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: Navratri 2022: देवी मंदिरों का गढ़ है रायपुर का पुरानी बस्ती, सुबह से देर रात तक दर्शन करने उमड़ेंगे श्रद्धालु

News Desk / Sun, Sep 25, 2022

रायपुर। राजधानी का पुरानी बस्ती इलाका देवी मंदिरों का गढ़ है। केवल दो किलोमीटर की दूरी पर पांच प्रसिद्ध मंदिरों में हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए उमड़ते हैं। प्रत्येक मंदिर का इतिहास रोचक है, ये मंदिर 200 साल से लेकर पांच हजार वर्ष प्राचीन है।
शारदीय नवरात्र के पहले दिन सोमवार से मंदिरों में मनोकामना जोत का दर्शन करने सुबह से देर रात तक श्रद्धालुओं का तांता लगेगा। सुबह, दोपहर और शाम को भव्य महाआरती की जाएगी। कुशालपुर चौक स्थित दंतेश्वरी मंदिर पुरानी बस्ती के कुशालपुर चौक पर 200 साल पुराना मां दंतेश्वरी मंदिर का प्रसिद्ध मंदिर है। प्राय: ज्यादातर देवी मंदिरों में ब्राह्मण ही पूजा-अर्चना करते हैं, लेकिन इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहां यादव जाति के लोग पूजा करते हैं। कहा जाता है कि घनघोर जंगल में यादव समाज के लोग गाय चराने जाते थे। एक ग्वालिन गणेशिया बाई ने देखा कि एक पत्थर पर गाय खड़ी है और गाय के थन से दूध गिर रहा है। ग्वालिन ने अपने साथ गाय चराने आए अन्य लोगों को बताया। वह पत्थर देवी की प्रतिमा थाी। इसके पश्चात छोटा सा मंदिर बनवाकर प्रतिमा को प्रतिष्ठापित किया गया। तबसे, मंदिर में यादव जाति के लोग ही पूजा कर रहे हैं। कंकाली मंदिर पुरानी बस्ती से लगे ब्राह्मणपारा में नागा साधुओं ने लगभग 600 साल पहले कंकाली मठ की स्थापना की थी। मठ में देवी माता की प्रतिमा है। कहा जाता है कि यह इलाका श्मशानघाट था और कंकाल वाले इलाके के बीच प्रतिमा स्थापित होने से इसका नाम कंकाली पड़ गया। कालांतर में मठ की प्रतिमा को थोड़ी ही दूर मंदिर बनवाकर स्थानांतरित किया गया। यह मठ पूरे साल बंद रहता है, लेकिन साल में एक बार दशहरा के दिन खोलकर पूजा-अर्चना की जाती है। मठ में प्राचीन अस्त्र-शस्त्र रखे गए हैं। मंदिर के सामने तालाब है जहां घर-घर में बोए गए जंवारा जोत का विसर्जन किया जाता है। शीतला मंदिर पुरानी बस्ती के अमीनपारा थाना के समीप 250 साल पुराना शीतला माता मंदिर है। इस मंदिर में प्रतिमा का कोई आकार नहीं है, पत्थर रूपी पिंड की पूजा की जाती है। माता को ठंडा भोजन, मिठाई का भोग लगाया जाता है। मंदिर में बरसों से एक ही परिवार के द्वारा पूजा की जा रही है। कहा जाता है कि पत्थर रूपी पिंड जमीन से प्रकट हुआ, तबसे उसी रूप में पूजा की जाती है। महामाया देवी पुरानी बस्ती का सबसे प्रसिद्ध मंदिर मां महामाया देवी का है। इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यह मंदिर पांच हजार साल से अधिक पुराना है। मंदिरों का प्राचीन इतिहास संबंधित पुस्तक के अनुसार राजा मोरध्वज अपनी रानी कुमुददेवी के साथ भ्रमण करते हुए खारुन नदी तट पर पहुंचे। नदी में एक काले रंग का पत्थर था, जिस पर नाग फन काढ़े हुए थे। राजा ने पत्थर को नदी से निकलवा। पत्थर को नदी से निकालते ही आकाशवाणी हुई किराजन मुझे कंधे पर उठाकर ले चलो और नदी से दूर स्थापित करो। राजा ने प्रतिमा को कंधे पर उठाया और पुरानी बस्ती की ओर बढ़े। एक जगह राजा थक गए और मूर्ति को नीचे रख दिया। इसके बाद मूर्ति को हटाने की कोशिश की गई तो वह हिली तक नहीं। राजा ने वहीं पर मूर्ति को प्रतिष्ठापित करवाया। कालांतर में यह मंदिर महामाया देवी के रूप में प्रसिद्घ हुआ।
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