पुष्पराजगढ़ में किसकी दरक रही सियासी जमीन ? : हीरा सिंह Vs फुंदेलाल मार्को की बोल-बम यात्रा, शिव ने किसकी भरी झोली; जानिए 2 यात्राओं की 10 सीक्रेट कहानी
MP CG Times / Tue, Aug 25, 2026
पुष्पराजगढ़। सावन के आखिरी सोमवार को अमरकंटक हर-हर महादेव और बोल-बम के जयकारों से गूंज रहा था, लेकिन इसी आस्था की भीड़ में पुष्पराजगढ़ की सियासत का सवाल भी खड़ा हो गया। किसकी जमीन मजबूत हो रही है और किसकी दरक रही है? एक तरफ कांग्रेस के 3 बार के विधायक फुंदेलाल सिंह मार्को की अगुआई में पुष्पराजगढ़ से अमरकंटक तक कांवड़ यात्रा निकली, तो दूसरी तरफ भाजपा जिला अध्यक्ष हीरा सिंह श्याम से जुड़े आयोजन में अमरकंटक से बमंगढ़ बमलेश्वर धाम तक हजारों कांवड़िए पहुंचे।
कहानी सिर्फ दो कांवड़ यात्राओं की नहीं है। मार्को के सामने अपना गढ़ बचाने की चुनौती है, तो पिछली विधानसभा में 3-4 हजार वोटों से हार चुके हीरा सिंह श्याम के सामने वापसी की जमीन मजबूत करने का सवाल। उधर जनता के मुद्दे सड़क, पानी, रोजगार, स्कूल और बिजली आज भी अपनी जगह खड़े हैं। ऐसे में सवाल बड़ा है कि कांवड़ में आस्था थी या सियासी ताकत की शक्ति प्रदर्शन, भीड़ ने किसका कद बढ़ाया और शिव ने किसकी झोली भरी?
MPCG टाइम्स की इस खास रिपोर्ट में विस्तार से पढ़िए 2 यात्राओं की सीक्रेट कहानी
1. पुष्पराजगढ़ में दो कांवड़ यात्राएं...क्या यह सिर्फ आस्था की कहानी है?
पुष्पराजगढ़ से अमरकंटक तक कांग्रेस विधायक फुंदेलाल सिंह मार्को के नेतृत्व में कांवड़ यात्रा निकली, जबकि दूसरी ओर नर्मदांचल वीर शिवाजी युवा संगठन और हीरा सिंह श्याम मित्र मंडल के तत्वावधान में अमरकंटक से बमंगढ़ बमलेश्वर धाम तक कांवड़ यात्रा निकाली गई। दोनों यात्राओं में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। एक यात्रा में पुष्पराजगढ़ से अमरकंटक की ओर कांवड़िए पहुंचे तो दूसरी यात्रा में अमरकंटक से मां नर्मदा का पवित्र जल लेकर बमलेश्वर धाम की ओर प्रस्थान हुआ।
धार्मिक नजरिए से दोनों आयोजनों की अपनी आस्था है और उसे उसी सम्मान के साथ देखा जाना चाहिए। लेकिन राजनीति के नजरिए से तस्वीर इसलिए दिलचस्प हो जाती है, क्योंकि इन आयोजनों के साथ क्षेत्र के दो सक्रिय राजनीतिक चेहरे भी जुड़े हैं। जनता के लिए सवाल यही है कि क्या ये सिर्फ सावन के धार्मिक आयोजन हैं या फिर ऐसे बड़े जनसमूह के बीच नेताओं की मौजूदगी आने वाले दिनों के लिए जनसंपर्क की जमीन भी तैयार करती है?
2. एक तरफ तीन बार के विधायक मार्को...क्या मजबूत गढ़ को फिर कसने की जरूरत है?
