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: चुनाव से पहले छत्तीसगढ़ कांग्रेस में होगा खेला! सिंहदेव का बयान केवल छटपटाहट या धमकी?

News Desk

News Desk / Wed, Dec 21, 2022

चुनाव से पहले छत्तीसगढ़ कांग्रेस में होगा खेला! सिंहदेव का बयान केवल छटपटाहट या धमकी?

टीएस सिंहदेव के ताजा बयान से छत्तीसगढ़ की सियासत में खलबली मची हुई है। कुछ लोग इसे चुनाव से पहले कांग्रेस में बड़े खेल का इशारा बता रहे हैं। दूसरी ओर कुछ लोगों का मानना है कि यह सीएम की कुर्सी नहीं मिलने की बाबा की छटपटाहट भर है। सच्चाई क्या है, यह तभी पता चलेगा जब सिंहदेव अपने बारे में वास्तव में कोई फैसला लेते हैं।

 

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हाइलाइट्स

  • टी एस सिंहदेव के बयान के निकाले जा रहे मायने
  • चुनाव से पहले कांग्रेस में टूट की जताई जा रही आशंका
  • कुछ लोग इसे सिंहदेव की छटपटाहट मान रहे
रायपुर: छत्तीसगढ़ में 15 साल के बाद सत्ता में आई कांग्रेस सरकार को चार साल पूरे हो चुके हैं। शुरुआती 2 वर्षों को छोड़ दिया जाए तो उसके बाद से अब तक सियासी गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की रही है कि भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने रहेंगे या टीएस सिंहदेव को मौका मिलेगा। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और खुद टीएस बाबा ने इसका फैसला कांग्रेस हाईकमान पर छोड़ रखा था। दोनों बार-बार यह स्पष्ट कहते रहे कि अगर हाईकमान कहेगा तो मुख्यमंत्री बदल जाएगा। 2023 में एक बार फिर विधानसभा के चुनाव होने हैं, लेकिन उससे पहले टीएस बाबा का मूड बदला हुआ नजर आ रहा है। मंगलवार को उन्होंने कह दिया कि अगले विधानसभा चुनाव से पहले वे अपने भविष्य के बारे में फैसला लेंगे। उनका यह बयान कांग्रेस को मुश्किल में डाल सकता है। हालांकि, बाबा के बयान के मायने अभी स्पष्ट नहीं हैं। एनबीटी डिजिटल से बातचीत में उन्होंने कहा कि उनके अगले कदम के बारे में कुछ भी कहना अभी जल्दबाजी होगी। ऐसे में यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि यह बयान केवल उनकी छटपटाहट है या फिर बड़ी धमकी।

संन्यास लेंगे या चुनाव से दूरी!


छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव में एक साल से भी कम समय बचा है। टीएस सिंहदेव 2018 में मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे, लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने भूपेश बघेल को चुना। उस समय सीएम पद के लिए ढाई-ढाई के फॉर्म्यूले की भी चर्चा हुई थी, लेकिन किसी ने इसकी पुष्टि नहीं की। अब सिंहदेव ने 2023 के चुनाव से पहले अपने भविष्य के बारे में फैसला लेने की बात कही है। बाबा का यह बयान कई तरह के इशारे कर रहा है। क्या वे राजनीति से संयास ले लेंगे या फिर कांग्रेस से किनारा कर लेंगे। कहीं ऐसा तो नहीं कि सिंहदेव चुनाव नहीं लड़ने का मन बना रहे हैं।

ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री की कशमकश के बीच बीते चार साल


छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को सत्ता की चाबी मिलने के बाद शुरू से ही प्रदेश में ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री को लेकर चर्चा चल रही थी। इसको लेकर बार-बार कई तरह के बयान भी सामने आए। सिंहदेव लगातार दिल्ली के दौरों पर जाते रहे। जवाब में भूपेश बघेल के समर्थक विधायकों ने भी दिल्ली में अपना शक्ति प्रदर्शन किया। विधानसभा सत्र के बीच में बाबा का सदन छोड़कर निकल जाना और ढाई साल के कथित फॉर्म्यूले को लेकर मीडिया के सवालों के जवाब में हाईकमान के आदेश पर निर्भरता की बात कहना भी लगातार सुर्खियां बनी। अपनी ही पार्टी के विधायक ने उन पर जान लेने की कोशिश करने का आरोप तक लगाया। इस ड्रामे की पराकाष्ठा तब देखने को मिली जब सिंहदेव ने अचानक पंचायत मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। इन सबके बीच सिंहदेव ने कभी यह नहीं कहा कि वे अपने स्तर पर कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं। 2023 चुनाव से पहले अपने भविष्य के बारे में फैसला लेना की बात इसलिए महत्वपूर्ण है।

कांग्रेस से किनारा करने पर बदल जाएगा चुनाव का गणित


सरगुजा राजघराने से ताल्लुक रखने वाले सिंहदेव ने कभी कांग्रेस से दूर होने की बात नहीं कही। अपने लंबे राजनीतिक सफर में वे छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे और 2018 के चुनाव में कांग्रेस की जीत में अहम रोल अदा किया। जीते हुए विधायकों में उनके समर्थकों की अच्छी खासी संख्या है, लेकिन बहुमत बघेल के साथ है। बीते चार वर्षों के दौरान कई समर्थक उनका साथ छोड़कर बघेल गुट में शामिल हो गए। सरगुजा से लेकर बस्तर तक प्रदेश के आदिवासी बहुल इलाकों में सिंहदेव कांग्रेस का सबसे बड़ा चेहरा हैं। यदि वे पार्टी छोड़ने जैसा कोई फैसला लेते हैं तो यह तय है कि 2023 के चुनाव में कांग्रेस को बड़ा नुकसान झेलना पड़ सकता है। राज्य का पूरा सियासी गणित सिंहदेव के एक फैसले से बदल सकता है, लेकिन क्या वे ऐसा कर पाएंगे। क्या सिंहदेव अकेले दम पर कांग्रेस और बीजेपी से मुकाबला कर सकते हैं। क्या उनकी अधूरी हसरतें बीजेपी में जाने से पूरी हो सकती हैं। इन सवालों के जवाब तो फिलहाल समय के गर्त में छिपी हैं। अभी तो यही लग रहा है कि बाबा का बयान धमकी से ज्यादा सीएम की कुर्सी न मिलने की छटपटाहट है। संभव है कि इसके जरिए वे चुनावों में अपने ज्यादा से ज्यादा समर्थकों को टिकट दिलाने की रणनीति पर काम कर रहे हों, जिससे चुनाव के बाद आलाकमान के साथ बेहतर डील करने की हालत में हों।

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