दंगे से चीखें और दर्द, एक चिंगारी से जल उठा गांव : राजिम में बच्चों की पढ़ाई छूटी, कॉपी-किताबें जलीं, आंखों में अब भी खौफ जिंदा, पढ़िए 1 फरवरी की इनसाइड स्टोरी
रात का वक्त… गांव की गलियां अचानक शोर, भगदड़ से भर उठीं। अंधेरे का सन्नाटा अचानक चीखों में बदल गया… गांव की गलियों में दौड़ते कदम, टूटते दरवाजे और जलती गाड़ियों की लपटें। घरों के भीतर बंद परिवार डर से कांप रहे थे। गैस सिलेंडरों के धमाके, बाहर से आती गालियों और धमकियों की आवाजें हर सेकंड ऐसा लग रहा था जैसे मौत दरवाजे पर खड़ी हो। अंदर बैठे लोगों को सिर्फ एक ही डर था- “क्या हम जिंदा बच पाएंगे?”
एक छोटे से विवाद ने ऐसा रूप लिया कि पूरा गांव दहशत में डूब गया। सैकड़ों की भीड़ ने घरों को घेर लिया, CCTV कैमरे तोड़े, दरवाजे तोड़कर अंदर घुसे और आग लगा दी। कई घर देखते ही देखते राख हो गए। जान बचाने के लिए परिवारों को अंधेरे में गांव छोड़कर भागना पड़ा। पीछे रह गया उनका घर, सामान… और वो जिंदगी, जिसे उन्होंने सालों में बसाया था।
आज वही परिवार अपने गांव से दूर शरण लिए बैठे हैं। डरे हुए, टूटे हुए। बच्चों की किताबें छूट गईं, सपने अधूरे रह गए। जिन आंखों में कल तक डॉक्टर, पायलट बनने के सपने थे, आज उनमें सिर्फ डर और असुरक्षा है। सवाल अब भी वही है-क्या उस खौफनाक रात का हिसाब मिलेगा, या ये दर्द भी बाकी घटनाओं की तरह बस याद बनकर रह जाएगा?
इस रिपोर्ट में पढ़िए दुतकैया हिंसा की पूरी कहानी, पीड़ितों की जुबानी उस रात का खौफ और अब तक क्या हुई कार्रवाई ?

रात में टूटा सन्नाटा, गांव में फैल गया खौफ
1 फरवरी की रात दुतकैया गांव में सब कुछ सामान्य था, लेकिन कुछ ही देर में हालात अचानक बदल गए। गांव की गलियों में शोर, चीखें और भगदड़ की आवाजें गूंजने लगीं। लोग अपने घरों में बंद होकर जान बचाने की कोशिश कर रहे थे। बाहर गाड़ियों को जलाया जा रहा था और गैस सिलेंडरों के धमाके सुनाई दे रहे थे। कई परिवारों ने बताया कि उस वक्त उन्हें अपनी जान बचने की कोई उम्मीद नहीं थी।
छोटे विवाद से भड़की बड़ी हिंसा
जानकारी के मुताबिक, इस हिंसा की शुरुआत लड़कों के बीच हुए एक विवाद से हुई थी। पहले पक्ष के कुछ युवकों ने दूसरे पक्ष के मंदिर में तोड़फोड़ कर दी थी। पुलिस ने शुरुआती आरोपियों को गिरफ्तार किया, लेकिन इसके बाद मामला शांत होने के बजाय और भड़क गया। दूसरे पक्ष की नाराजगी को बाहरी तत्वों ने हवा दी और यह विवाद सांप्रदायिक हिंसा में बदल गया।

घर बने निशाना, 10 से ज्यादा मकान जलाए गए
हिंसा के दौरान एक समुदाय के 10 से 11 घरों को निशाना बनाया गया। कई घरों में तोड़फोड़ की गई और फिर आग लगा दी गई। आग इतनी तेजी से फैली कि लोगों को अपने ही घरों से भागना पड़ा। कुछ ही देर में कई मकान पूरी तरह जलकर खाक हो गए। पीड़ितों का कहना है कि उन्होंने अपनी आंखों के सामने अपना सब कुछ खत्म होते देखा।
गांव छोड़कर भागे परिवार, रायपुर में ली शरण
हिंसा के बाद हालात इतने खराब हो गए कि कई परिवारों को गांव छोड़ना पड़ा। फिलहाल ये लोग रायपुर के बैजनाथ पारा में शरण लिए हुए हैं। यहां करीब 8 से 10 परिवारों के 40 से 50 लोग रह रहे हैं, जिनमें 17 बच्चे भी शामिल हैं। ये परिवार अब अस्थायी रूप से वहीं रहकर अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं।