फुंदेलाल सिंह मार्को पुष्पराजगढ़ से कांग्रेस के तीन बार के विधायक हैं। तीन चुनाव जीतना किसी नेता के लिए छोटी उपलब्धि नहीं होती। इसका मतलब है कि क्षेत्र में उनकी राजनीतिक पकड़, संगठन और मतदाताओं के साथ लंबे समय से संपर्क रहा है। लेकिन राजनीति में पुरानी जीत का मतलब यह नहीं कि अगली जीत भी अपने आप तय है। हर चुनाव के साथ समीकरण बदलते हैं, नए मुद्दे आते हैं, नए चेहरे सामने आते हैं और पुराने जनाधार की भी परीक्षा होती है।
ऐसे में एक बड़े धार्मिक आयोजन में लगातार लोगों के बीच दिखाई देना किसी भी स्थापित नेता के लिए जनसंपर्क का अवसर हो सकता है। आम मतदाता इसे अपने तरीके से देखता है। उसे यह भी याद रहता है कि नेता चुनाव के समय ही दिखाई देता है या पूरे कार्यकाल में क्षेत्र के बीच मौजूद रहता है। इसलिए मार्को की कांवड़ यात्रा को सिर्फ धार्मिक नजरिए से देखना एक पहलू है, लेकिन उनकी तीन बार की चुनावी पृष्ठभूमि के साथ देखें तो यह उनकी सक्रिय राजनीतिक मौजूदगी का हिस्सा भी दिखाई देती है।
3. दूसरी तरफ हीरा सिंह श्याम...करीबी हार के बाद अब संगठन की ताकत
दूसरे छोर पर भाजपा जिला अध्यक्ष हीरा सिंह श्याम हैं। वे विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं और करीब 3-4 हजार वोटों के अंतर से हार चुके हैं। राजनीति में ऐसी हार को सिर्फ हार कहकर छोड़ देना आसान है, लेकिन करीबी अंतर बताता है कि मुकाबला पूरी तरह एकतरफा नहीं था। अब उनके पास भाजपा जिला अध्यक्ष के रूप में संगठन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। यानी चुनाव लड़ने का अनुभव भी है और संगठन को जमीन पर सक्रिय रखने की जिम्मेदारी भी। ऐसे में उनका बड़े धार्मिक आयोजनों से जुड़ना और बड़ी संख्या में लोगों के बीच दिखाई देना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक चर्चा पैदा करता है।
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि अगला विधानसभा चुनाव वही लड़ेंगे, क्योंकि टिकट का फैसला पार्टी करेगी। लेकिन जनता भी राजनीति समझती है। वह यह जरूर देखती है कि कौन नेता लगातार उसके बीच पहुंच रहा है, किसके साथ कार्यकर्ता खड़े हैं और किसके आयोजन में स्थानीय लोग जुड़ रहे हैं। पिछली करीबी हार के बाद हीरा सिंह श्याम की सक्रियता इसलिए भी नजरअंदाज नहीं की जा सकती।
4. कांवड़ का रास्ता...क्या जनसंपर्क का रास्ता भी है?
कांवड़ यात्रा में हजारों लोग सड़क पर चलते हैं। रास्ते में गांव आते हैं, बाजार आते हैं, स्थानीय लोग मिलते हैं और कार्यकर्ता भी साथ चलते हैं। धार्मिक आयोजन होने के कारण यहां किसी औपचारिक राजनीतिक सभा की जरूरत नहीं पड़ती। नेता लोगों के बीच होता है और लोग नेता को करीब से देखते हैं। यही वजह है कि बड़े धार्मिक आयोजन राजनीति के लिए भी जनसंपर्क का अवसर बन जाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि यात्रा में शामिल हर व्यक्ति किसी नेता का समर्थक है।
बल्कि श्रद्धालु अपने विश्वास और भक्ति के कारण शामिल होते हैं। लेकिन किसी नेता के लिए इतने बड़े समूह के बीच मौजूद रहना, अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखना और क्षेत्र के लोगों से लगातार संपर्क में रहना राजनीतिक दृष्टि से निश्चित रूप से मायने रखता है। आसान भाषा में कहें तो भक्त कांवड़ में जल लेकर चल रहा है, लेकिन नेता के लिए उसी रास्ते पर जनता से संपर्क भी बन रहा है। राजनीति में इसे अवसर कहना गलत नहीं होगा।
5. असली सवाल—कौन सियासी जमीन टटोल रहा है और कौन अपनी जमीन बचा रहा है?
