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अमरकंटक बन रहा था नक्सलियों का नया हेडक्वार्टर : यहीं से चलाते खूनी साम्राज्य, आदिवासी थे लाल आतंक के टारगेट, हाथों में थमाते हथियार; जानिए कैसे ढहा रेड कॉरिडोर ?

यहीं से चलाते खूनी साम्राज्य, आदिवासी थे लाल आतंक के टारगेट, हाथों में थमाते हथियार; जानिए कैसे ढहा रेड कॉरिडोर ?

Red Terror in Amarkantak: Naxal HQ Exposed | Central India Naxal Crackdown 2026: 31 मार्च 2026 नक्सलियों के खात्मे की तय तारीख बताई गई। मध्य प्रदेश के लिए यह अहम है क्योंकि अनूपपुर का अमरकंटक नया नेशनल हेडक्वार्टर बनने की ओर बढ़ रहा था। छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ से वे इंफ्रास्ट्रक्चर यहां शिफ्ट करने की तैयारी में थे। अमरकंटक की पावन धरती, घनी पहाड़ियों में लाल आतंक का खौफ फैलाने की साजिश थी।

नक्सली मां नर्मदा की भूमि अमरकंटक को नए हेडक्वार्टर बनाने ब्लू प्रिंट तैयार कर चुके थे। गोलियों की गूंज और बमों के धमाके से जंगल को डरावना मैदान बनाने। खून की नदियां बहाने, बेबस लोगों की बलि चढ़ाने,इलाके में खौफ का साम्राज्य गढ़ने की साजिश उनके दिमाग में घूम रही थी। हर रास्ता छांटा, हर छिपने का ठिकाना चुना, लेकिन उन्हें पता नहीं था कि जवानों की निगाहें हर कदम पर टिकी हैं। नक्सलियों के खौफनाक प्लान को मिट्टी में मिला दिया।

सरेंडर नक्सलियों से मिले दस्तावेजों में खुलासा हुआ कि 2016 में सेंट्रल कमेटी ने अमरकंटक को संभावित हेडक्वार्टर चुना था। कारण था कि अबूझमाड़ सुरक्षाबलों के निशाने पर आ चुका था। कमांडरों ने भी माना कि इसी वजह से छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के नक्सलियों का यहां मूवमेंट बढ़ रहा था।

Red Terror in Amarkantak: Naxal HQ Exposed | Central India Naxal Crackdown 2026: बालाघाट एसपी Aditya Mishra के मुताबिक, नक्सली अमरकंटक के घने जंगलों में नया ठिकाना विकसित कर रहे थे। बरामद दस्तावेजों और सरेंडर नक्सल कमांडरों ने इसकी पुष्टि की।

Red Terror in Amarkantak: Naxal HQ Exposed | Central India Naxal Crackdown 2026: अगस्त 2024 में केंद्रीय गृहमंत्री Amit Shah की डेडलाइन के बाद हालात तेजी से बदले। सवाल है कि माओवादी अचानक सरेंडर क्यों करने लगे?

इसका जवाब जानने के लिए एंटी-नक्सल ऑपरेशन से जुड़े अधिकारियों से बात की गई, कुछ ऑफ रिकॉर्ड और कुछ कैमरे पर।

नक्सली अमरकंटक को ही हेडक्वॉर्टर क्यों बनाना चाहते थे?

नक्सली अमरकंटक को हेडक्वॉर्टर बनाने की ओर इसलिए बढ़ रहे थे क्योंकि यह इलाका भौगोलिक रूप से बेहद रणनीतिक है। यह मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा पर स्थित होकर कई नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को जोड़ने वाला कनेक्टिंग पॉइंट बनता है।

अबूझमाड़ जैसे पुराने ठिकानों पर सुरक्षा बलों का दबाव बढ़ने के बाद नक्सलियों को ऐसे नए क्षेत्र की जरूरत थी, जहां शुरुआती दौर में निगरानी कम हो और वे आसानी से अपनी पकड़ बना सकें।

क्या अमरकंटक के जंगल नक्सलियों के सेफ ठिकाना था?

