साय सरकार के मुंह पर करारा तमाचा ! : मुर्गा बेचने वाले ने 12 लाख में बनवाया पुल, अर्जी डस्टबीन में फेंक देते थे अधिकारी, निकम्मे सिस्टम ने कैसे मूंदी थी आंखे
गिरीश जगत, गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद के मैनपुर नगर में एक साधारण ग्रामीण ने वह कर दिखाया, जो दो दशक में पीडब्ल्यूडी विभाग, पंचायत विभाग और सरकार की पूरी मशीनरी नहीं कर सकी। 20 से 25 वर्षों से पुल की मांग कर रहे ग्रामीणों की आवाज जब फाइलों, दफ्तरों और आश्वासनों के बीच दम तोड़ने लगी, तब एक मुर्गा व्यवसायी ने अपनी जेब से लाखों रुपये खर्च कर नदी पर पुल बनवा दिया। यह पुल सिर्फ सीमेंट और लोहे की संरचना नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा है, जो वर्षों तक लोगों को बुनियादी सुविधा तक नहीं दे सकी।
बारिश के चार महीने जिन बच्चों को जान हथेली पर रखकर स्कूल जाना पड़ता था, जिन गर्भवती महिलाओं और बीमार लोगों के लिए अस्पताल पहुंचना चुनौती बन जाता था, जिन ग्रामीणों ने जनपद से लेकर कलेक्टर कार्यालय तक अनगिनत ज्ञापन सौंपे, उनकी समस्या आखिरकार किसी सरकारी योजना से नहीं बल्कि एक आम ग्रामीण की पहल से दूर होती दिखाई दे रही है। मैनपुर के लोचन चक्रधारी ने करीब 10 से 12 लाख रुपये खर्च कर पुल निर्माण शुरू कराया है, जिसका लाभ आने वाले बरसात में पूरे मोहल्ले को मिलेगा।

20-25 वर्षों से झेल रहे थे दर्द
गरियाबंद जिले के तहसील मुख्यालय मैनपुर नगर से होकर फुलझर नदी बहती है। नदी के उस पार ग्राम पंचायत मैनपुरकला के वार्ड क्रमांक-1 में लगभग 30 से 35 परिवार निवास करते हैं। स्टाप डेम मोहल्ला के नाम से पहचाने जाने वाले इस क्षेत्र के लोग पिछले दो दशकों से अधिक समय से बरसात के मौसम में भारी परेशानियां झेल रहे हैं।
नदी पर सुरक्षित पुल नहीं होने के कारण ग्रामीणों को 20 फीट गहरे और जर्जर हो चुके स्टाप डेम को पार कर आवागमन करना पड़ता है। बरसात में स्थिति और खतरनाक हो जाती है, जब तेज बहाव के बीच लोगों को जान जोखिम में डालकर आना-जाना पड़ता है।
बच्चों की पढ़ाई और लोगों की जान पर बन आती थी
सबसे अधिक परेशानी स्कूली बच्चों को होती थी। मोहल्ले के छोटे-छोटे बच्चे रोजाना जोखिम उठाकर मैनपुर के स्कूलों तक पहुंचते थे। वहीं किसी व्यक्ति के बीमार पड़ने या गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाने की नौबत आने पर परिवारों की चिंता कई गुना बढ़ जाती थी।
ग्रामीण बताते हैं कि बरसात के दिनों में कई बार हालात इतने खराब हो जाते थे कि लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ता था। जानकारी के अनुसार पूर्व में दो ग्रामीण नदी में बह भी चुके हैं, जिसके बाद से लोगों में भय और बढ़ गया था।

ज्ञापन दिए, गुहार लगाई, लेकिन नहीं मिली सुनवाई
ग्रामीणों ने वर्षों तक पुल निर्माण की मांग को लेकर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के सामने गुहार लगाई। जनपद पंचायत से लेकर कलेक्टर कार्यालय तक कई बार ज्ञापन सौंपे गए। स्थानीय स्तर पर मांग उठती रही, लेकिन समस्या जस की तस बनी रही।
ग्रामीणों का कहना है कि तहसील मुख्यालय होने के बावजूद उनकी समस्या को कभी गंभीरता से नहीं लिया गया। विडंबना यह है कि जिस स्थान पर पुल की मांग की जा रही थी, वहां से महज 200 मीटर की दूरी पर जनपद पंचायत और एसडीएम कार्यालय स्थित हैं।
जब सिस्टम थक गया तो एक ग्रामीण ने उठाया जिम्मा
सरकारी उदासीनता से निराश होकर स्टाप डेम मोहल्ले में रहने वाले मुर्गा व्यवसायी लोचन चक्रधारी ने खुद पहल करने का फैसला किया। उन्होंने अपने निजी संसाधनों से नदी पर पुल निर्माण शुरू करा दिया।
लोचन चक्रधारी ने बताया कि मोहल्ले के लोगों की समस्या को देखते हुए उन्होंने लगभग 10 से 12 लाख रुपये खर्च कर पुल निर्माण कराया है। इसके लिए उन्होंने कई दुकानदारों से उधार भी लिया है, जिसे धीरे-धीरे चुकाने की बात कहते हैं। फिलहाल पुल निर्माण का अधिकांश कार्य पूरा हो चुका है और केवल एप्रोच रोड पर मुरमीकरण का काम शेष है।
अधिकारियों से मांगी मदद, लेकिन कोई नहीं पहुंचा
लोचन चक्रधारी के पुत्र डोलेश चक्रधारी और मोहल्ले के लोगों का कहना है कि पुल निर्माण के दौरान उन्होंने जनपद पंचायत के अधिकारियों से तकनीकी मार्गदर्शन और डिजाइन संबंधी सुझाव देने का अनुरोध किया था।
ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार निवेदन करने के बावजूद कोई भी जिम्मेदार अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा। इससे उन्हें निर्माण कार्य अपने अनुभव और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर ही पूरा करना पड़ा।
पूरे क्षेत्र में हो रही प्रशंसा
लोचन चक्रधारी की इस पहल की पूरे क्षेत्र में चर्चा हो रही है। वर्षों से पुल की मांग कर रहे ग्रामीण अब इस निर्माण को अपने लिए राहत की किरण मान रहे हैं। लोगों का कहना है कि जिस काम को सरकार वर्षों में नहीं कर सकी, उसे एक आम ग्रामीण ने अपने दम पर पूरा कर दिखाया।
नगर और क्षेत्र के लोगों ने गरियाबंद कलेक्टर भगवान सिंह उइके और जिला पंचायत सीईओ प्रखर चंद्राकर से मांग की है कि लोचन चक्रधारी को सार्वजनिक मंच पर सम्मानित किया जाए। साथ ही पुल निर्माण में उनके योगदान को देखते हुए शेष अधूरे कार्यों को शासन द्वारा पूरा कराया जाए।

एक पुल नहीं, व्यवस्था पर सवाल
मैनपुर में बन रहा यह पुल केवल आवागमन का साधन नहीं है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की बदहाल स्थिति की कहानी भी बयां करता है। यह सवाल भी खड़ा करता है कि जब वर्षों तक प्रशासन और विभाग किसी समस्या का समाधान नहीं कर पाए, तब आखिर एक साधारण ग्रामीण को अपनी जमा पूंजी और कर्ज लेकर जनता की जरूरत पूरी करने के लिए क्यों आगे आना पड़ा।
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