यहीं से कहानी दिलचस्प होती है। मार्को के पास तीन चुनावी जीत का मजबूत रिकॉर्ड है, इसलिए उनके सामने अपनी जमीन बचाए रखने की चुनौती है। हीरा सिंह श्याम चुनावी मैदान में उतर चुके हैं, करीबी अंतर से हार चुके हैं और अब भाजपा संगठन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, इसलिए उनके लिए अपनी राजनीतिक जमीन और मजबूत करने की चुनौती है। दोनों की जरूरतें अलग हैं, लेकिन रास्ता एक है। लोगों के बीच लगातार मौजूद रहना।
यही वजह है कि दो बड़ी कांवड़ यात्राएं सिर्फ धार्मिक आयोजन भर नहीं रह जातीं, बल्कि राजनीतिक विश्लेषण का विषय बन जाती हैं। कोई भी नेता खुले तौर पर यह नहीं कहेगा कि वह कांवड़ लेकर वोट मांगने निकला है, क्योंकि मामला आस्था का है और आस्था पर राजनीति का ठप्पा लगाना आसान नहीं। लेकिन जनता के बीच लगातार मौजूद रहने का राजनीतिक फायदा किसे नहीं चाहिए? सवाल यहीं पैदा होता है और इसका जवाब फिलहाल समय के पास है।
6. जनता की नजर में क्या है—भक्ति, भीड़ या राजनीति?
पुष्पराजगढ़ के आम मतदाता के लिए तस्वीर शायद इतनी जटिल नहीं है। उसके लिए कांवड़ यात्रा भगवान शिव की भक्ति है, नर्मदा का जल है और सावन की आस्था है। लेकिन वही मतदाता जब अपने इलाके की राजनीति देखता है तो उसे नेताओं की सक्रियता भी दिखाई देती है। वह यह भी देखता है कि कौन उसके गांव में आया, किसके साथ कितने स्थानीय चेहरे थे और किस आयोजन में उसके परिचित लोग शामिल हुए।
यही कारण है कि धार्मिक आस्था और राजनीतिक प्रभाव को पूरी तरह अलग-अलग डिब्बों में रखना मुश्किल हो जाता है। हालांकि एक बात साफ है- कांवड़ यात्रा में शामिल भीड़ को सीधे वोट बैंक मान लेना गलत होगा। जो व्यक्ति भगवान शिव की भक्ति में कांवड़ उठा रहा है, जरूरी नहीं कि वह चुनाव में उसी नेता को वोट दे जिसके साथ यात्रा में चल रहा था। लेकिन नेता की मौजूदगी और आयोजन की पहुंच उसके जनसंपर्क को जरूर मजबूत कर सकती है। जनता के लिए यह भक्ति हो सकती है, नेता के लिए भक्ति के साथ संपर्क का अवसर भी।
7. भीड़ का गणित...हजारों कांवड़िए कितने वोट नहीं, कितने संपर्क हैं?
राजनीतिक आयोजनों में भीड़ हमेशा चर्चा का विषय रहती है। लेकिन भीड़ को वोट में बदल देना सबसे आसान और सबसे खतरनाक राजनीतिक गणित है। हजारों श्रद्धालु किसी यात्रा में आए, इसका मतलब यह नहीं कि हजारों वोट किसी एक नेता के खाते में चले गए। लेकिन इतनी बड़ी भीड़ का दूसरा महत्व है- यह बताती है कि आयोजक लोगों को एक जगह जोड़ने में कितना सक्षम है।
यात्रा में कौन-कौन से गांव शामिल हुए, स्थानीय कार्यकर्ताओं की भूमिका कितनी रही, कितने पंचायत क्षेत्रों से लोग आए और आयोजन के दौरान कौन से सामाजिक चेहरे सक्रिय दिखे- ये बातें राजनीतिक संगठन की ताकत का संकेत दे सकती हैं। इसलिए आने वाले समय में इस कांवड़ यात्रा का मूल्यांकन सिर्फ इस आधार पर नहीं होगा कि कितने लोग चले, बल्कि इस आधार पर भी होगा कि उन लोगों के बीच नेताओं की पहुंच कितनी बनी। राजनीति में हर चेहरा वोट नहीं होता, लेकिन हर चेहरा एक संपर्क जरूर बन सकता है।
8. क्या मार्को के लिए यह शक्ति प्रदर्शन है और हीरा के लिए वापसी की तैयारी?
