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लाल सलाम से लहू तक, इंसाफ से खून की नदिया तक : नक्सलबाड़ी से उठी चिंगारी से कैसे फैली खूनी आग, 12 ग्राफिक्स से समझिए लाल गलियारे का काला सच

पुरुषोत्तम पात्र, संपादक, mpcgtimes.com

घने जंगलों की खामोशी में जब अचानक गोलियों की गूंज उठती थी, तो लगता था जैसे जमीन खुद अपनी कहानी बयां कर रही हो। लाल सलाम के नारों के बीच पनपा नक्सलवाद महज एक आंदोलन नहीं, बल्कि खून से सना फसाना है। 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुई यह चिंगारी, वक्त के साथ एक ऐसी आग में तब्दील हो गई, जिसने देश के कई हिस्सों को अपनी चपेट में ले लिया।

Naxalism Full Story | Red Corridor Truth, Naxalbari to Violence Explained in 12 Graphics: शुरुआत जमीन और हक की जंग से हुई थी, मगर धीरे-धीरे यह रास्ता हिंसा, खौफ और बगावत की तरफ मुड़ता चला गया, जहां बंदूकें ही जुबान बन गईं और बारूद ही जवाब।

Naxalism Full Story | Red Corridor Truth, Naxalbari to Violence Explained in 12 Graphics: इस कहानी का हर पहलू अपने भीतर एक अजीब सी कशमकश समेटे हुए है। एक तरफ वो लोग हैं, जो इसे हक और इंसाफ की जंग बताते हैं, तो दूसरी तरफ वो सख्त हकीकत है, जिसमें मासूमों का खून बहा और गांव के गांव दहशत में जीये।

Naxalism Full Story | Red Corridor Truth, Naxalbari to Violence Explained in 12 Graphics: इसी सियाह हकीकत की तह तक जाने के लिए हम आपको लेकर चलेंगे एक खास सफर पर “12 ग्राफिक्स स्लाइड” के जरिए। हर स्लाइड इस कहानी की एक नई परत खोलेगी, कहीं इतिहास की धुंध से निकलती सच्चाई, कहीं बड़े हमलों का खौफनाक चेहरा, तो कहीं उस सन्नाटे में छुपी आवाजें जो अक्सर अनसुनी रह जाती हैं। ये सिर्फ जानकारी नहीं, बल्कि एक मुकम्मल तस्वीर होगी नक्सलवाद की, उसके दर्द की और उस जंग की, जिसे आज से खत्म होने का दावा किया गया है।

12 ग्राफिक्स स्लाइड्स से समझिए नक्सलवाद की शुरूआत और खात्मा

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क्या नक्सलवाद को जड़ से खत्म किया जा सकता है?

‘नक्सलबाड़ी अबूझमाड़’ किताब लिखने वाले सीनियर जर्नलिस्ट आलोक पुतुल बताते हैं, ‘1967 में शुरू हुआ नक्सलवाद आंदोलन 1973 तक लगभग खत्म हो चुका था। करीब 40 साल बाद केंद्र सरकार ने माना कि ये आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा है। यानी नक्सलवाद फिर से खड़ा हुआ। धरातल से भले ही नक्सलियों को खत्म कर दिया, लेकिन इनकी सोच को खत्म नहीं किया जा सकता।

नक्सलवाद फिर से भी पनप सकता है। एक नए तरीके से, एक नए रूप में। चाहे कम हिंसक या फिर पूरी तरह अहिंसक।’ 'नाइटमार्चः अमंग इंडियाज रिवोल्यूशनरी गुरिल्ला' किताब की लेखिका और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की प्रोफेसर अल्पा शाह डेढ़ साल तक नक्सलियों के बीच रह चुकी हैं। अल्पा के मुताबिक, तमाम मुश्किलों के बावजूद नक्सल आंदोलन चलता रहा। जब-जब सरकार ने सोचा कि नक्सलवाद खत्म हो गया है, तब-तब यह दोबारा उभर कर सामने आया।

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