जंगलों में क्यों दम तोड़ रहे आदिवासी बच्चे? : बालाघाट में 30 से ज्यादा मौतों का दावा; कुपोषण, मलेरिया और 6 महीने से बंद 'राशन' की पूरी इनसाइड स्टोरी
MP CG Times / Wed, Sep 9, 2026
जून के आखिरी हफ्ते से मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के जंगलों में एक के बाद एक बैगा और गोंड आदिवासी बच्चे दम तोड़ रहे हैं। सरकार ने शुरुआती दौर में सिर्फ 8 मौतों की बात कही थी, लेकिन ग्रामीणों, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और विपक्ष का दावा है कि आंकड़ा 30 को पार कर चुका है और सैकड़ों बच्चे अब भी अस्पतालों में जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं।
आखिर विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) 'बैगा' के गांवों में ही ये मौतें क्यों हो रही हैं? क्या सरकार वाकई आंकड़े छिपा रही है? पढ़िए 5 बड़े सवालों में बालाघाट के इस सबसे बड़े स्वास्थ्य संकट का पूरा सच...

सवाल 1: बालाघाट में हुआ क्या, अब तक कितने बच्चों की जान जा चुकी है?
जवाब: यहां सबसे बड़ा विवाद मौतों के आंकड़ों को लेकर ही है।
गांवों से शुरू हुआ सिलसिला: बैहर और बिरसा ब्लॉक के सोनगुड्डा, बोंदारी, कुंडेकसा, कोरका, गठिया, मछूलदा और मातला जैसे दर्जनों गांवों से बच्चों के बीमार पड़ने की खबरें आईं। मछूलदा गांव की बतिया बाई के 4 साल के बेटे कुंवर सिंह जैसी कई मौतें तो शुरुआती सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं थीं।
आंकड़ों में विरोधाभास: अडोरी पंचायत के सरपंच परशुराम धुर्वे के मुताबिक अकेले उनकी पंचायत में 9 बच्चों की मौत हुई। आंकड़े 8 से बढ़कर 19, 22, 27 होते हुए आगे बढ़े। कांग्रेस 30 मौतों का दावा कर रही है, मीडिया रिपोर्ट्स में आंकड़ा 31 बताया गया, जबकि प्रभारी मंत्री उदय प्रताप सिंह ने 28 मौतें स्वीकार कीं।
केंद्र सरकार की स्क्रीनिंग रिपोर्ट: केंद्रीय टीम की जांच में 32,433 लोगों की मेडिकल जांच की गई। इसमें 7,711 बच्चे गंभीर कुपोषित पाए गए, जिनमें से 518 को पोषण पुनर्वास केंद्र (NRC) में भर्ती कराना पड़ा। 13,406 बच्चे डायरिया और 274 गंभीर निमोनिया से पीड़ित मिले।
मौत की वजह: मौत का कोई एक कारण नहीं है। मलेरिया, डायरिया, खसरा और चर्म रोग के साथ 'गंभीर कुपोषण' सभी बच्चों में एक कॉमन फैक्टर (साझा कड़ी) रहा। हालांकि, गुजरात में तबाही मचाने वाले 'चांदीपुरा वायरस' की आशंका पुणे लैब की जांच में नेगेटिव आई है।

सवाल 2: सिर्फ आदिवासी बहुल गांवों में ही मौतें ज्यादा क्यों हो रही हैं?
जवाब: बालाघाट जिला लंबे समय से हेल्थ रिस्क जोन में रहा है।
मलेरिया का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट: बालाघाट बीते दो सालों से प्रदेश का सबसे बड़ा मलेरिया हॉटस्पॉट है। 2025 में MP के कुल 2,126 मलेरिया मामलों में से 685 सिर्फ बालाघाट में थे। साल 2026 में जुलाई तक राज्य के 583 मामलों में से 174 फिर यहीं मिले।
PVTG दर्जा और दूरस्थ बस्तियां: बैगा समुदाय केंद्र सरकार द्वारा संरक्षित विशेष कमजोर जनजाति (PVTG) है, जो बेहद घने जंगलों में साक्षरता और संसाधनों के बिना निवास करती है। कई गांवों में अब भी साफ पीने का पानी नहीं पहुंच सका है।
6 महीने से बंद था राशन: बालाघाट में 5 साल तक के 17% बच्चे पहले से कुपोषित हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि बीमारी फैलने के ठीक उसी दौर में इन गांवों में करीब 6 महीने से पोषण आहार (टेक होम राशन) का वितरण बंद था।
सवाल 3: अस्पताल से ठीक होकर लौटने के बाद बच्चे दोबारा क्यों बीमार पड़ रहे हैं?
