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US Supreme Court Trump Tariff Cancelled : सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प के टैरिफ रद्द किए, भारत पर लगा 18% टैरिफ भी अवैध घोषित
Fri, Feb 20, 2026
Trump Tariff Cancelled US Supreme Court:
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के ग्लोबल टैरिफ को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने दूसरे देशों पर लगाए गए टैरिफ को अवैध बताया है। भारत पर लगा 18% रेसिप्रोकल टैरिफ भी अब अवैध घोषित हो गया है।
Trump Tariff Cancelled US Supreme Court:
सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए कहा कि संविधान के तहत टैक्स और टैरिफ लगाने का अधिकार सिर्फ कांग्रेस (संसद) को है, राष्ट्रपति को नहीं।
Trump Tariff Cancelled US Supreme Court:
ट्रम्प ने टैरिफ पर सुनवाई को लेकर कहा था कि अगर केस हारे तो देश बर्बाद हो जाएगा। कोर्ट का यह फैसला ट्रम्प की आर्थिक नीतियों के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
दरअसल, अप्रैल 2025 में ट्रम्प ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए दुनिया के कई देशों से आने वाले सामान पर भारी टैरिफ यानी आयात शुल्क लगा दिए थे। टैरिफ का मतलब होता है कि किसी देश से आने वाले सामान पर ज्यादा टैक्स लगाया जाए, ताकि वह महंगा हो जाए और घरेलू कंपनियों को फायदा मिले।
फैसले से सभी टैरिफ खत्म नहीं होंगे
Trump Tariff Cancelled US Supreme Court:
कोर्ट के आदेश से ट्रम्प के सभी टैरिफ खत्म नहीं हुए हैं। स्टील और एल्युमिनियम पर लगाए गए टैरिफ अलग कानूनों के तहत लगाए गए थे, इसलिए वे अभी भी लागू रहेंगे।
हालांकि, दो बड़े कैटेगरी के टैरिफ पर रोक लग गई है। पहली कैटेगरी रेसिप्रोकल टैरिफ की है, जो ट्रम्प ने अलग-अलग देशों पर लगाए थे। इसमें चीन पर 34% और बाकी दुनिया के लिए 10% बेसलाइन टैरिफ तय किया गया था। कोर्ट के फैसले के बाद ये टैरिफ अमान्य हो गए हैं।
दूसरी कैटेगरी 25% टैरिफ की है, जो ट्रम्प ने कनाडा, चीन और मैक्सिको से आने वाले कुछ सामान पर लगाया था। ट्रम्प प्रशासन का कहना था कि इन देशों ने अमेरिका में फेंटेनाइल की तस्करी रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए। कोर्ट के फैसले ने इस 25% टैरिफ को भी निरस्त कर दिया है।
कोर्ट की ट्रम्प को फटकार, कहा- हर देश से युद्ध की स्थिति में नहीं
Trump Tariff Cancelled US Supreme Court:
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प प्रशासन को फटकारते हुए कहा कि अमेरिका दुनिया के हर देश के साथ युद्ध की स्थिति में नहीं है।
हालांकि फैसले को लेकर 3 जजों जस्टिस सैमुअल एलिटो, क्लेरेंस थॉमस और ब्रेट कैवनॉ ने असहमति जताई। कैवनॉ ने अपने नोट में लिखा कि टैरिफ नीति समझदारी भरी है या नहीं, यह अलग सवाल है, लेकिन उनके मुताबिक यह कानूनी तौर पर वैध थी।
अमेरिका ने टैरिफ से 200 अरब डॉलर वसूले, रिफंड पर सस्पेंस
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल की शुरुआत से अब तक ट्रम्प प्रशासन ने 200 अरब डॉलर से ज्यादा का टैरिफ वसूला है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब इस रकम के रिफंड को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।