फुंदेलाल सिंह मार्को के मामले में तीन बार की जीत सबसे बड़ा राजनीतिक तथ्य है। लंबे समय से क्षेत्र में स्थापित नेता के लिए बड़े आयोजनों में मौजूदगी अपनी राजनीतिक पकड़ को बनाए रखने का माध्यम हो सकती है। दूसरी तरफ हीरा सिंह श्याम के मामले में पिछली करीबी हार और वर्तमान संगठनात्मक भूमिका कहानी को अलग रंग देती है।
उनके लिए लगातार क्षेत्र में सक्रिय रहना और लोगों के बीच अपनी मौजूदगी मजबूत करना भविष्य की राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है। इसे सीधे चुनावी तैयारी कहना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन इसे संभावित राजनीतिक सक्रियता के रूप में पढ़ना गलत भी नहीं होगा।
9. चुनाव अभी दूर है...लेकिन सियासी जमीन पहले ही तैयार होती है
विधानसभा चुनाव की तारीख आने के बाद राजनीति शुरू नहीं होती। उसकी तैयारी उससे काफी पहले शुरू हो जाती है। कार्यकर्ताओं से संपर्क, सामाजिक समीकरणों को समझना, क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बनाए रखना और जनता के बीच लगातार दिखाई देना—ये सब चुनावी राजनीति के लंबे खेल का हिस्सा हैं। धार्मिक आयोजन इस मामले में खास होते हैं, क्योंकि यहां समाज का बड़ा हिस्सा स्वाभाविक रूप से जुड़ता है। नेता को अलग से भीड़ बुलाने की जरूरत नहीं पड़ती और जनता भी राजनीतिक सभा की मानसिकता से नहीं आती।
ऐसे में संपर्क का यह मौका अपने आप बन जाता है। पुष्पराजगढ़ में इस बार दो कांवड़ यात्राओं की चर्चा इसलिए चुनावी नजरिए से महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक तरफ तीन बार के विधायक हैं और दूसरी तरफ पिछली करीबी हार के बाद भाजपा संगठन की जिम्मेदारी संभाल रहे नेता। चुनाव अभी दूर है, लेकिन राजनीति में जमीन की नाप-जोख अक्सर बहुत पहले शुरू हो जाती है।
10. आखिर कांवड़ में आस्था कितनी और सियासत कितनी?
इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि दोनों को पूरी तरह अलग भी नहीं किया जा सकता और एक को दूसरे का प्रमाण भी नहीं बनाया जा सकता। श्रद्धालुओं के लिए कांवड़ यात्रा आस्था है। मां नर्मदा का जल है। भगवान शिव का अभिषेक है। हर-हर महादेव का जयघोष है। उनके लिए यह किसी चुनावी रणनीति का हिस्सा नहीं, बल्कि धार्मिक विश्वास का हिस्सा है। लेकिन जब इसी धार्मिक आयोजन में क्षेत्र के दो प्रमुख राजनीतिक चेहरे सक्रिय नजर आते हैं, उनके साथ समर्थकों और कार्यकर्ताओं की मौजूदगी दिखाई देती है।
विधानसभा चुनाव की राजनीति धीरे-धीरे आकार लेने लगती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या ये आयोजन सिर्फ भक्ति तक सीमित हैं या इनके जरिए नेता जनता के बीच अपनी पकड़ भी परख रहे हैं? इसका फैसला अभी नहीं किया जा सकता। लेकिन इतना जरूर है कि पुष्पराजगढ़ में कांवड़ यात्रा ने राजनीति को एक नया बहाना दे दिया है चर्चा का।
अमरकंटक में उस दिन जयकारा भोलेनाथ का था, कांवड़ियों के कंधे पर नर्मदा जल था और मंदिरों में आस्था की भीड़ थी। लेकिन पुष्पराजगढ़ की सियासत शायद इस भीड़ को एक दूसरे चश्मे से भी देख रही थी। तीन बार के विधायक फुंदेलाल सिंह मार्को के लिए सवाल अपनी स्थापित जमीन को बनाए रखने का है, तो भाजपा जिला अध्यक्ष हीरा सिंह श्याम के लिए सवाल पिछली करीबी हार के बाद अपनी राजनीतिक मौजूदगी को और मजबूत करने का है। दोनों के बीच सीधा मुकाबला अभी तय नहीं है और न ही किसी को अगला उम्मीदवार मान लेना उचित होगा। लेकिन दोनों की सक्रियता ने इतना जरूर बता दिया है कि पुष्पराजगढ़ की राजनीति में मैदान खाली नहीं है।
पुष्पराजगढ़ की जनता कितनी खुश, कितनी नाखुश?
