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: Umaria: वन विभाग के गश्ती दल ने शाल की लकड़ी का परिवहन करते पिकअप को किया जप्त, कार्रवाई जारी

News Desk / Sat, Nov 19, 2022


(सांकेतिक तस्वीर)

(सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : सोशल मीडिया

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हरे-भरे वनों से आच्छादित उमरिया जिले में वनमाफिया अवैध रूप से वनों की कटाई कर बेशकीमती लकड़ियों का अवैध व्यापार कर रहे हैं। वन विभाग की गश्ती टीम ने शुक्रवार को एक पिकअप वाहन में शाल की अवैध लकड़ी का परिवहन करते जब्त किया है, जिसमें लाखों रुपये मूल्य की इमारती लकड़ी का परिवहन किया जा रहा था।

वन विभाग के मुताबिक, स्थानीय लकड़ी व्यापारी द्वारा जंगल से शाल की लकड़ी अवैध रूप से काटकर तश्करी की जा रही थी, जिस पर कार्रवाई की जा रही है।

क्या होती है शाल की लकड़ी...
शाल या सखुआ अथवा साखू एक द्विबीजपत्री बहुवर्षीय वृक्ष है। इसकी लकड़ी इमारती कामों में प्रयोग की जाती है। इसकी लकड़ी बहुत ही कठोर, भारी, मजबूत तथा भूरे रंग की होती है। साल या साखू एक वृंदवृत्ति एवं अर्धपर्णपाती वृक्ष है, जो हिमालय की तलहटी से लेकर 3-4 हजार फुट की ऊंचाई तक और उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार, झारखंड तथा असम के जंगलों में उगता है। इस वृक्ष का मुख्य लक्षण है, अपने आपको विभिन्न प्राकृतिक वासकारकों के अनुकूल बना लेना।

इस वृक्ष से निकाला हुआ रेजिन कुछ अम्लीय होता है और धूप तथा औषधि के रूप में प्रयोग होता है। तरुण वृक्षों की छाल में प्रास लाल और काले रंग का पदार्थ रंजक के काम आता है। बीज, जो वर्षा के आरंभ काल के पकते हैं, विशेषकर अकाल के समय अनेक जगहों पर भोजन में काम आते हैं।
 
 

विस्तार

हरे-भरे वनों से आच्छादित उमरिया जिले में वनमाफिया अवैध रूप से वनों की कटाई कर बेशकीमती लकड़ियों का अवैध व्यापार कर रहे हैं। वन विभाग की गश्ती टीम ने शुक्रवार को एक पिकअप वाहन में शाल की अवैध लकड़ी का परिवहन करते जब्त किया है, जिसमें लाखों रुपये मूल्य की इमारती लकड़ी का परिवहन किया जा रहा था।

वन विभाग के मुताबिक, स्थानीय लकड़ी व्यापारी द्वारा जंगल से शाल की लकड़ी अवैध रूप से काटकर तश्करी की जा रही थी, जिस पर कार्रवाई की जा रही है।

क्या होती है शाल की लकड़ी...
शाल या सखुआ अथवा साखू एक द्विबीजपत्री बहुवर्षीय वृक्ष है। इसकी लकड़ी इमारती कामों में प्रयोग की जाती है। इसकी लकड़ी बहुत ही कठोर, भारी, मजबूत तथा भूरे रंग की होती है। साल या साखू एक वृंदवृत्ति एवं अर्धपर्णपाती वृक्ष है, जो हिमालय की तलहटी से लेकर 3-4 हजार फुट की ऊंचाई तक और उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार, झारखंड तथा असम के जंगलों में उगता है। इस वृक्ष का मुख्य लक्षण है, अपने आपको विभिन्न प्राकृतिक वासकारकों के अनुकूल बना लेना।

इस वृक्ष से निकाला हुआ रेजिन कुछ अम्लीय होता है और धूप तथा औषधि के रूप में प्रयोग होता है। तरुण वृक्षों की छाल में प्रास लाल और काले रंग का पदार्थ रंजक के काम आता है। बीज, जो वर्षा के आरंभ काल के पकते हैं, विशेषकर अकाल के समय अनेक जगहों पर भोजन में काम आते हैं।
 
 


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