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गरियाबंद की मां-नवजात को ओडिशा में 6 दिन बनाया बंधक : डिलीवरी के बाद 15 हजार नहीं दे पाए, तो आदिवासी महिला-बच्चों को निजी अस्पताल ने बनाया हॉस्टेज, मीडिया पहुंची तो खुला

छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले से सटे ओडिशा के कालाहांडी जिले में स्थित एक निजी अस्पताल में डिलीवरी के बाद आदिवासी महिला, उसके नवजात और तीन साल के बेटे को बंधक बनाकर रखने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। पीड़ित परिवार विशेष पिछड़ी भुंजिया जनजाति से है।

धर्मगढ़ स्थित मां भंडारणी क्लिनिक में नॉर्मल डिलीवरी के बाद अस्पताल प्रबंधन ने 20 हजार रुपए का बिल थमा दिया। परिवार 5 हजार रुपए ही जमा कर पाया। शेष 15 हजार रुपए नहीं देने पर अस्पताल ने मां, नवजात बच्ची और तीन साल के बेटे को करीब 6 दिनों तक अस्पताल में रोककर रखा।

लेबर पेन पर अस्पताल पहुंची थी महिला

मैनपुर ब्लॉक के मूचबहल गांव निवासी नवीना चींदा (23) को 18 जनवरी को लेबर पेन होने पर परिजन धर्मगढ़ के इस निजी अस्पताल लेकर पहुंचे थे। उसी दिन नॉर्मल डिलीवरी हुई और बच्ची का जन्म हुआ।

पैसे जुटाने गांव लौटी सास

प्रसूता की सास दोषो बाई ने बताया कि अस्पताल में भर्ती के दौरान 5 हजार रुपए जमा किए गए थे, लेकिन डिलीवरी के बाद 15 हजार और मांगे गए। पैसे के इंतजाम के लिए वह 21 जनवरी को गांव लौट आईं, लेकिन गरीब परिवार कहीं से भी रकम नहीं जुटा सका।

पति बाहर मजदूरी करता है

परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब है। नवीना का पति पोड़ा आंध्र प्रदेश में ईंट भट्ठे पर मजदूरी करता है और तत्काल पैसे भेजने की स्थिति में नहीं था। इसी बीच मां और दोनों बच्चे अस्पताल में ही फंसे रहे।

पहले ऑपरेशन में लगा था 85 हजार खर्च

दोषो बाई ने बताया कि तीन साल पहले नवीना की पहली डिलीवरी इसी अस्पताल में ऑपरेशन से हुई थी, जिसमें 85 हजार रुपए खर्च हुए थे। तब इलाज के लिए परिवार को सोना-चांदी तक बेचनी पड़ी थी।

मीडिया पहुंची तो खुला मामला

मामला जब मीडिया तक पहुंचा और पत्रकार अस्पताल पहुंचे, तो अस्पताल संचालक चैतन्य मेहेर ने कैमरा बंद कराने को कहा। मीडिया के दबाव के बाद ही मां, नवजात और तीन साल के बच्चे को एंबुलेंस से गांव भेजा गया।

6 दिन बाद घर लौटे मां-बच्चे

करीब 6 दिन तक बंधक बने रहने के बाद मां और दोनों बच्चे सुरक्षित गांव लौट सके। सास पहले ही पैसों की व्यवस्था के लिए गांव आ चुकी थी।

जिला पंचायत अध्यक्ष ने की हस्तक्षेप

जिला पंचायत अध्यक्ष गौरी शंकर कश्यप ने बताया कि जानकारी मिलते ही अस्पताल में प्रतिनिधि भेजा गया। करीब दो घंटे तक अस्पताल प्रबंधन ने टालमटोल की, इसके बाद देवभोग की एंबुलेंस से मां और नवजात को वापस लाया गया। मामले की जांच के निर्देश CMHO को दिए जाएंगे।

अस्पताल संचालक की सफाई

अस्पताल संचालक चैतन्य मेहेर ने आरोपों को नकारते हुए कहा कि परिवार ने पैसों की कोई परेशानी नहीं बताई थी। अगर पहले जानकारी दी जाती तो उन्हें रोका नहीं जाता। उन्होंने दावा किया कि अस्पताल में रहते हुए मां और बच्चों की पूरी देखभाल की गई।

मितानिन बोलीं – कार्ड नहीं बन पाया

गांव की मितानिन पार्वती ध्रुव ने बताया कि महिला गर्भावस्था के छठे महीने में गांव आई थी। जांच कराई गई थी, लेकिन पंजीयन कार्ड नहीं होने के कारण जच्चा-बच्चा कार्ड नहीं बन पाया।

BMO बोले – जानकारी नहीं थी

मैनपुर बीएमओ गजेंद्र ध्रुव ने कहा कि यह मामला मीडिया के जरिए सामने आया है। विभाग को पहले कोई सूचना नहीं दी गई थी। अब पूरे मामले की जांच की जाएगी।

सरकारी योजनाओं से वंचित है भुंजिया परिवार

लगभग 2000 की आबादी वाले गांव में यह परिवार अकेला भुंजिया जनजाति से है। गांव क्लस्टर में शामिल नहीं होने के कारण विशेष पिछड़ी जनजाति योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा। पीएम आवास स्वीकृत हुआ है, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण मकान भी नहीं बन सका।

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