अमरकंटक में कांवड़ियों की भीड़ है, जयकारे हैं, धार्मिक आयोजन हैं और नेताओं की सक्रियता भी दिखाई दे रही है। लेकिन इस पूरी तस्वीर से कुछ कदम पीछे हटकर पुष्पराजगढ़ के गांवों की तरफ देखें तो कहानी का दूसरा चेहरा नजर आता है। वहां सवाल भगवान शिव के जलाभिषेक से आगे बढ़कर रोजमर्रा की जिंदगी का है। सड़क कहां है? रोजगार कहां है? पीने का पानी कब मिलेगा? बच्चों की पढ़ाई कितनी आसान है? गांव में बिजली कितनी भरोसेमंद है? और सबसे बड़ा सवाल—जिस क्षेत्र में चुनाव के समय विकास सबसे बड़ा मुद्दा बनता है, वहां जमीन पर विकास की रफ्तार आखिर कितनी है?
सड़क नहीं तो विकास की रफ्तार कैसे?
पुष्पराजगढ़ के कई इलाकों में सड़क आज भी लोगों की सबसे बड़ी जरूरतों में शामिल है। सड़क खराब हो या सड़क का अभाव हो, उसका असर सिर्फ आवागमन पर नहीं पड़ता। गांव का बाजार से संपर्क कमजोर होता है, मरीजों को अस्पताल पहुंचाना मुश्किल होता है, बच्चों के स्कूल जाने में परेशानी आती है और किसानों के लिए अपनी उपज बाहर ले जाना चुनौती बन जाता है। यानी सड़क यहां सिर्फ सड़क नहीं है; यह स्कूल, अस्पताल, बाजार, रोजगार और सरकारी सुविधाओं तक पहुंचने का रास्ता है। ऐसे में जब किसी गांव की जनता सड़क के लिए आंदोलन करती है या जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाती है, तो सवाल सिर्फ एक सड़क का नहीं, बल्कि उस पूरे गांव के विकास की रफ्तार का होता है।
नौकरी नहीं, रोजगार नहीं...तो युवा जाएं कहां?
पुष्पराजगढ़ की राजनीति में रोजगार का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। गांव के युवाओं के सामने सबसे बड़ा सवाल यही रहता है कि पढ़ाई के बाद काम कहां मिलेगा? सरकारी नौकरी सीमित है और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पर्याप्त नहीं हैं तो युवा शहरों की तरफ पलायन करने को मजबूर होते हैं। कोई मजदूरी के लिए बाहर जाता है, कोई छोटे-मोटे काम के लिए दूसरे शहर का रुख करता है। चुनावी भाषणों में रोजगार बड़ा मुद्दा जरूर बनता है, लेकिन गांव के युवा के लिए रोजगार भाषण नहीं, महीने की आमदनी का सवाल है। इसलिए अगर राजनीतिक दल और नेता क्षेत्र में अपना जनाधार तलाश रहे हैं तो उन्हें यह भी देखना होगा कि युवा उनसे सिर्फ नारे सुनना चाहता है या अपने गांव में काम का मौका भी।
पानी का सवाल...जहां नर्मदा का उद्गम, वहां पानी की चिंता क्यों?
पुष्पराजगढ़ और अमरकंटक का नाम नर्मदा से जुड़ा है। लेकिन नर्मदा की पहचान वाले इलाके में स्थानीय स्तर पर पेयजल की समस्या की शिकायतें एक बड़ा विरोधाभास पैदा करती हैं। किसी गांव में पानी के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़े, गर्मियों में संकट बढ़ जाए या नल-जल व्यवस्था नियमित न हो तो सरकारी योजनाओं के दावे जमीन पर सवालों से टकराते हैं। जनता के लिए यह विडंबना से कम नहीं कि जिस इलाके की पहचान नर्मदा के उद्गम से है, उसी इलाके में किसी परिवार के लिए पीने का पानी रोज की चिंता बन जाए। यही वह सवाल है जिसे चुनावी मंच से ज्यादा गांव की चौपाल पर समझना जरूरी है।
स्कूल हैं, लेकिन पढ़ाई और सुविधाएं कितनी?
बच्चों की शिक्षा भी क्षेत्र की तस्वीर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्कूल तक पहुंचने के लिए सड़क नहीं, शिक्षकों की उपलब्धता को लेकर शिकायतें, भवन या दूसरी मूलभूत सुविधाओं की कमी—इनमें से कोई भी समस्या हो तो उसका सीधा असर बच्चे की पढ़ाई पर पड़ता है। ग्रामीण परिवार के लिए शिक्षा सिर्फ स्कूल की इमारत नहीं है। उसे यह देखना है कि बच्चा समय पर स्कूल पहुंचे, नियमित पढ़ाई हो, शिक्षक मिलें और आगे की पढ़ाई के लिए उसे गांव छोड़कर कितनी दूर जाना पड़े। ऐसे में विकास का असली पैमाना सिर्फ यह नहीं कि कितने स्कूल हैं, बल्कि यह भी है कि वहां बच्चों को कैसी शिक्षा मिल रही है।
बिजली पहुंची, लेकिन कितनी भरोसेमंद?