अमरकंटक के जंगल नक्सलियों के लिए संभावित सेफ ठिकाना माने जा रहे थे, क्योंकि यहां घने वन, पहाड़ी भूगोल और कम आबादी है। ऐसे इलाके में छिपना और मूवमेंट करना आसान होता है, हालांकि यह पूरी तरह सुरक्षित जोन नहीं कहा जा सकता।

अमरकंटक के जंगलों का दायरा क्या है, बालाघाट और अबूझमाड़ के मुकाबले?

अमरकंटक का जंगल क्षेत्र बालाघाट और अबूझमाड़ जितना गहरा और विस्तृत नहीं है, लेकिन यह एक ट्रांजिशन बेल्ट की तरह काम करता है। यहां के जंगल छोटे-छोटे समूहों के छिपने और मूवमेंट के लिए पर्याप्त कवर देते हैं।

किन राज्यों से कैसे कनेक्ट होता है?

अमरकंटक से छत्तीसगढ़ के पेंड्रा और आगे बस्तर, मध्य प्रदेश के डिंडौरी-मंडला होते हुए बालाघाट और महाराष्ट्र के गढ़चिरौली, जबकि दूसरी दिशा में झारखंड और बिहार तक कनेक्टिविटी बनती है। यह मल्टी-स्टेट कनेक्शन इसे रणनीतिक बनाता है।

अमरकंटक से नक्सलियों को कैसे फायदा पहुंचता?

इस लोकेशन से नक्सली अलग-अलग राज्यों के नेटवर्क को जोड़कर मूवमेंट, लॉजिस्टिक और कम्युनिकेशन को मजबूत कर सकते थे। साथ ही, नया इलाका होने के कारण शुरुआती दबाव कम रहता, जिससे वे अपनी पकड़ बना सकते थे।

क्या ये जंगल बालाघाट और अबूझमाड़ से ज्यादा सेफ थे?

अमरकंटक के जंगल पूरी तरह से बालाघाट और अबूझमाड़ से ज्यादा सुरक्षित नहीं थे। अबूझमाड़ अधिक गहरा और सुरक्षित है, लेकिन वहां सुरक्षा बलों का दबाव ज्यादा है। अमरकंटक में निगरानी कम होने के कारण शुरुआती तौर पर यह लो-रिस्क जोन बन सकता था।

अमरकंटक के जंगल छिपने के लिए कितने अनुकूल हैं?

यहां के घने जंगल, पहाड़ी रास्ते और सीमित सड़क नेटवर्क नक्सलियों को छिपने और बच निकलने में मदद करते हैं। हालांकि लंबे समय तक बड़े बेस के लिए यह क्षेत्र पूरी तरह आदर्श नहीं माना जाता।

क्या अनूपपुर, डिंडौरी, शहडोल, मंडला, पेंड्रा के युवा टारगेट थे?

ऐसी आशंका रहती है कि सीमावर्ती और दूरदराज के जिलों के युवाओं को नक्सली टारगेट कर सकते हैं। बेरोजगारी और सीमित संसाधनों का फायदा उठाकर वे स्थानीय स्तर पर अपनी पकड़ बनाने की कोशिश करते हैं, हालांकि हर मामले में इसकी आधिकारिक पुष्टि अलग-अलग होती है।

5 प्वाइंट में समझिए क्यों नक्सली सरेंडर को मजबूर हुए

  1. नक्सली खाने को मोहताज, पैसा भी बेकार

सबसे प्रभावित 72 गांवों तक पहली बार पुलिस-प्रशासन की सीधी पहुंच बनी। कलेक्टर Mrinal Meena और एसपी Aditya Mishra गांवों में पहुंचे और संवाद किया। ग्रामीणों ने संकल्प लिया कि वे नक्सलियों को न खाना देंगे, न मदद। इससे नक्सलियों को रसद मिलना बंद हो गया। लाखों रुपए होने के बावजूद वे राशन नहीं जुटा पाए। पुलिस ने नक्सल कमांडर Deepak से 11.50 लाख रुपए बरामद किए, लेकिन यह रकम भी काम नहीं आई।

  1. मूवमेंट रूट पर कैंप, नई सर्च रणनीति

सुरक्षाबलों ने मूवमेंट वाले रास्तों पर पुलिस, सीआरपीएफ, कोबरा और हॉक फोर्स के कैंप लगाए, जिससे नक्सलियों की आवाजाही मुश्किल हो गई। सर्च ऑपरेशन 48 घंटे से बढ़ाकर 7 दिन किया गया। अब इनपुट पर सुरक्षाबल कई दिनों तक जंगल में डटे रहते, जिससे दबाव बना।

