रक्रिया में शामिल होते हैं।
यह प्रक्रिया गाय के गोबर से शुरू होती है। अखाड़े के आश्रम में मौजूद 8-10 देसी कपिला गायों के गोबर को इकट्ठा कर उससे उपले यानी कंडे बनाए जाते हैं। इनमें शमी, पलाश और बेर की लकड़ी का बुरादा मिलाया जाता है। हालांकि, इनकी मात्रा कितनी होती है, यह महंत विनीत गिरी नहीं बताते। उनके मुताबिक, प्रक्रिया से जुड़ी कुछ बातें अखाड़े की निजी परंपरा का हिस्सा हैं।
भगवान महाकाल का धूना मंदिर के पीछे बना हुआ है और इसे लगातार जलता हुआ बताया जाता है। धूने के अंगारों पर उपले रखकर उन्हें भस्म से ढक दिया जाता है। इससे उपले अंदर ही अंदर सुलगते रहते हैं। एक उपला करीब 12 घंटे में जलता है और रोजाना करीब 8-10 उपले लगाए जाते हैं।
अगले दिन की भस्म उसी रात छानकर तैयार कर ली जाती है। महाकाल मंदिर के पुजारी आशीष जी के मुताबिक, रोजाना करीब ढाई किलो भस्म भगवान महाकाल को अर्पित की जाती है।
मंदिर के पट रात 11 बजे बंद होते हैं। इसके बाद आम दिनों में सुबह 3 बजे, सावन के सोमवार को करीब सवा 2:30 बजे और बाकी दिनों में 2 बजे मंदिर के पट खोले जाते हैं।

सवाल 2: आरती में महिलाएं घूंघट क्यों करती हैं? जींस-टीशर्ट में जाएं तो एंट्री मिलेगी?
जवाब: दोनों को लेकर कोई सख्त धार्मिक नियम नहीं है, यह ज्यादा परंपरा और मर्यादा का विषय है।
ड्रेस कोड की बात करें तो महाकाल मंदिर के पुजारी आशीष जी के मुताबिक, ऐसा कोई सख्त नियम नहीं है। शास्त्रों में पूजा के लिए जाते समय चंदन-तिलक लगाने और शुद्ध वस्त्र पहनने की बात कही गई है, लेकिन आज ज्यादातर श्रद्धालु बाहर से ही दर्शन करते हैं। इसलिए सामान्य दर्शन के लिए किसी खास ड्रेस कोड की बाध्यता नहीं है।
हालांकि, पहले एक परंपरा जरूर थी। गर्भगृह में भस्म आरती के दौरान सिले हुए कपड़े पहनकर जाना मना होता था। अभी गर्भगृह में प्रवेश दिया जाएगा या नहीं, यह व्यवस्था और प्रशासनिक निर्णय पर निर्भर करता है। आमतौर पर श्रद्धालुओं के लिए गर्भगृह में प्रवेश बंद ही रहता है।
महिलाएं भस्म आरती में घूंघट क्यों करती हैं?
महिलाओं का घूंघट करना भी किसी शास्त्रीय नियम की वजह से नहीं, बल्कि स्थानीय परंपरा और धार्मिक मर्यादा से जुड़ा है।
भस्म आरती के दौरान भगवान महाकाल का दिगंबर स्वरूप माना जाता है। इसी कारण मर्यादा के तौर पर महिलाएं पर्दा या घूंघट करती हैं। पुजारी आशीष जी इसे एक आसान उदाहरण से समझाते हैं—जैसे घर में कोई पुरुष कपड़े बदल रहा हो तो महिलाएं स्वाभाविक रूप से पर्दा कर लेती हैं, उसी तरह भस्म आरती के दौरान भी महिलाएं मर्यादा के लिए पर्दा करती हैं।
यानी घूंघट करना अनिवार्य धार्मिक नियम नहीं, बल्कि परंपरा और मर्यादा का हिस्सा है।

सवाल 3: क्या उज्जैन में कोई राजा या नेता रात को नहीं रुकता?
जवाब: यह एक पुरानी मान्यता है, जिसकी जड़ें सिंधिया राजघराने से जुड़ी मानी जाती हैं।
उज्जैन को लेकर यह मान्यता काफी पुरानी और चर्चित है कि यहां के वास्तविक राजा भगवान महाकाल हैं। इसी वजह से कहा जाता है कि कोई दूसरा राजा या शासक उज्जैन में रात नहीं रुक सकता। हालांकि, इस मान्यता का कोई वैज्ञानिक आधार या प्रमाण नहीं है।
सिंधिया राजघराने से जुड़ी है मान्यता
इस मान्यता की शुरुआत को लेकर सिंधिया राजघराने का नाम लिया जाता है। 1810 में दौलत राव सिंधिया ने अपनी राजधानी उज्जैन से हटाकर ग्वालियर कर दी थी। इसके बाद यह धारणा और मजबूत हुई कि उज्जैन के राजा स्वयं महाकाल हैं, इसलिए कोई दूसरा राजा यहां रात नहीं रुक सकता।
दिलचस्प बात यह है कि यह मान्यता सिंधिया परिवार पर भी लागू मानी गई। कहा जाता है कि राजा विक्रमादित्य के बाद सिंधिया राजघराने का कोई राजा उज्जैन में रात नहीं रुका।
दो घटनाओं ने और मजबूत किया मिथक
इस मान्यता को दो राजनीतिक घटनाओं ने और चर्चा में ला दिया। हालांकि, इन घटनाओं को इस मान्यता से जोड़ने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है और यह महज संयोग भी हो सकता है।
कहा जाता है कि पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई महाकाल के दर्शन के बाद एक रात उज्जैन में रुके थे। इसके अगले ही दिन उनकी सरकार गिर गई। इस घटना को बाद में उज्जैन में रात न रुकने वाली मान्यता से जोड़कर देखा जाने लगा।
इसी तरह, कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा भी एक बार उज्जैन में रुके थे। इसके करीब 20 दिन बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। इन दोनों घटनाओं के बाद इस मान्यता को लेकर चर्चाएं और तेज हो गईं।