बिजली का कनेक्शन होना और 24 घंटे भरोसेमंद बिजली मिलना दो अलग बातें हैं। ग्रामीण इलाकों में बिजली की उपलब्धता खेती, पढ़ाई, छोटे कारोबार और घरेलू जीवन से सीधे जुड़ी है। किसान के लिए सिंचाई प्रभावित होती है तो घर की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। बच्चे पढ़ाई करना चाहते हैं तो बिजली की जरूरत है। कोई छोटा व्यवसाय शुरू करना चाहता है तो बिजली जरूरी है। इसलिए बिजली का सवाल सिर्फ बल्ब जलने तक सीमित नहीं है; यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा सवाल है।
स्वास्थ्य सुविधा कितनी दूर है?
जब सड़क और परिवहन की समस्या हो तो स्वास्थ्य सुविधा की दूरी और बड़ी हो जाती है। गंभीर मरीज को अस्पताल ले जाने में समय लगना, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों के लिए परिवहन की दिक्कत या छोटे इलाज के लिए भी बड़े शहर पर निर्भरता—ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब किसी राजनीतिक आयोजन की भीड़ नहीं देती। जनता के लिए विकास का मतलब यह भी है कि बीमारी आने पर अस्पताल कितनी दूर है और वहां पहुंचने में कितना समय लगता है।
फिर जनता खुश है या नाखुश?
यही सवाल सबसे सीधा है और इसका जवाब भी एक शब्द में नहीं दिया जा सकता। पुष्पराजगढ़ की जनता पूरी तरह खुश है, ऐसा कहना भी ठीक नहीं होगा और पूरी जनता त्रस्त है, यह कहना भी बिना व्यापक ग्राउंड रिपोर्ट के सही नहीं होगा। अलग-अलग गांवों, समुदायों और परिवारों की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। कहीं सड़क बनी होगी, कहीं पानी की व्यवस्था बेहतर हुई होगी, कहीं बिजली की स्थिति सुधरी होगी और कहीं आज भी वही समस्या बनी होगी। इसलिए असली सवाल यह नहीं कि जनता खुश है या नाराज; असली सवाल यह है कि किस मुद्दे पर खुश है और किस मुद्दे पर नाराज है।
यही वह जगह है जहां कांवड़ यात्रा और चुनावी राजनीति का असली कनेक्शन सामने आता है। हजारों लोग धार्मिक यात्रा में शामिल हो सकते हैं, लेकिन चुनाव के समय वही मतदाता अपने घर के सामने की सड़क, पानी की टंकी, स्कूल, बिजली, रोजगार और अस्पताल को याद करेगा। नेता के साथ चलना और नेता को वोट देना दो अलग बातें हैं।
पुष्पराजगढ़ में किसकी दरक रही सियासी जमीन?
जवाब: अभी किसी एक नेता की सियासी जमीन को “दरकी हुई” कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन कांवड़ यात्राओं ने इतना जरूर संकेत दिया है कि पुष्पराजगढ़ में चुनावी जमीन की नाप-जोख शुरू हो गई है। तीन बार के विधायक फुंदेलाल सिंह मार्को अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने की कोशिश में हैं, जबकि पिछली विधानसभा में करीब 3-4 हजार वोटों से हार चुके भाजपा जिला अध्यक्ष हीरा सिंह श्याम अपनी राजनीतिक जमीन और मजबूत करने की कोशिश में नजर आते हैं।
असल दरार का फैसला कांवड़ यात्रा की भीड़ नहीं, आने वाले चुनाव में जनता के मुद्दे और वोट बताएंगे। सड़क, रोजगार, पानी, स्कूल, बिजली और स्वास्थ्य जैसी समस्याएं अगर जनता की नाराजगी बढ़ाती हैं, तो यह मौजूदा राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकती हैं। यानी फिलहाल सवाल का सबसे सटीक जवाब है—जमीन अभी दरकी नहीं है, लेकिन दोनों खेमे उसे टटोल जरूर रहे हैं।
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