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अनूपपुर में एक और तेंदुए का हत्यारा कौन ? : 3 साल 9 मौत के बाद भी जंगल में कानून बेअसर, कटघरे में गश्त टीम, कब जागेगा वन विभाग, क्या पोस्टमार्टम से धुलेगा गुनाह ?

शिवम साहू, अनूपपुर। मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले के जैतहरी वन परिक्षेत्र (Jaithari Forest Range) में तेंदुए की मौत कोई “दुर्घटना” नहीं, बल्कि वन विभाग की लापरवाही से लिखा गया एक और काला अध्याय (Forest Department Failure) है। शिकार के लिए खुलेआम लगाए गए करंट वाले तार (Electric Wire Poaching Trap) की चपेट में आकर एक तेंदुआ तड़प-तड़प कर मर गया। हमेशा की तरह वन विभाग मौत के बाद हरकत में आया। 2-3 साल में 9 तेंदुओं की मौत हो चुकी है।

जैतहरी–गोबरी मार्ग बना Wildlife Crime Zone

बुधवार की शाम जैतहरी बीट अंतर्गत जैतहरी–गोबरी मार्ग पर वार्ड क्रमांक 14 और 15 के बीच यह घटना हुई। यह वही इलाका है जहां पहले भी Wildlife Crime Zone होने के संकेत मिलते रहे हैं। बावजूद इसके न नियमित गश्त, न खुफिया निगरानी और न ही ग्रामीण स्तर पर कोई ठोस रोकथाम। नतीजा—एक और Leopard Death in Madhya Pradesh।

करंट ट्रैप कैसे लगे? विभाग को भनक तक नहीं

सबसे गंभीर सवाल यह है कि आखिर खेतों और जंगल की सीमा पर करंट से दौड़ते तार कब और कैसे लगाए गए? क्या वन विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगी, या फिर सब कुछ जानते हुए भी आंखें मूंद ली गईं? अगर समय रहते Forest Patrol और Anti-Poaching Monitoring होती, तो शायद आज एक तेंदुआ जिंदा होता।

मौत के बाद जांच, वही पुरानी सरकारी कहानी

घटना के बाद वन विभाग ने शहडोल से Dog Escort Squad बुलाकर कुछ संदिग्धों से पूछताछ शुरू की है। लेकिन यह कार्रवाई भी वही पुरानी कहानी दोहराती दिख रही है—पहले मौत, फिर पूछताछ, फिर फाइल बंद। सवाल यह है कि क्या इस बार किसी जिम्मेदार पर Accountability तय होगी या यह मामला भी बाकी केसों की तरह जांच के नाम पर दफन हो जाएगा?

पोस्टमार्टम और अंतिम संस्कार से जिम्मेदारी खत्म नहीं

तेंदुए के शव का पोस्टमार्टम कराकर अंतिम संस्कार कर देना वन विभाग की जिम्मेदारी खत्म नहीं कर देता। असली जिम्मेदारी है—Wildlife Protection System को मजबूत करना। लेकिन हकीकत यह है कि विभाग को खुद नहीं पता कि जिले में कितने तेंदुए मौजूद हैं, किस रेंज में कितने Leopard Movement Zones हैं और कहां सबसे ज्यादा खतरा है।

पहले ट्रेन से कटा तेंदुआ, अब करंट से मौत

यह लापरवाही कोई नई नहीं है। कुछ समय पहले ही इसी जिले में एक तेंदुआ ट्रेन से कटकर (Leopard Train Accident) मारा गया था। उस वक्त भी बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ नहीं बदला। न ट्रैक के आसपास सुरक्षा बढ़ी, न वन्यजीव चेतावनी तंत्र विकसित हुआ।

कागजों में एक्टिव, जंगल में फेल वन विभाग

लगातार हो रही Leopard Deaths in Anuppur District इस बात का साफ सबूत हैं कि वन विभाग सिर्फ कागजों में सक्रिय है, जंगल में नहीं। अवैध शिकार, करंट ट्रैप और मानवीय लालच के खिलाफ कोई ठोस रणनीति नजर नहीं आती। यह सिर्फ एक तेंदुए की मौत नहीं, बल्कि पूरे वन संरक्षण तंत्र की विफलता (Collapse of Forest Conservation System) है।

वहीं अनूपपुर में 2-3 साल में 9 तेंदुओं की मौत हो चुकी है। लगातार हो रहीं मौतों को लेकर हमने जब अनूपपुर DFO विपिन पटेल से प्रतिक्रिया और कार्रवाई को लेकर अपडेट लेने के लिए संपर्क करने की कोशिश की, तो उनसे संपर्क नहीं हो सका।

अब अगला तेंदुआ कौन होगा?

अब सवाल सीधा है—क्या वन विभाग इस मौत की नैतिक जिम्मेदारी लेगा? क्या दोषियों तक कार्रवाई पहुंचेगी? या फिर आने वाले दिनों में किसी और तेंदुए की मौत पर वही रटी-रटाई लाइन सुनने को मिलेगी—“जांच जारी है”? अगर अब भी सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो जंगल में तेंदुए नहीं, सिर्फ लापरवाही के पोस्टमार्टम ही बचेंगे।

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