चीन की मकड़ी गरियाबंद तक कैसे पहुंची? : मकड़ी के शरीर पर काली धारियां, भारत में पहली बार रिकॉर्ड दर्ज; पहचान में लगे 30 दिन
गिरीश जगत, गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद के जंगलों में चीन में दर्ज हो चुकी दुर्लभ मकड़ी Mangora baii मिली है। स्थानीय शोधकर्ताओं ने इसे भारत में पहली बार दर्ज किया है। गरियाबंद मुख्यालय से करीब 5 किलोमीटर दूर गरियाबंद-देवभोग मार्ग के पास मिली इस मकड़ी की पहचान करने में टीम को करीब एक महीना लगा। शोधकर्ताओं ने इसकी तस्वीरों और शारीरिक बनावट का मिलान चीन में 2021 में प्रकाशित शोध से किया। इसके बाद इस खोज पर शोधपत्र Indian Journal of Natural Sciences में प्रकाशित हुआ।
यह खोज छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों में मौजूद जैव-विविधता के लिहाज से अहम मानी जा रही है। वैज्ञानिक रिकॉर्ड के मुताबिक, इस प्रजाति का मूल विवरण 2021 में चीन के शोधकर्ताओं ने प्रकाशित किया था। गरियाबंद में इसका मिलना भारत में इसके वितरण का नया रिकॉर्ड है। यानी यह दुनिया में पहली बार खोजी गई मकड़ी नहीं, बल्कि भारत में पहली बार दर्ज की गई प्रजाति है।

एक महीने तक तस्वीरों और बनावट का मिलान किया
शोध दल के सदस्य हितेश कुमार वारते के मुताबिक, गरियाबंद वन क्षेत्र में मकड़ियों की जैव-विविधता पर अध्ययन के दौरान यह मकड़ी मिली थी। शुरुआत में इसकी पहचान आसान नहीं थी। टीम ने इसकी तस्वीरें और शारीरिक बनावट दर्ज कीं, फिर उपलब्ध वैज्ञानिक शोधों में मिलती-जुलती प्रजातियों को खोजना शुरू किया।
करीब एक महीने की पड़ताल के बाद शोधकर्ताओं को चीन में 2021 में प्रकाशित एक अध्ययन में इसकी मिलती-जुलती तस्वीरें और विवरण मिले। दोनों का मिलान करने के बाद इसकी पहचान Mangora baii Mi & Li, 2021 के रूप में की गई।
शोधकर्ताओं ने इसके बाद प्रजाति के भारत में मिलने से जुड़े रिकॉर्ड और वितरण संबंधी जानकारी को शोधपत्र के रूप में प्रकाशित किया। वर्ल्ड स्पाइडर कैटलॉग में भी 2026 के इस शोध का उल्लेख है और प्रजाति के वितरण में चीन के साथ भारत को शामिल किया गया है।

शरीर पर काली धारियां बनीं पहचान का आधार
इस मकड़ी की पहचान में उसकी शारीरिक बनावट अहम रही। शोधकर्ताओं ने इसके अंडाकार उदर पर बनी चौड़ी, आड़ी काली धारियों, काले सेफलोथोरैक्स यानी सिर और धड़ के जुड़े हिस्से, पैरों की बनावट और उदर के निचले भाग पर मौजूद लंबी रेखा का बारीकी से अध्ययन किया।
सिर्फ तस्वीर देखकर प्रजाति तय करने के बजाय टीम ने इन विशेषताओं का वैज्ञानिक विवरण से मिलान किया। इसके बाद ही इसकी पहचान की पुष्टि की गई। शोध में दर्ज यह पहचान भारत में मकड़ियों के भौगोलिक वितरण से जुड़ी जानकारी को बढ़ाती है।

तीन शोधकर्ताओं की टीम ने किया अध्ययन
इस शोध में डॉ. अविनाश आर. निचत, डॉ. के. के. हैरिस, जसवंत नायक और हितेश कुमार वारते शामिल हैं।
डॉ. अविनाश आर. निचत एम. वी. वी. शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भखारा, धमतरी से जुड़े हैं। डॉ. के. के. हैरिस और जसवंत नायक शासकीय दूधाधारी बजरंग गर्ल्स पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज, रायपुर से जुड़े हैं। हितेश कुमार वारते श्री रावतपुरा सरकार विश्वविद्यालय, रायपुर में शोधार्थी हैं।
टीम ने गरियाबंद में मिली मकड़ी के रिकॉर्ड और उसकी पहचान से संबंधित अध्ययन को शोधपत्र के रूप में प्रकाशित किया। Indian Journal of Natural Sciences में प्रकाशित इस अध्ययन का शीर्षक है— First record and new distribution of a Chinese orb weaver spider species Mangora baii Mi and Li, 2021 (Araneae: Araneidae) in India।

गरियाबंद की जैव-विविधता के लिए क्यों अहम है खोज?
गरियाबंद में Mangora baii का मिलना बताता है कि छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों में मकड़ियों की विविधता और उनके भौगोलिक वितरण को लेकर अभी और वैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत है। किसी प्रजाति का पहले एक देश में दर्ज होना और बाद में दूसरे देश में मिलना उसके वितरण की जानकारी को विस्तृत करता है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, राज्य के अलग-अलग वन क्षेत्रों में लगातार सर्वेक्षण किए जाने से दूसरी प्रजातियों के बारे में भी नए तथ्य सामने आ सकते हैं। यह जानकारी जैव-विविधता के दस्तावेजीकरण और वन्यजीवों के वैज्ञानिक अध्ययन में उपयोगी हो सकती है।
गरियाबंद की यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे भारत में Mangora baii की मौजूदगी का वैज्ञानिक रिकॉर्ड सामने आया है। यह छत्तीसगढ़ के जंगलों में मौजूद जैव-विविधता को समझने की दिशा में एक अहम योगदान है।
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