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अमरकंटक में 60 हजार साल के पेड़ों पर संकट : साल बोरर कीट के प्रकोप के बाद 9,535 संक्रमित पेड़ों की कटाई शुरू; जानिए कहां भेजी जाएगी लकड़ियां
Wed, Oct 28, 2026
मध्य प्रदेश की जीवनदायिनी नर्मदा नदी के उद्गम स्थल अमरकंटक के घने जंगलों पर बड़ा पर्यावरण और प्राकृतिक संकट मंडरा रहा है। अमरकंटक के 8,584 हेक्टेयर वन क्षेत्र में फैले लगभग 40 लाख साल (Sal) के वृक्षों में से करीब 60 हजार पेड़ 'साल बोरर' (Sal Borer) कीट के गंभीर संक्रमण की चपेट में आ चुके हैं।
संक्रमण की चेन को तोड़ने के लिए केंद्र सरकार से 9,535 बेहद संक्रमित पेड़ों को काटने की मंजूरी मिल गई है। वन विभाग ने अमरकंटक बीट, कपिलधारा और सोनमुड़ा क्षेत्रों में 15 अक्टूबर से पेड़ों की कटाई शुरू कर दी है, जिसे जनवरी 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
अमरकंटक में नहीं बने डिपो, शहडोल के नरसरा भेजे जा रहे लट्ठे
अमरकंटक साल के वृक्षों का बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। कटाई के बाद अगर संक्रमित लकड़ियों को अमरकंटक या आसपास के जंगलों में रखा गया, तो कीट उड़कर स्वस्थ पेड़ों तक पहुंच सकते हैं और संक्रमण तेजी से फैल सकता है।
नरसरा डिपो में भंडारण: इसी खतरे को टालने के लिए वन विभाग ने अमरकंटक में लकड़ी डिपो न बनाकर, काटी गई लकड़ियों की छिलाई और कटिंग कराकर उन्हें सीधे शहडोल जिले के 'नरसरा वन डिपो' भेजने का फैसला किया है।
कपिलधारा, सोनमुड़ा और अमरकंटक बीट में अब तक करीब 400 संक्रमित पेड़ों को काटकर हटा लिया गया है।
17 कक्षों में फैला संकट, डिंडोरी में भी 1.46 लाख पेड़ कटेंगे
अनूपपुर के वन मंडलाधिकारी (DFO) डेविड चनाप ने बताया कि अमरकंटक के 8,584 हेक्टेयर वन क्षेत्र के 17 कक्षों में यह संक्रमण फैला हुआ है।
इससे पहले वन विभाग की 16 विशेष समितियों ने 'ट्रैप ट्री पद्धति' के माध्यम से 40,200 साल बोरर कीटों को पकड़कर नष्ट किया था।
अमरकंटक में 9,535 और पड़ोसी जिले डिंडोरी में 1.46 लाख संक्रमित पेड़ों की कटाई को केंद्र सरकार से मंजूरी मिली है।
पेड़ों को संक्रमण के आधार पर 6 श्रेणियों में बांटा गया है। जबलपुर स्थित राज्य वन अनुसंधान संस्थान (SFRI) की वैज्ञानिक टीम के मार्गदर्शन में यह अभियान चलाया जा रहा है।
तने में घुसकर लकड़ी को खोखला कर देता है यह खतरनाक कीट
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय (IGNTU), अमरकंटक के सहायक प्राध्यापक डॉ. शिवाजी चौधरी के अनुसार, यह कीट जंगल के लिए बेहद विनाशकारी है:
कीट का जीवन चक्र (Life Cycle)
मादा साल बोरर एक बार में 250 से 300 अंडे देती है। 3 से 7 दिनों में निकले लार्वा तने के भीतर घुसकर लकड़ी को खोखला कर देते हैं। पेड़ से निकलने वाला राल (गोंद) इन्हें और आकर्षित करता है। दिसंबर से अप्रैल तक ये प्यूपा अवस्था में रहते हैं और मानसून आते ही नए वयस्क बनकर बाहर निकलते हैं।
1923 और 1995 की भीषण तबाही का दोहराव रोकने की कोशिश
इतिहास गवाह है कि साल बोरर का हमला अमरकंटक और आसपास के इलाकों में भयावह तबाही मचा चुका है।
1923-24 में:
डिंडोरी-अमरकंटक क्षेत्र में करीब 70 लाख साल के वृक्ष इस कीट के प्रकोप से नष्ट हो गए थे।
1995-96 में:
अमरकंटक में दोबारा बड़ा हमला हुआ था, तब भी हजारों पेड़ काटकर हटाने पड़े थे।
पुराने कड़वे अनुभवों को देखते हुए वन विभाग इस बार मानसून आने से पहले ही प्यूपा और वयस्क कीटों को नष्ट करने तथा संक्रमित पेड़ों को जंगल से बाहर निकालने का अभियान युद्ध स्तर पर चला रहा है।