बच्चों की पढ़ाई पर गहरा असर
इस हिंसा का सबसे बड़ा असर बच्चों पर पड़ा है। 8वीं कक्षा की छात्रा आरु (परिवर्तित नाम) ने बताया कि वह 31 जनवरी को आखिरी बार स्कूल गई थी। इसके बाद वह गांव वापस नहीं जा पाई। वह डॉक्टर बनना चाहती है, लेकिन उसकी पढ़ाई फिलहाल रुक गई है।
वहीं, 6वीं कक्षा की आलिया ने बताया कि वह डेढ़ महीने से स्कूल नहीं जा पा रही है। सिर्फ परीक्षा देने के लिए ही स्कूल पहुंची थी। बच्चों का कहना है कि नई जगह पर पढ़ाई करना उनके लिए बेहद मुश्किल हो रहा है।

धमकियों के बीच घर छोड़ना पड़ा
14 साल की अमाना ने बताया कि हिंसा के दौरान धमकी दी गई थी कि अगर बच्चे घर से बाहर निकले या स्कूल गए तो उन्हें मार दिया जाएगा। इसी डर के कारण परिवारों ने गांव छोड़ दिया। बच्चों और महिलाओं में अब भी डर बना हुआ है और वे सुरक्षित माहौल की मांग कर रहे हैं।
CCTV तोड़कर शुरू हुई तोड़फोड़
घटना के दौरान हमलावरों ने सबसे पहले इलाके में लगे CCTV कैमरों को तोड़ा। इसके बाद उन्होंने घरों के दरवाजे तोड़ने शुरू किए। 11वीं की छात्रा शिना ने बताया कि सैकड़ों लोग मोहल्ले की तरफ आए और देखते ही देखते पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई।

हथियारों से लैस भीड़, कई लोग घायल
पीड़ितों के अनुसार, हमलावरों के पास तलवार, चाकू, डंडे और अन्य हथियार थे। जब कुछ लोगों ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तो उन पर हमला किया गया। कई लोग घायल हुए। हालात इतने खराब हो गए कि लोग घरों में छिपकर अपनी जान बचाने लगे।
एक कमरे में छिपे लोग, बाहर जलता रहा गांव
कई परिवार एक ही कमरे में छिपे हुए थे। बाहर आगजनी और तोड़फोड़ जारी थी। गाड़ियों को जलाया जा रहा था और सिलेंडरों के फटने की आवाजें आ रही थीं। अंदर बैठे लोगों को डर था कि कहीं आग उनके कमरे तक न पहुंच जाए। धुएं के कारण सांस लेना भी मुश्किल हो गया था।

जबरन नारे लगवाने और मारपीट के आरोप
कुछ पीड़ितों ने आरोप लगाया कि हमलावरों ने लोगों के साथ मारपीट की और उन्हें जबरन नारे लगाने के लिए मजबूर किया। एक पीड़ित के मुताबिक, उसके परिजन के सिर पर रॉड रखकर धमकाया गया। विरोध करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी गई।
लूटपाट के भी लगे आरोप
हिंसा के दौरान सिर्फ आगजनी ही नहीं, बल्कि लूटपाट की घटनाएं भी सामने आई हैं। कुछ परिवारों ने बताया कि उनके घरों से गहने और अन्य सामान भी गायब हो गए। सैय्यदा कुरैशी ने बताया कि उनका पांच कमरों का घर जला दिया गया और कीमती सामान भी लूट लिया गया।

मदद के लिए फोन करते रहे, लेकिन देर से पहुंची सहायता
पीड़ितों का कहना है कि उन्होंने घटना के दौरान कई बार पुलिस और परिचितों को फोन किया, लेकिन समय पर मदद नहीं पहुंच सकी। हमलावरों की संख्या काफी ज्यादा थी, जिससे लोग खुद को असहाय महसूस कर रहे थे।

