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: गरियाबंद में PMGSY सड़क को लील गई बदहाली: डबल लोड गाड़ियां से दम तोड़ती सड़कें, डामर की परतें उखड़ चुकी, ठेकेदार बोला- हम क्या करें

MP CG Times / Tue, Aug 5, 2025

गिरीश जगत की रिपोर्ट। गरियाबंद। छत्तीसगढ़

विकास की गति जब अनियंत्रित हो जाए, तो वह अपने ही संसाधनों को लीलने लगती है। गरियाबंद जिले के गोना-गरीबा-बरही दीवानमुड़ा मार्ग की हालिया स्थिति कुछ ऐसी ही कहानी कह रही है। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना (PMGSY) के तहत लाखों की लागत से बनाई गई सड़कें महज एक साल भी नहीं टिक पाईं और आज गड्ढों में तब्दील हो चुकी हैं। गांवों में विकास की पहचान कही जाने वाली ये सड़कें अब खुद विकास की कीमत चुका रही हैं—वह भी दोगुना भार उठाकर।


सड़क बनी, पर टिक न सकी

करीब छह महीने पहले ग्रामीणों की बरसों पुरानी मांग पूरी हुई थी, जब गोना से गरीबा होते हुए बरही दीवानमुड़ा तक की काली सड़क बनकर तैयार हुई। सड़क का उद्घाटन, विभागीय बयान और ठेकेदारों की गारंटी सब कुछ था। लेकिन गर्मी बीतते-बीतते और पहली बरसात आते-आते, इस सड़क की असलियत सामने आ गई।

सड़क की डामर की परतें उखड़ चुकी हैं, जगह-जगह गड्ढे हो गए हैं और स्थिति इतनी खराब है कि बाइक चालकों को भी इन रास्तों से गुजरने में डर लगता है।


मक्का, सीमेंट और नुकसान

गरीबा की यह सड़क नवरंगपुर जिले के शहरों को जोड़ती है। यहां के कारोबारी बड़े पैमाने पर मक्का और सीमेंट की ढुलाई करते हैं। रोजाना 35 से 40 टन वजनी ट्रक यहां से गुजरते हैं। सप्ताह में ये वाहन तीन से चार बार चक्कर लगाते हैं।

जबकि ग्रामीण सड़क की अधिकतम सहन क्षमता 15 टन ही होती है। मतलब, ये वाहन सड़क पर उसके डिज़ाइन से दोगुना भार डाल रहे हैं।

यही कारण है कि छह महीने पुरानी सड़क की डामर उखड़ चुकी है और गड्ढों में तब्दील हो चुकी है।


ठेकेदार बोले—'हम क्या करें?'

जब ग्रामीणों ने शिकायत की, तो निर्माण एजेंसी और ठेकेदारों ने साफ कह दिया—"जब सड़क की क्षमता से अधिक वजन गुजरता है, तो हम भी क्या कर सकते हैं?"

ठेकेदारों के इस रुख ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है—क्या गुणवत्ता पर खर्चा सिर्फ दिखावा है? क्या सड़कों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ विभाग या ठेकेदार की है?


हाइट बेरियर बना अस्थायी उपाय

ग्रामीणों के दबाव पर हाल ही में PMGSY विभाग ने सड़कों पर हाइट बेरियर लगाने का फैसला लिया। इस बेरियर से केवल 15 टन या उससे कम वजन वाले वाहन ही गुजर सकेंगे। इससे ज्यादा वजनी वाहन अब इन सड़कों पर नहीं आ पाएंगे।

पतंग नेताम, अंबेडकरवादी युवा संगठन के प्रमुख, ने साफ कहा—

"ग्रामीण इलाकों में इन भारी वाहनों का कोई काम नहीं है। ये सड़कों की उम्र कम कर रहे हैं। प्रशासन को सिर्फ हाइट बेरियर नहीं, पूरी तरह से इन वाहनों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।"


अवैध मुनाफे की वैध कीमत चुका रहे गांव

यहां का मामला सिर्फ सड़क का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की खामियों का भी है। कारोबारी अपने मुनाफे के लिए ग्रामीण सड़कों का उपयोग कर रहे हैं, जिनका निर्माण इन भारी गाड़ियों के लिए हुआ ही नहीं था।

मक्का, सीमेंट और किराना जैसे सामानों का ट्रांसपोर्ट अब गांवों के रास्ते हो रहा है, जिससे मुख्य हाईवे की बजाय छोटे मार्गों पर ट्रैफिक बढ़ा है। इसका असर सिर्फ सड़क पर नहीं, बल्कि ग्रामीणों की दैनिक आवाजाही, आपात सेवाएं और स्कूल जाने वाले बच्चों तक पर पड़ रहा है।


अधिकारियों की नजर

कमलेश चंद्राकर, SDO, PMGSY ने बताया:

"15 टन से अधिक वजन वाले वाहनों को रोकने के लिए हाइट बेरियर लगाए गए हैं। लेकिन ग्रामीणों को भी जागरूक होना पड़ेगा। ये सड़कें उन्हीं के लिए बनी हैं, और उन्हीं को आगे आकर इनकी सुरक्षा करनी होगी।"

विभागीय स्तर पर चेतावनी दी गई है, लेकिन व्यावसायिक हितों के चलते यह स्पष्ट नहीं है कि इन वाहनों को रोकने के लिए क्या कठोर कदम उठाए जाएंगे।


सड़कें नहीं, भरोसे की नींव टूट रही है

ये सड़कें सिर्फ काली डामर की परतें नहीं हैं। ये उस भरोसे की नींव हैं, जो गांव वालों ने सरकार पर, विकास योजनाओं पर और अधिकारियों की बातों पर रखा था।

जब एक साल में सड़क जवाब दे देती है, तो यह सिर्फ निर्माण की विफलता नहीं होती, बल्कि यह उस गंभीर नीति असंतुलन की निशानी होती है, जिसमें निगरानी की कमी, भ्रष्टाचार और व्यावसायिक दखलअंदाज़ी सब एक साथ दिखते हैं।


क्या है समाधान?

  1. कड़े नियमों का पालन – PMGSY जैसी योजनाओं में सड़क पर गुजरने वाले वाहनों का वजन नियमित जांचा जाना चाहिए।
  2. स्थायी चेक पोस्ट और सीसीटीवी निगरानी – यह सुनिश्चित करेगा कि कोई भी वाहन क्षमता से अधिक भार लेकर न गुजरे।
  3. सामुदायिक निगरानी – गांव के लोगों को ही स्थानीय ‘सड़क संरक्षण समिति’ में शामिल कर इसकी निगरानी देनी चाहिए।
  4. ठेकेदारों की जवाबदेही – गारंटी पीरियड में सड़क खराब होने पर ठेकेदारों पर आर्थिक दंड लागू हो।

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गरियाबंद की ये सड़कें आज एक व्यवस्था के ढहते मूल्यों की प्रतीक बन गई हैं। विकास की दौड़ में हम अगर अपनी ही ज़मीन खोने लगें, तो सवाल बनता है—हम किसके लिए दौड़ रहे हैं? जब तक जिम्मेदार लोग ज़िम्मेदारी नहीं निभाएंगे और नागरिक अपनी जागरूकता नहीं बढ़ाएंगे, तब तक हर साल करोड़ों की सड़कों पर गड्ढे उगते रहेंगे… और भरोसा मिट्टी में मिलता रहेगा।

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