2021 में शिवराज और सिंधिया भी रात नहीं रुके
यह धारणा इतनी गहरी थी कि 2021 में उज्जैन में भाजपा का विधायक शिविर आयोजित हुआ था। कार्यक्रम दो दिन का था, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और सिंधिया राजघराने के ज्योतिरादित्य सिंधिया शाम होने के बाद इंदौर लौट गए थे।
इसे भी लोगों ने उज्जैन में रात न रुकने की पुरानी मान्यता से जोड़कर देखा।
दिसंबर 2023 में टूटा मिथक
इस पुरानी धारणा को सबसे बड़ा झटका दिसंबर 2023 में लगा। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद मोहन यादव उज्जैन में रात रुके।
मोहन यादव का उज्जैन से पुराना जुड़ाव भी रहा है। उन्होंने इस मान्यता को लेकर कहा था कि वे भगवान महाकाल को अपना आराध्य मानते हैं और खुद को उनका पुत्र मानते हैं, इसलिए उनके लिए उज्जैन में रुकने को लेकर कोई डर या संकोच नहीं है।
इस तरह उज्जैन में राजा या मुख्यमंत्री के रात न रुकने की मान्यता आज भी लोगों के बीच चर्चा में जरूर है, लेकिन इसे धार्मिक आस्था और लोक-मान्यता के रूप में ही देखा जाना चाहिए, किसी प्रमाणित नियम के तौर पर नहीं।
सवाल 4: सावन में शाही सवारी क्यों निकलती है?
जवाब: मान्यता है कि सावन के सोमवार को भगवान महाकाल अपनी प्रजा का हाल जानने नगर भ्रमण पर निकलते हैं।
इसी परंपरा को शाही सवारी कहा जाता है। सावन के सोमवार को भगवान महाकाल की पालकी मंदिर से निकलती है और शहर के प्रमुख मार्गों से होते हुए शिप्रा नदी तक पहुंचती है। इसके बाद सवारी वापस महाकाल मंदिर लौटती है।
शाही सवारी के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान महाकाल के दर्शन के लिए सड़कों पर उमड़ते हैं। पूरे मार्ग में धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन होते हैं, जिससे उज्जैन में उत्सव जैसा माहौल बन जाता है।
पहले हर सोमवार नहीं निकलती थी सवारी
आज सावन के हर सोमवार शाही सवारी निकलना परंपरा का हिस्सा है, लेकिन यह व्यवस्था हमेशा से ऐसी नहीं थी।
कम ही लोगों को पता है कि सिंधिया राजघराने के समय साल में केवल दो-तीन बार ही भगवान महाकाल की सवारी निकाली जाती थी। यानी हर सोमवार सवारी निकालने की परंपरा बाद में शुरू हुई।
हर सोमवार सवारी निकालने की शुरुआत कैसे हुई?
शाही सवारी को मौजूदा स्वरूप देने का श्रेय तत्कालीन कलेक्टर एमएन बुच को दिया जाता है। उन्होंने शहर के विद्वानों और तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद नारायण सिंह की सहमति से सावन के हर सोमवार भगवान महाकाल की सवारी निकालने की शुरुआत कराई।
इसके बाद धीरे-धीरे यह उज्जैन की सबसे बड़ी धार्मिक परंपराओं में शामिल हो गई।
आज भी सिंधिया परिवार का जुड़ाव
सवारी की परंपरा से सिंधिया परिवार का जुड़ाव आज भी कायम है। भगवान महाकाल की सवारी जब गोपाल मंदिर पहुंचती है, तो वहां सिंधिया परिवार की ओर से उसका स्वागत किया जाता है।
यानी शाही सवारी सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उज्जैन की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परंपरा का भी अहम हिस्सा बन चुकी है।
सवाल 5: भस्म आरती देखने का सबसे आसान तरीका क्या है?
जवाब: ऑनलाइन बुकिंग न मिले, तब भी दो तरीके से भस्म आरती के दर्शन किए जा सकते हैं।
अगर ऑनलाइन बुकिंग नहीं मिल पाती है, तो श्रद्धालुओं को निराश होने की जरूरत नहीं है। तय समय से पहले मंदिर पहुंचकर सामान्य (जनरल) दर्शन या चलित दर्शन के जरिए भी भस्म आरती के दर्शन किए जा सकते हैं। हालांकि, गर्भगृह में प्रवेश मिलेगा या नहीं, यह पूरी तरह जिला प्रशासन और कलेक्टर के निर्णय पर निर्भर करता है।
बैठकर भस्म आरती देखना है तो क्या करें?
जो श्रद्धालु बैठकर भस्म आरती देखना चाहते हैं, उनके लिए नंदी हॉल और कार्तिकेय मंडपम में कुल मिलाकर करीब 1,500 से 1,700 लोगों के बैठने की व्यवस्था है।
इन स्थानों पर प्रवेश के लिए ऑनलाइन अनुमति लेना जरूरी होता है। मंदिर में VIP, ऑनलाइन और ऑफलाइन पास की संख्या यानी कोटा महाकाल मंदिर प्रबंध समिति तय करती है।
यानी अगर ऑनलाइन सीट नहीं मिल पाती है, तो सामान्य या चलित दर्शन एक विकल्प हो सकता है; लेकिन बैठकर भस्म आरती देखने के लिए निर्धारित अनुमति और पास जरूरी हैं।
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