फैसले के बाद यह साफ नहीं है कि सरकार को कंपनियों को वसूला गया पैसा लौटाना पड़ेगा या नहीं। ट्रम्प प्रशासन ने पहले कहा था कि अगर केस हार गए तो कई देशों के साथ हुए व्यापार समझौतों को वापस लेना पड़ सकता है और भारी रिफंड चुकाने पड़ सकते हैं।
Trump Tariff Cancelled US Supreme Court:
फैसले की आशंका को देखते हुए कई कंपनियों ने पहले ही वकील रख लिए थे। उन्होंने कोर्ट में मुकदमे दायर किए और टैरिफ के रूप में चुकाई गई रकम के रिफंड के लिए दावे भी दाखिल किए।
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अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार को इन कंपनियों को भुगतान करना पड़ेगा। फिलहाल इस पर स्थिति साफ नहीं है।
ट्रम्प ने 49 साल पुराने कानून का इस्तेमाल किया था
ट्रम्प के टैरिफ विवाद के केंद्र में एक कानून है, जिसका नाम इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) है। यह कानून 1977 में बनाया गया था।
इसका मकसद यह था कि अगर देश पर कोई गंभीर खतरा जैसे युद्ध जैसी स्थिति, विदेशी दुश्मन से बड़ा आर्थिक खतरा या असाधारण अंतरराष्ट्रीय संकट आए तो राष्ट्रपति को कुछ खास शक्तियां दी जा सकें।
इन शक्तियों के तहत राष्ट्रपति विदेशी लेन-देन पर रोक लगा सकता है, उन्हें नियंत्रित कर सकता है या कुछ आर्थिक फैसले तुरंत लागू कर सकता है। ट्रम्प ने टैरिफ लगाने के लिए IEEPA का ही सहारा लिया था।
ट्रम्प ने व्यापार घाटे को इमरजेंसी बताकर टैरिफ लगाया था
पिछले साल नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प सरकार के टैरिफ लगाने के कानूनी आधार पर सवाल उठाए थे। उस दौरान जजों ने पूछा था कि क्या राष्ट्रपति को इस तरह के ग्लोबल टैरिफ लगाने का अधिकार है। कोर्ट ने इस मामले में लंबी सुनवाई की।
कोर्ट ने कहा कि ट्रम्प 150 दिनों तक 15% टैरिफ लगा सकते हैं, लेकिन इसके लिए ठोस कारण चाहिए। फैसले में कहा गया कि IEEPA में ‘टैरिफ’ शब्द का कहीं जिक्र नहीं है और न ही इसमें राष्ट्रपति के अधिकारों पर कोई स्पष्ट सीमा तय की गई है।
ट्रम्प के खिलाफ 12 राज्यों का मुकदमा
ट्रम्प ने पिछले साल अप्रैल इन टैरिफ के ऐलान किए थे। इन टैरिफ के खिलाफ अमेरिका के कई छोटे कारोबारी और 12 राज्यों ने मुकदमा दायर किया था। उनका कहना था कि राष्ट्रपति ने अपनी सीमा से बाहर जाकर आयात होने वाले सामान पर नए टैरिफ लगाए।
एरिजोना, कोलोराडो, कनेक्टिकट, डेलावेयर, इलिनॉय, मेन, मिनेसोटा, नेवादा, न्यू मेक्सिको, न्यूयॉर्क, ओरेगन और वर्मोंट राज्यों ने छोटे कारोबारियों के साथ मिलकर ट्रम्प सरकार के खिलाफ यह केस किया था।
निचली अदालतों ने टैरिफ को गैरकानूनी करार दिया था
निचली अदालतों (कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड और फेडरल सर्किट कोर्ट) ने टैरिफ को गैरकानूनी करार दिया था। उनका मानना है कि IEEPA टैरिफ लगाने की इतनी व्यापक शक्ति नहीं देता।
सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में मौखिक बहस सुनी, जहां जजों ने ट्रम्प की ओर से पेश किए गए दलीलों पर संदेह जताया। कोर्ट के 6-3 बहुमत के बावजूद, जस्टिस ने पूछा कि क्या राष्ट्रपति कांग्रेस की मंजूरी के बिना इतने बड़े पैमाने पर टैरिफ लगा सकता है, क्योंकि टैरिफ टैक्स का रूप हैं और यह संसद की जिम्मेदारी हैं।
क्या Sonam Wangchuk केस में फंस गई सरकार ? : सुप्रीम कोर्ट बोला- भाषणों में हिंसा उकसावा कहां है, जानिए क्या बोली सरकार ?
