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यूटरस फटने से तड़प-तड़पकर मां की मौत : देवमाता हॉस्पिटल लील गया जिंदगी, हाईवे पर शव रखकर प्रदर्शन, खून बहता रहा और बेबस दर्द से चीखती रही

गिरीश जगत, गरियाबंद। देवभोग का वह निजी अस्पताल उस रात इलाज का मंदिर नहीं, बल्कि एक जालिम क्रू की तरह नजर आया, जहां एक मां जिंदगी और मौत के बीच तड़पती रही और सिस्टम तमाशा देखता रहा। प्रसव पीड़ा से कराहती मां को उम्मीद थी कि अस्पताल के भीतर उसकी कोख से नई जिंदगी जन्म लेगी, लेकिन उसी कोख के भीतर यूटरस फट गया।शरीर से बहता खून धीरे-धीरे उसकी सांसें निगलता चला गया। दर्द से चीखती प्रसूता घंटों तक मदद की आस में पड़ी रही, लेकिन वक्त पर न खून मिला, न ऐसा इलाज जो उसकी जिंदगी बचा पाता।

जब तक अस्पताल को हालात की भयावहता समझ आई, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। एक मां तड़प-तड़पकर मौत के करीब पहुंच चुकी थी। गंभीर हालत को संभालने की जगह अस्पताल ने जिम्मेदारी से हाथ खड़े कर दिए। रेफर की औपचारिकता में जिंदगी फंसकर रह गई।

यूटरस फटने से लगातार बहता खून भानुमति के शरीर को भीतर से खाली करता रहा। आखिरकार प्रसव के 12 घंटे के भीतर उसकी मौत हो गई। मौत के बाद फूटा गुस्सा सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं था, बल्कि उस स्वास्थ्य व्यवस्था के खिलाफ चीख था, जहां गरीब की जिंदगी अक्सर अस्पतालों की लापरवाही और सिस्टम की बेरुखी के बीच दम तोड़ देती है।

अब पढ़िए पूरी कहानी ?

छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में एक बार फिर निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली और ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। देवभोग इलाके में प्रसव के बाद एक 30 वर्षीय प्रसूता की मौत ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया। आरोप है कि निजी अस्पताल की लापरवाही, समय पर सही इलाज नहीं मिलने और गंभीर स्थिति को संभालने में देरी के कारण एक महिला की जिंदगी चली गई। घटना के बाद गुस्साए परिजन और समाज के लोग सड़क पर उतर आए और नेशनल हाईवे 130-C पर शव रखकर चक्काजाम कर दिया।

मृतिका की पहचान भानुमति मांझी (30 वर्ष) के रूप में हुई है। बताया जा रहा है कि प्रसव के लिए उन्हें देवभोग स्थित निजी अस्पताल “देवमाता हॉस्पिटल” में भर्ती कराया गया था। परिजनों के मुताबिक प्रसव के दौरान महिला की हालत बिगड़ती चली गई, लेकिन अस्पताल प्रबंधन समय पर गंभीर स्थिति को संभाल नहीं पाया। आरोप है कि प्रसव के बाद करीब 12 घंटे के भीतर ही महिला की मौत हो गई।

घटना के बाद अस्पताल परिसर और हाईवे पर माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया। बड़ी संख्या में ग्रामीण, समाज के लोग और परिजन मौके पर जुट गए। आक्रोश इतना था कि लोगों ने शव को सड़क पर रख दिया और नेशनल हाईवे जाम कर दिया। देखते ही देखते हाईवे पर वाहनों की लंबी कतार लग गई। प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना था कि अगर समय पर सही इलाज और खून की व्यवस्था हो जाती तो भानुमति की जान बच सकती थी।

परिजनों ने आरोप लगाया कि अस्पताल ने गंभीर स्थिति को समय रहते नहीं संभाला और बाद में जिम्मेदारी से बचने के लिए रेफर कर दिया। बताया जा रहा है कि हालत बिगड़ने पर महिला को ओडिशा के अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। जानकारी के मुताबिक यूटरस फट जाने के कारण अत्यधिक रक्तस्राव हुआ और समय पर खून नहीं मिलने से उसकी मौत हो गई।

घटना के बाद लोगों का गुस्सा सिर्फ एक मौत तक सीमित नहीं था, बल्कि ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था के खिलाफ फूट पड़ा। प्रदर्शन कर रहे लोगों ने अस्पताल का लाइसेंस निरस्त करने, जिम्मेदार डॉक्टरों और प्रबंधन के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की।

उनका कहना था कि ग्रामीण इलाकों में कई निजी अस्पताल बिना पर्याप्त संसाधनों और विशेषज्ञ सुविधाओं के गंभीर मरीजों का इलाज कर रहे हैं, जिसका खामियाजा गरीब परिवारों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ रहा है।

हाईवे जाम की सूचना मिलते ही पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने परिजनों और समाज के लोगों को समझाने की कोशिश की, लेकिन प्रदर्शनकारी कार्रवाई की मांग पर अड़े रहे। काफी देर तक सड़क पर तनावपूर्ण स्थिति बनी रही।

वहीं दूसरी ओर देवमाता अस्पताल प्रबंधन ने अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज किया है। अस्पताल की ओर से डॉक्टर सागर गाटवाक ने कहा कि प्रसव के दौरान बच्चा फंस गया था और मरीज की स्थिति गंभीर होने लगी थी। उनके मुताबिक परिजनों की सहमति के बाद महिला को रेफर किया गया था। डॉक्टर का दावा है कि मरीज को प्राथमिक उपचार देने के बाद नजदीकी ओडिशा अस्पताल भेजा गया था।

डॉक्टर सागर गाटवाक ने यह भी कहा कि महिला का यूटरस फट गया था और उसे तत्काल खून चढ़ाने की जरूरत थी, लेकिन समय पर खून नहीं चढ़ाया जा सका। उनका कहना है कि यदि समय रहते ब्लड ट्रांसफ्यूजन हो जाता तो स्थिति अलग हो सकती थी। हालांकि परिजनों ने इस दावे को खारिज करते हुए पूरा दोष अस्पताल प्रबंधन पर मढ़ा है।

अब यह मामला सिर्फ एक अस्पताल या एक परिवार तक सीमित नहीं रह गया है। यह घटना ग्रामीण क्षेत्रों में प्रसूति सेवाओं, निजी अस्पतालों की जवाबदेही और आपातकालीन स्वास्थ्य सुविधाओं की पोल खोल रही है।

सवाल यह उठ रहा है कि आखिर कब तक ग्रामीण महिलाएं प्रसव जैसी सामान्य प्रक्रिया में अपनी जान गंवाती रहेंगी? कब तक निजी अस्पताल गंभीर मरीजों को “रेफर” करने के नाम पर जिम्मेदारी से बचते रहेंगे? और आखिर कब प्रशासन ऐसे मामलों में सिर्फ समझाइश नहीं, बल्कि सख्त कार्रवाई करेगा?

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