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मैं बीमार हूं, मुझे इलाज चाहिए कहता रहा छात्र : गरियाबंद में क्या सिस्टम ने छीनी सांसें, पिता बोले-इकलौता बेटा था, इलाज मिलता तो बच जाता, अब सब कुछ खत्म

MP CG Times / Sat, Jan 31, 2026

गिरीश जगत, गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के शासकीय आदिवासी बालक आश्रम बड़ेगोबरा से संचालित भाठीगढ़ स्थित आश्रम में एक आदिवासी छात्र की इलाज में कथित लापरवाही के कारण मौत हो जाने से इलाके में हड़कंप मच गया है।

बीमार छात्र को समय पर इलाज नहीं मिलने का आरोप आश्रम प्रबंधन पर लगाया गया है। घटना के बाद जहां एक ओर संबंधित विभाग के अधिकारियों में खलबली मची हुई है, वहीं दूसरी ओर माता-पिता अपने इकलौते बेटे की मौत से गहरे सदमे में हैं।

मामले को लेकर क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों और आदिवासी संगठनों ने तीखी नाराजगी जताते हुए निष्पक्ष जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है। साथ ही आरोप लगाए जा रहे हैं कि आश्रम अधीक्षक और संबंधित विभाग मामले को दबाने के लिए कागजी कार्रवाई का सहारा ले रहे हैं और परिजनों पर बयान न देने का दबाव बनाया जा रहा है।

इकलौते बेटे की मौत से उजड़ा परिवार

मिली जानकारी के अनुसार, ग्राम गजकन्हार, विकासखंड नगरी निवासी आदिवासी छात्र राघव कुमार मंडावी (जाति गोड़) ने शैक्षणिक सत्र 2023-24 में शासकीय आदिवासी बालक आश्रम बड़ेगोबरा में कक्षा छठवीं में प्रवेश लिया था। वर्तमान सत्र में वह कक्षा सातवीं का छात्र था। राघव पढ़ाई में होनहार था और अपने माता-पिता का एकमात्र संतान था।

राघव के नाना ग्राम पथर्री (मैनपुर से करीब 8 किलोमीटर दूर) में निवास करते हैं। बेहतर शिक्षा और सुरक्षित भविष्य की उम्मीद में परिवार ने राघव को भाठीगढ़ स्थित आवासीय आदिवासी बालक आश्रम में दाखिला दिलवाया था, ताकि वह पढ़-लिखकर परिवार का सहारा बन सके। लेकिन किसे पता था कि यह फैसला उनके जीवन का सबसे बड़ा दर्द बन जाएगा।

कई दिनों से बीमार था छात्र, गुहार लगाता रहा

परिजनों के अनुसार, छात्र राघव मंडावी पिछले 20 जनवरी से ही अपनी तबीयत खराब होने की शिकायत आश्रम के कर्मचारियों और साथियों से करता रहा। उसने कई बार मोबाइल पर अपने माता-पिता से बात कराने और घर में बीमारी की जानकारी देने की गुहार लगाई, लेकिन आश्रम कर्मचारियों ने उसकी बातों को नजरअंदाज कर दिया।

26 जनवरी, गणतंत्र दिवस के दिन छात्र के पिता फिरतु राम मंडावी अपने बेटे से मिलने आश्रम पहुंचे। वहां का दृश्य देखकर उनके होश उड़ गए। उन्होंने अपने बेटे को बेहद कमजोर हालत में आश्रम के बिस्तर पर पड़ा पाया।

पिता के पूछने पर राघव ने सबके सामने बताया कि वह कई दिनों से बीमार है और आश्रम अधीक्षक व कर्मचारियों को बार-बार जानकारी देने के बावजूद कोई इलाज नहीं कराया गया।

26 जनवरी को घर ले गए पिता, इलाज के दौरान मौत

बेटे की हालत देखकर पिता ने उसी दिन छुट्टी के लिए आवेदन दिया और दोपहर में राघव को इलाज के लिए घर ले गए। घर में प्राथमिक इलाज के बाद भी हालत में सुधार नहीं हुआ, तो उसे धमतरी के बठेना अस्पताल ले जाया गया। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद शुक्रवार सुबह करीब 4 बजे राघव की मौत हो गई।

पिता का दर्द: समय पर इलाज होता तो बच जाता बेटा

मृतक छात्र के पिता फिरतु राम मंडावी ने रोते हुए बताया कि उनका बेटा उनका इकलौता सहारा था। उन्होंने कहा, “मैंने अपने बच्चे को पढ़ने के लिए आदिवासी आश्रम भेजा था। अगर समय रहते आश्रम अधीक्षक और कर्मचारियों ने उसका इलाज कराया होता, तो आज मेरा बेटा जिंदा होता। लापरवाही ने मेरे बच्चे की जान ले ली।”

जनप्रतिनिधियों का आरोप: कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन

इस मामले को लेकर क्षेत्र के आदिवासी नेता और जनपद सदस्य सुकचंद ध्रुव ने आश्रम प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि आश्रम अधीक्षक और कर्मचारियों की लापरवाही के चलते कक्षा सातवीं के छात्र राघव की मौत हुई है।

सुकचंद ध्रुव ने बताया कि वह स्वयं परिजनों के साथ राघव को इलाज के लिए धमतरी ले गए थे, लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर तत्काल कार्रवाई नहीं की गई, तो वे आंदोलन करने को मजबूर होंगे।

आश्रम अधीक्षक की सफाई

मामले में आश्रम अधीक्षक राकेश साहू ने सफाई देते हुए कहा कि 17 जनवरी को चिरायु दल की टीम द्वारा सभी बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण किया गया था और उस समय छात्र की तबीयत सामान्य थी। उन्होंने कहा कि 26 जनवरी को छात्र के पिता उसे इलाज के लिए अपने घर ले गए थे।

सहायक आयुक्त बोले – जानकारी लेकर करेंगे कार्रवाई

आदिवासी विकास विभाग के सहायक आयुक्त लोकेश्वर पटेल ने कहा कि उन्हें इस मामले की जानकारी शुक्रवार को मिली है। उन्होंने बताया कि पूरे मामले की जानकारी लेने के बाद ही आगे की कार्रवाई को लेकर कुछ कहा जा सकेगा।

बदहाल सिस्टम पर फिर खड़े हुए सवाल

आदिवासी बालक आश्रम में छात्र की मौत ने एक बार फिर सरकारी व्यवस्था और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि क्या इस घटना के बाद शासन-प्रशासन जागेगा और आश्रमों की व्यवस्था में सुधार करेगा, या फिर हर बार की तरह यह मामला भी कागजी कार्रवाई में दबा दिया जाएगा।

बताया जा रहा है कि घटना सामने आने के बाद आश्रम प्रबंधन द्वारा मामले को दबाने की कोशिशें शुरू कर दी गई हैं और मृतक छात्र के परिजनों पर तरह-तरह का दबाव बनाया जा रहा है।

यह भी चर्चा में है कि आश्रम अधीक्षक खुद को एक बड़े राजनीतिक नेता का करीबी बताते हैं, जिससे आशंका जताई जा रही है कि कहीं यह मामला ठंडे बस्ते में न डाल दिया जाए। फिलहाल पूरे क्षेत्र की नजरें प्रशासन की जांच और आगे होने वाली कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।

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