जवाब: इसके पीछे 'गंभीर कुपोषण' और रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) का ध्वस्त होना है।
कमजोर इम्यूनिटी का असर: बाल रोग विशेषज्ञों के अनुसार गंभीर कुपोषण अकेले बच्चे को नहीं मारता, लेकिन वह शरीर की बीमारियों से लड़ने की क्षमता छीन लेता है। इन बच्चों के शरीर में जिंक, विटामिन-A और मैग्नीशियम की भारी कमी होती है।
सामान्य बीमारी भी बन रही जानलेवा: जिस डायरिया या निमोनिया को सामान्य वजन का बच्चा आसानी से झेल लेता है, वही बीमारी कुपोषित बच्चे के लिए जानलेवा साबित हो रही है। इलाज के बाद गांव लौटने पर अस्वच्छ पानी और पोषक तत्वों की कमी के कारण वे तुरंत दोबारा इन्फेक्शन की चपेट में आ रहे हैं।
सवाल 4: क्या प्रशासन सच्चाई छिपाने और लापरवाही करने की कोशिश कर रहा है?
जवाब: प्रशासनिक कार्यशैली पर लगातार सवाल खड़े हुए हैं:
CMHO पर गाज: जब मौतों का आंकड़ा 20 के पार था, तब तत्कालीन CMHO डॉ. परेश उपलब मौतों को केवल 'मौसमी बीमारी' बताते रहे। लापरवाही उजागर होने पर उन्हें बर्खास्त किया गया। (वर्तमान में डॉ. शत्रुघ्न सिंह दाहिया नए CMHO हैं)।
बिना पोस्टमॉर्टम अंतिम संस्कार का आरोप: मोहनपुर के बैगाटोला में 4 साल के बच्चे लवकुश की मौत के बाद परिजनों का आरोप है कि पुलिस व प्रशासन ने बिना पोस्टमार्टम जबरन अंतिम संस्कार करवा दिया। इसके विरोध में ग्रामीणों ने बालाघाट-बैहर मार्ग जाम किया था।
मीडिया कवरेज पर रोक और यू-टर्न: जिला अस्पताल में मीडिया की एंट्री रोकने का आदेश जारी हुआ, लेकिन भारी जनविरोधी दबाव के चलते कुछ ही घंटों में कलेक्टर को यह फैसला वापस लेना पड़ा।
सवाल 5: संकट बढ़ने के बाद सरकार और कोर्ट ने क्या कदम उठाए हैं?
जवाब: बढ़ते विवाद के बाद सरकारी और राजनीतिक हलचल तेज हुई है:
मुख्यमंत्री का दौरा व मुआवजा: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव खुद बोंदारी गांव पहुंचे और पीड़ित परिवारों से मुलाकात कर 2-2 लाख रुपए के मुआवजे का ऐलान किया। साथ ही पूर्व-नक्सल प्रभावित 100 गांवों के विकास के लिए 225 करोड़ रुपए के बजट की घोषणा की।
स्वास्थ्य ढांचा बढ़ाया: जिला अस्पताल में बच्चों के वार्ड की क्षमता 50 बेड से बढ़ाकर 150 बेड की गई, 6 मोबाइल मेडिकल यूनिट्स तैनात की गईं और 50 से अधिक गांवों में सर्विलांस शुरू किया गया।
विपक्ष व कोर्ट का रुख: नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस घटना को सरकार की पूरी विफलता करार दिया है। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने 50 लाख रुपए मुआवजे और CBI जांच की मांग की है। वहीं, हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता को खुद बैहर-बिरसा जाकर ग्राउंड रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं।
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