अमरकंटक बाबा मर्डर केस, Amarkantak Baba Murder Case, अमरकंटक संत हत्याकांड, बाबा की हत्या, गुरु चेले में विवाद, महिला को लेकर विवाद, संत की गला घोंटकर हत्या, अनूपपुर क्राइम न्यूज, मध्य प्रदेश क्राइम फाइल्स, जंगल के आश्रम में हत्या, बाबा मर्डर मिस्ट्री, MP Crime News
अमरकंटक के बाबा का कातिल आखिर कौन था? : गुरु-चेले में किस महिला को लेकर झगड़ा हुआ, जंगल के आश्रम में क्या हुआ था; किसने घोंटा गला?
Tue, Oct 20, 2026
विंध्य और सतपुड़ा की पर्वत श्रृंखलाओं के बीच बसा अमरकंटक... एक ऐसी जगह, जिसे लोग साधु-संतों की तपस्थली के रूप में जानते हैं। चारों तरफ घने जंगल, सुनसान रास्ते और उन रास्तों के बीच बने छोटे-छोटे आश्रम। आमतौर पर यहां शांति और साधना की कहानियां सुनने को मिलती हैं। लेकिन इसी अमरकंटक में एक दिन ऐसी घटना हुई, जिसने संत समाज से लेकर पुलिस प्रशासन तक को हिलाकर रख दिया।
जंगल के बीच बने एक आश्रम में रहने वाले संत की मौत हो गई थी। पहली नजर में मामला सामान्य मौत का लग रहा था। लेकिन जब पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट सामने आई, तो पूरी कहानी पलट गई। जिस मौत को शुरुआत में स्वाभाविक माना जा रहा था, वह दरअसल हत्या निकली।
संत की मौत से नाराज लोग सड़कों पर उतर आए। पुलिस पर हत्यारे को जल्द गिरफ्तार करने का दबाव बढ़ने लगा। जांच शुरू हुई, तो एक महिला, दो साधुओं के बीच विवाद और गायब मोबाइल फोन जैसी बातें सामने आईं। जिस साधु का नाम इस मामले में सामने आया, वह भी अचानक लापता हो गया था।
आखिर उस दिन आश्रम में ऐसा क्या हुआ था? महिला को देखकर बाबा इतने नाराज क्यों हुए थे? और क्या यही विवाद उनकी मौत की वजह बना?
इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए चलिए, चलते हैं मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में। आज की क्राइम फाइल्स में कहानी है एक ऐसे संत की, जिनकी जिंदगी तपस्या में बीती, लेकिन मौत अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई।
जंगल के बीच था शिवाबाबा आश्रम
अनूपपुर जिले के गढ़ीदादर गांव के जंगल में घने पेड़ों और सुनसान रास्तों के बीच एक आश्रम था—शिवाबाबा आश्रम। यहां जूना अखाड़े के संत अलबेले भोलागिरी महाराज रहते थे। इलाके के लोग उन्हें खड़ेश्वरी महाराज के नाम से जानते थे।
कहा जाता है कि भोलागिरी महाराज ने लगातार 12 साल तक एक पैर पर खड़े रहकर तपस्या की थी। करीब चार साल से वे गढ़ीदादर गांव में रह रहे थे और पूजा-पाठ में अपना समय बिताते थे।
आश्रम जंगल के बीच था। आसपास सन्नाटा पसरा रहता था और वहां तक पहुंचने वाले रास्तों पर भी लोगों की आवाजाही ज्यादा नहीं थी। बाबा अपनी इसी कुटिया में रहते थे।
लेकिन 7 अगस्त की सुबह से शुरू हुई घटनाओं ने इस शांत आश्रम को एक ऐसे रहस्य में बदल दिया, जिसका जवाब पुलिस को भी तलाशना था।
7 अगस्त की सुबह... दरवाजा आधा खुला था
7 अगस्त की सुबह सम्हर सिंह रोज की तरह जंगल की तरफ निकला था। उसका मकसद सूखी लकड़ियां और खाने लायक जंगली मशरूम तलाशना था।
इसी दौरान वह शिवाबाबा आश्रम पहुंचा।
आश्रम का दरवाजा आधा खुला हुआ था। सम्हर सिंह ने बाहर से आवाज लगाई।
'बाबा... ओ बाबा!'
लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आया।
उसने सोचा कि शायद बाबा आराम कर रहे होंगे या ध्यान में बैठे होंगे। वह कुटिया के भीतर गया, तो देखा कि बाबा अपने स्थान पर लेटे हुए हैं। उनके शरीर के ऊपर कपड़ा ढका हुआ था।
सम्हर सिंह ने उस वक्त किसी अनहोनी की आशंका नहीं जताई। उसे लगा कि बाबा आराम कर रहे हैं। वह वहां से चला गया।
लेकिन अगले दिन जब वह फिर आश्रम पहुंचा, तो जो कुछ उसने देखा, उससे उसके होश उड़ गए।
8 अगस्त को फिर पहुंचा... बाबा उसी हालत में थे
8 अगस्त को सम्हर सिंह दोबारा शिवाबाबा आश्रम पहुंचा।
अंदर का नजारा बदला नहीं था। बाबा अब भी उसी तरह लेटे हुए थे। उनके ऊपर कपड़ा ढका था। एक दिन पहले भी वे इसी हालत में थे।
इस बार सम्हर सिंह को कुछ गड़बड़ लगी।
वह बाबा के पास पहुंचा और उनके ऊपर से कपड़ा हटाया। शरीर ठंडा पड़ चुका था और अकड़ गया था। बाबा की सांसें थम चुकी थीं।
आश्रम में रहने वाले संत की मौत हो चुकी थी।
सम्हर सिंह गांव पहुंचा और सरपंच को पूरी बात बताई। इसके बाद पुलिस को सूचना दी गई। खबर फैलते ही आसपास के इलाकों में हलचल मच गई।
पुलिस मौके पर पहुंची और जांच शुरू की। पहली नजर में मामला सामान्य मौत का लग रहा था। लेकिन घटनास्थल पर एक ऐसी बात भी थी, जिसने बाद में जांच को और पेचीदा बना दिया।
बाबा का मोबाइल फोन आश्रम से गायब था।
आखिर बाबा का मोबाइल कहां गया? क्या वह कहीं रखकर भूल गए थे, या कोई उसे अपने साथ ले गया था? उस वक्त इन सवालों के जवाब किसी के पास नहीं थे।
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने खोला मौत का राज
पुलिस ने शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा। जांच रिपोर्ट का इंतजार था, क्योंकि उसी से यह साफ होना था कि बाबा की मौत कैसे हुई।
फिर पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट सामने आई।
रिपोर्ट में बाबा की गर्दन पर अंदरूनी और बाहरी चोटों के निशान मिले। उनकी मौत गला घोंटने से हुई थी।
यानी यह कोई सामान्य मौत नहीं थी। बाबा की हत्या की गई थी।
अब पुलिस के सामने मामला साफ था, लेकिन हत्यारे तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं था। जंगल के बीच बने आश्रम में बाबा अकेले रहते थे। वहां तक पहुंचने वाले रास्ते सुनसान थे। ऐसे में सवाल था कि आखिर कौन आश्रम तक पहुंचा, जिसने बाबा की हत्या कर दी?
शुरुआती जांच में पुलिस को कोई ठोस सुराग नहीं मिला।
उधर, बाबा की हत्या की खबर अमरकंटक और राजेंद्रग्राम तक पहुंच चुकी थी। लोगों में गुस्सा बढ़ रहा था। संत समाज हत्या के खुलासे और आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग करने लगा।
संतों का गुस्सा सड़कों पर उतरा
बाबा की हत्या से नाराज संतों और स्थानीय लोगों ने आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर राजेंद्रग्राम-अमरकंटक मुख्य मार्ग पर धरना दिया। प्रदर्शन के कारण सड़क पर आवागमन प्रभावित हुआ।
बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने भी रैली निकाली। इस दौरान पुलिस प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की गई।
प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि मामले की जांच सीबीआई या सीआईडी से कराई जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर जल्द खुलासा नहीं हुआ, तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।
पुलिस पर अब दोहरा दबाव था। एक तरफ हत्या की गुत्थी सुलझानी थी, दूसरी तरफ लोगों को यह भरोसा दिलाना था कि आरोपी जल्द पकड़े जाएंगे।
इसी बीच पुलिस ने बाबा के पुराने जीवन और आश्रम में आने-जाने वालों के बारे में जानकारी जुटानी शुरू की। पूछताछ में कुछ ऐसी बातें सामने आईं, जिनसे इस कहानी की दिशा बदलने लगी।
गणेश मंदिर छोड़कर जंगल में क्यों आ गए थे बाबा?
जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि शिवाबाबा आश्रम में रहने से पहले अलबेले भोलागिरी महाराज धरहरकला के प्रसिद्ध गणेश मंदिर में पूजा-पाठ करते थे।
ग्रामीणों के मुताबिक, उस मंदिर में उनके चेलों और बाहरी लोगों की आवाजाही बढ़ने लगी थी। कुछ लोगों ने इन गतिविधियों पर आपत्ति जताई थी।
इसके बाद बाबा ने मंदिर छोड़ दिया और जंगल में अपना अलग आश्रम बना लिया।
हालांकि, जंगल में आने के बाद भी बाबा से मिलने वालों का सिलसिला बंद नहीं हुआ था। लोग आश्रम आते थे। वहां बैठकर चर्चा होती थी और बाबा से मुलाकातें होती थीं।
इन्हीं लोगों में एक नाम साधु नरेंद्र गिरि का भी था।
नरेंद्र गिरि अक्सर आश्रम आता था और भोलागिरी महाराज को अपना गुरु मानता था। दोनों के बीच पहले से परिचय था। इसलिए उसका आश्रम आना-जाना असामान्य नहीं माना जाता था।
लेकिन हत्या से ठीक एक दिन पहले हुई एक मुलाकात ने नरेंद्र गिरि को पुलिस की जांच के केंद्र में ला खड़ा किया।
एक महिला आई... और बाबा नाराज हो गए
अब कहानी पहुंचती है 6 अगस्त की उस घटना पर, जो बाद में पुलिस के लिए अहम कड़ी बन गई।
सम्हर सिंह ने पुलिस को बताया कि घटना से एक दिन पहले वह शिवाबाबा आश्रम में बर्तन साफ कर रहा था। उसी दौरान साधु नरेंद्र गिरि एक अनजान महिला को लेकर वहां पहुंचा।
आश्रम में नरेंद्र गिरि के साथ एक महिला को देखकर भोलागिरी महाराज नाराज हो गए।
उन्होंने आश्रम की मर्यादा और नियमों का हवाला देते हुए नरेंद्र गिरि पर आपत्ति जताई। वहां मौजूद सम्हर सिंह के मुताबिक, इस बात को लेकर दोनों के बीच विवाद हुआ।
माहौल बिगड़ता देख सम्हर सिंह बर्तन वहीं छोड़कर अपने घर चला गया।
इसके बाद आश्रम में क्या हुआ, इसकी जानकारी उसे नहीं थी।
यही वह बिंदु था, जहां से पुलिस की जांच में कई सवाल खड़े होने लगे।
एक तरफ बाबा की हत्या हो चुकी थी। दूसरी तरफ, मौत से एक दिन पहले उनके आश्रम में एक महिला आई थी। उसे लेकर बाबा और नरेंद्र गिरि के बीच विवाद भी हुआ था।
क्या दोनों घटनाओं के बीच कोई संबंध था?
क्या महिला को आश्रम लाने की वजह से बाबा और नरेंद्र गिरि के बीच दुश्मनी पैदा हुई थी? या फिर विवाद की वजह कुछ और थी?
फिलहाल, सिर्फ इस विवाद के आधार पर हत्या का कारण तय नहीं किया जा सकता था। पुलिस को ऐसे सबूत चाहिए थे, जो इस घटना और बाबा की मौत के बीच संबंध साबित कर सकें।
लेकिन तभी जांच में एक और बात सामने आई।
विवाद के बाद गायब हो गया नरेंद्र गिरि
पुलिस जब नरेंद्र गिरि के बारे में जानकारी जुटाने लगी, तो पता चला कि वह लापता है।
जिस साधु का नाम बाबा के साथ हुए विवाद में सामने आया था, वह अब पुलिस की पहुंच से बाहर था।
पुलिस ने उसकी तलाश शुरू की और संभावित ठिकानों पर दबिश देने लगी।
अब जांच के तीन अहम बिंदु थे—बाबा की गर्दन पर मिले चोटों के निशान, आश्रम से गायब मोबाइल फोन और हत्या से एक दिन पहले नरेंद्र गिरि के साथ आई महिला को लेकर हुआ विवाद।
इन तीनों बातों ने मामले को और उलझा दिया था।
अगर नरेंद्र गिरि निर्दोष था, तो वह कहां चला गया था? क्या उसे बाबा की हत्या के बारे में कुछ पता था? और आश्रम से गायब हुआ मोबाइल फोन इस पूरे मामले में क्या भूमिका निभा सकता था?
पुलिस के लिए मोबाइल फोन भी अहम कड़ी था। लेकिन सिर्फ मोबाइल का गायब होना अपने आप में किसी के खिलाफ सबूत नहीं था। उसकी तलाश और बाकी साक्ष्यों की जांच जरूरी थी।
अब पुलिस के सामने थे चार बड़े सवाल
जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही थी, वैसे-वैसे इस मामले के रहस्य गहराते जा रहे थे।
पहला सवाल—क्या बाबा की हत्या नरेंद्र गिरि ने की थी, या उसके लापता होने के पीछे कोई दूसरी वजह थी?
दूसरा सवाल—क्या महिला को आश्रम लाने और उस पर बाबा की नाराजगी का हत्या से कोई संबंध था?
तीसरा सवाल—बाबा का मोबाइल फोन कहां गया? क्या उसमें कोई ऐसी जानकारी थी, जो इस मामले का राज खोल सकती थी?
और चौथा सवाल—क्या पुलिस जिस दिशा में जांच कर रही थी, हत्यारा उसी कहानी का हिस्सा था, या फिर असली आरोपी कोई और ही था?
एक तरफ पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट हत्या की पुष्टि कर चुकी थी। दूसरी तरफ, संत समाज जल्द कार्रवाई की मांग कर रहा था। और इन सबके बीच जंगल के उस आश्रम में हुई आखिरी मुलाकात कई सवाल छोड़ गई थी।
आखिर अलबेले भोलागिरी महाराज का हत्यारा कौन था? नरेंद्र गिरि कहां गायब हो गया? महिला का इस मामले से क्या संबंध था? और क्या गायब मोबाइल फोन से हत्या का राज खुल सकता था?
इन सवालों के जवाब जानने के लिए पढ़िए मध्य प्रदेश क्राइम फाइल्स का अगला भाग।