पीड़ितों के बयान
पहला बयान (परिवार के सदस्य)
“हम एक कमरे में छिपे हुए थे। बाहर गाड़ियों के जलने और गैस सिलेंडर के फटने की आवाज आ रही थी। हमें उम्मीद नहीं थी कि हम जिंदा बचेंगे। हमलावर आज भी खुले घूम रहे हैं, उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। प्रशासन का हमें सहयोग नहीं मिला।”
आरु (कक्षा 8वीं, परिवर्तित नाम)
“मैं 31 जनवरी को आखिरी बार स्कूल गई थी। उसके बाद गांव में हिंसा हो गई और हमें यहां आना पड़ा। मैं डॉक्टर बनना चाहती हूं, लेकिन अब पढ़ाई पूरी तरह रुक गई है। मेरे स्कूल के दोस्त भी अब संपर्क में नहीं हैं।”
आलिया (कक्षा 6वीं, परिवर्तित नाम)
“हम पिछले डेढ़ महीने से स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। सिर्फ परीक्षा देने के लिए गए थे। घर पर थोड़ी बहुत पढ़ाई हो जाती थी, लेकिन यहां पढ़ाई करना मुश्किल हो रहा है। हम जल्दी अपने घर वापस जाना चाहते हैं।”
अमाना (14 वर्ष, परिवर्तित नाम)
“हिंसा के दिन हमारे गांव में बहुत तोड़फोड़ हुई। हमें धमकी दी गई कि अगर बच्चे घर से बाहर जाएंगे या स्कूल जाएंगे तो उन्हें मार दिया जाएगा। इसके बाद हम सबको गांव छोड़कर रायपुर आना पड़ा। हम चाहते हैं कि हमारा घर फिर से सुरक्षित हो जाए।”
अमाना- पुलिस आई और हमें बाहर निकाला
“हम घर के बाहर बैठे थे, तभी कुछ लोग दौड़ते हुए आए और कहने लगे कि इन्हें छोड़ना नहीं है। वे मदरसे में तोड़फोड़ करने लगे। हम डरकर पड़ोस में छिप गए। बाहर गालियां और तोड़फोड़ की आवाजें आ रही थीं। कुछ देर बाद पुलिस आई और हमें बाहर निकाला।”
शिना (कक्षा 11वीं, परिवर्तित नाम)
“दोपहर के बाद सैकड़ों लोग हमारे मोहल्ले की तरफ आए। सबसे पहले उन्होंने CCTV कैमरे तोड़ दिए। फिर घरों के दरवाजे पीटने लगे। जब लोगों ने बात करने की कोशिश की तो उन पर चाकू से हमला किया गया।”
शिना बोली- हमें लगा अब हम जिंदा नहीं बचेंगे
“हम 9 लोग एक कमरे में छिपे हुए थे। बाहर आग लग रही थी और धुआं अंदर आ रहा था। सांस लेना मुश्किल हो गया था। गाड़ियों के जलने और सिलेंडर फटने की आवाजें आ रही थीं। हमें लगा कि अब हम जिंदा नहीं बचेंगे।”
शिना - पैरों पर गिराकर जबरन नारे लगवाए
“मेरे चाची के बेटे के सिर पर रॉड रखकर उसे नारे लगाने के लिए मजबूर किया गया। कहा गया कि अगर नारा नहीं लगाया तो मार देंगे। उसे पैरों पर गिराकर जबरन नारे लगवाए गए। मेरे चाचा पर भी हमला किया गया।”
शिना- मैं पायलट बनना चाहती हूं
“मैं पायलट बनना चाहती हूं, लेकिन यहां पढ़ाई करना मुश्किल हो रहा है। हम सिर्फ परीक्षा देने गए थे। टीचर का व्यवहार ठीक था, लेकिन बाकी बच्चे हमसे बात नहीं कर रहे थे। मैं चाहती हूं कि दोषियों को सख्त सजा मिले।”
सैय्यदा कुरैशी
“मैं उस रात घर पर नहीं थी। मुझे फोन आया कि घरों को जला दिया गया है। मेरा पांच कमरों का घर था, सब कुछ खत्म हो गया। मेरे गहने भी चोरी हो गए। हम चाहते हैं कि हमारा घर फिर से बन जाए और हम वापस गांव जा सकें।”
यासमीन बेगम
“मैं घर पर थी, तभी कुछ लड़के गाली देते हुए निकले। थोड़ी देर बाद पता चला कि बाहर दंगा हो रहा है। हमने बाहर निकलने की कोशिश की, लेकिन रास्ते बंद कर दिए गए थे। हम चार परिवार एक घर में छिप गए थे।”
यासमीन बेगम- हाथ में तलवार, चाकू और डंडे थे
“करीब 60-70 लोग घर में घुस आए थे। उनके हाथ में तलवार, चाकू और डंडे थे। उन्होंने दरवाजा तोड़कर हमारे साथ मारपीट की। हम फोन पर मदद मांगते रहे, लेकिन काफी देर तक कोई नहीं आया।”
महमूद्दीन कुरैशी
“घटना के दौरान मुझे रायपुर ले जाया गया था, लेकिन परिवार के लोग बहुत परेशान थे। इस हिंसा में हमारा सब कुछ खत्म हो गया। सबसे दुख की बात यह है कि जिन लोगों ने हमला किया, वे आज भी खुले घूम रहे हैं।”

आरोपियों पर कार्रवाई की मांग
पीड़ित परिवारों की मांग है कि इस हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। उनका कहना है कि वे निर्दोष हैं और उनके साथ अन्याय हुआ है। वे अपने घरों के नुकसान की भरपाई और सुरक्षा की मांग कर रहे हैं।
डर अब भी कायम, गांव लौटने में हिचक
घटना के बाद से पीड़ित परिवारों में डर बना हुआ है। कई लोग गांव लौटने से डर रहे हैं। उनका कहना है कि जब तक सुरक्षा की गारंटी नहीं मिलती, तब तक वापस जाना मुश्किल है।
सबसे बड़ा सवाल- क्या लौट पाएगी सामान्य जिंदगी?
दुतकैया गांव की इस हिंसा ने कई परिवारों की जिंदगी बदल दी है। घर जल गए, बच्चे पढ़ाई से दूर हो गए और लोगों का भरोसा टूट गया। अब सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या इन परिवारों को न्याय मिलेगा और क्या वे फिर से अपनी सामान्य जिंदगी जी पाएंगे?

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