  1. मेगा कॉसो ऑपरेशन से दबाव बढ़ा

साल 2025 में 10 नक्सली मारे गए, जिससे संगठन में भय बढ़ा। इसी दौरान ‘मेगा कॉसो’ (कॉर्डन एंड सर्च ऑपरेशन) रणनीति लागू की गई। पूरे साल 44 बड़े ऑपरेशन हुए, जिनमें 700 से 1200 जवान शामिल थे और 2 से 7 दिन तक कार्रवाई चली। जवान हफ्ते भर का राशन लेकर जंगल में उतरते थे। इंटरस्टेट ऑपरेशन में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र पुलिस की संयुक्त कार्रवाई से नक्सलियों के भागने के रास्ते बंद हो गए।

  1. नक्सलियों की फंडिंग रोकी

नक्सलियों की फंडिंग रोकने के लिए पुलिस ने तेंदुपत्ता कारोबार में बदलाव किए। ठेकेदारों से वसूली रोकने के लिए फड़ों का बीमा कराया और नकद लेनदेन बंद किया गया। भुगतान सीधे खातों में होने लगा। इसी मॉडल को अन्य निर्माण कार्यों में लागू कर उनकी आर्थिक रीढ़ कमजोर की गई।

  1. मददगारों पर शिकंजा, सरेंडर बढ़े

पुलिस ने नक्सलियों के 145 मददगारों की पहचान की। कई के खिलाफ केस दर्ज कर जेल भेजा गया, जबकि अन्य को चेतावनी देकर छोड़ा गया। इसका असर दिखा और 1 नवंबर से 12 दिसंबर 2025 के बीच 42 दिनों में 42 नक्सलियों ने सरेंडर किया, जो बड़ी सफलता मानी गई।

सबसे बड़ी चुनौती थी लोगों का भरोसा जीतना

नक्सलवाद के खिलाफ अभियान में टर्निंग पॉइंट तब आया, जब प्रशासन ने लोगों का भरोसा जीता। ग्रामीणों को समझ आया कि विकास में सबसे बड़ी बाधा नक्सली हैं, जिससे उनका नजरिया बदला। एसपी और कलेक्टर की मौजूदगी में उन्होंने संकल्प लिया कि नक्सलियों को सहयोग या पनाह नहीं देंगे।

यहीं से लाल आतंक की उल्टी गिनती शुरू हुई। 2025 में प्रभावित क्षेत्रों में 360 किमी सड़कें बनीं और 72 मोबाइल टॉवर लगाए गए, जिससे गांव नेटवर्क से जुड़े। सिंगल विंडो सिस्टम से काम आसान हुए और गांव-गांव कैंप लगाकर नामांतरण व प्रमाण पत्र बनाए गए।

मल्टीनेशनल कंपनियों में युवाओं को रोजगार

क्षेत्र में बेरोजगार युवाओं के लिए प्रशासन ने डिजिटल रजिस्ट्री बनाकर योग्यता आधारित ब्लूप्रिंट तैयार किया। इसके तहत ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स समेत मल्टीनेशनल कंपनियों को बालाघाट बुलाया जा रहा है। युवाओं को ट्रेनिंग के बाद 15 से 25 हजार रुपए वेतन वाली नौकरियां दी जा रही हैं। पिछले साल 2500 युवाओं को रोजगार मिला, जबकि इस साल 4000 को नौकरी मिलने का दावा है।

280 स्कूलों को बिना सरकारी मदद के बदला

एसपी Aditya Mishra के अनुसार, नक्सल समस्या की जड़ में शिक्षा है। प्राथमिक शिक्षा सुधारने के लिए विद्यांजलि अभियान शुरू किया गया, जिसमें लोगों ने स्कूल गोद लिए। पुलिस जवानों ने स्कूलों की रंगाई-पुताई की और उन्हें संवारा। बिना सरकारी मदद के 8 करोड़ रुपए जुटाए गए और शिक्षकों की तैनाती की गई। उन्होंने कहा कि उनके नाना स्व. Surendranath Dubey ने प्राथमिक शिक्षा सुधारने की सलाह दी थी। इसके बाद इसे जन आंदोलन बनाया गया और परिणाम सामने हैं।

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