Wed, Feb 11, 2026
Sonam Wangchuk Release Update; NSA Custody Health | Supreme Court:
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सोनम वांगचुक की NSA के तहत हिरासत पर सुनवाई की। कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि क्या उनके भाषण और सोशल मीडिया पोस्ट सच में भड़काऊ थे। अदालत ने यह भी सवाल किया कि इन बयानों का 24 सितंबर 2025 को लेह में हुई हिंसा से सीधा संबंध कैसे जुड़ता है।
केंद्र की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) केएम नटराज ने कहा कि वांगचुक के भाषणों से युवा भड़के और हिंसा हुई। उन्होंने दावा किया कि वांगचुक ने नेपाल जैसे हालात बनने की चेतावनी देकर लोगों को उकसाया।
Sonam Wangchuk Release Update; NSA Custody Health | Supreme Court:
इस पर कोर्ट ने पूछा कि भाषण में ऐसा कहां है। वह तो कह रहे हैं कि कुछ युवाओं ने यह रास्ता अपना लिया है और वह खुद हैरान हैं। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने कहा कि भाषण पढ़ने से लगता है वांगचुक हिंसा का समर्थन नहीं कर रहे, बल्कि उसे लेकर चिंता जता रहे हैं।
सरकार ने 2 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि सोनम वांगचुक लद्दाख को नेपाल या बांग्लादेश जैसा बनाना चाहते हैं। 24 सितंबर 2025 को लेह में हुई हिंसा भड़काने के आरोप में 26 सितंबर को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत 26 वांगचुक को पुलिस ने हिरासत में लिया था। तब से वे जोधपुर जेल में हैं।
सरकार बोली-वांगचुक को मेडिकल आधार पर रिहा नहीं कर सकते
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वांगचुक को फिलहाल रिहा नहीं किया जा सकता। बेंच ने सरकार से वांगचुक को मेडिकल आधार पर रिहा करने के बारे में पूछा था। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि वांगचुक की जेल नियमावली के तहत अब तक करीब 24 बार मेडिकल जांच हो चुकी है।
उन्होंने कहा कि वांगचुक पूरी तरह फिट हैं। उन्हें केवल डाइजेशन (पाचन) की समस्या और संक्रमण हुआ था, जिसका इलाज किया गया है। मेहता ने कहा कि इस तरह की समस्या को अपवाद मानकर उन्हें रिहा किया गया तो आगे अन्य लोग भी इस तरह की मांग करेंगे।
कोर्ट रूम लाइव-
ASG नटराज-
कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक व्यवस्था अलग हैं। फर्क इस बात से पड़ता है कि किसी बयान का समाज पर कितना असर होता है। भले ही सीधे हिंसा न हुई हो, लेकिन सवाल यह है कि भाषणों में व्यवस्था बिगाड़ने की कितनी क्षमता थी। उनका तर्क था कि मकसद सजा नहीं, रोकथाम है।
बेंच-
वांगचुक के भाषण और 24 सितंबर की हिंसा के बीच सीधा संबंध क्या है, जिसमें आगजनी और मौतें हुईं। कोर्ट ने भाषणों के हिस्सों को ध्यान से पढ़ा। ASG ने कहा कि नेपाल, अरब स्प्रिंग और आत्मदाह जैसे संदर्भ उकसावे जैसे हैं।
जस्टिस अरविंद कुमार-
वांगचुक युवाओं के हिंसा की ओर जाने पर चिंता जता रहे थे। आप इसका बहुत ज्यादा अर्थ निकाल रहे हैं।
जस्टिस वराले-
पूरा बयान गांधीवादी सोच से हटने पर चिंता दिखाता है।
बेंच-
पुराने बयानों को 24 सितंबर की घटना से कैसे जोड़ा जा सकता है।
ASG नटराज-
हर आधार अलग है और अकेले भी डिटेंशन सही ठहरा सकता है। वांगचुक ने मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय बनाने और जनमत संग्रह की बात की। सीमा क्षेत्र में ऐसे बयान से गड़बड़ी का खतरा है। जिला मजिस्ट्रेट हालात समझने के लिए सबसे सही अधिकारी हैं और सभी कानूनी प्रक्रिया पूरी की गई है।
बेंच ने फिर पूछा-
इसे 24 तारीख की रात से कैसे जोड़ते हैं?
SG तुषार मेहता-
वांगचुक की तुलना गांधीजी से न की जाए। गांधीजी का नाम गलत संदर्भ में न आए और स्वास्थ्य का मुद्दा सोशल मीडिया दिखावा है।
बेंच-
गांधी का जिक्र सिर्फ संदर्भ के लिए था, तुलना के लिए नहीं।