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: पूर्व मंत्री ने बाजार में मुर्गों को लड़वाया: कवासी लखमा का मुर्गा बना चैंपियन, एक ही वार में प्रतिद्वंदी को किया ढेर

Former minister Kawasi Bazaar made chickens fight: छत्तीसगढ़ के बस्तर में पूर्व मंत्री और कांकेर लोकसभा से कांग्रेस प्रत्याशी कवासी लखमा का मुर्गे से लड़ाई का वीडियो वायरल हो रहा है। कवासी लखमा मुर्गा बाजार पहुंचे, जहां वह मुर्गों की लड़ाई का आयोजन कर रहे हैं। कवासी एक लाल रंग के मुर्गे को मैदान में उतारते हैं, जो प्रतिद्वंद्वी सफेद रंग के मुर्गे को एक ही झटके में हरा देता है। बताया जा रहा है कि कोंटा विधायक और बस्तर लोकसभा प्रत्याशी कवासी लखमा चुनाव प्रचार के लिए पुसपाल गांव गए थे। यहां पारंपरिक मुर्गा ग्रामीणों के बीच बाजार में पहुंचे, जहां लखमा का अलग अंदाज देखने को मिला। मुर्गों की लड़ाई की परंपरा क्या है ? दरअसल, बस्तर के आदिवासी इलाकों में मुर्गों की लड़ाई ग्रामीणों के मनोरंजन का साधन है। गाँवों में अक्सर मुर्गों की लड़ाई का आयोजन किया जाता है। यहां सप्ताह के हर दिन मुर्गा बाजार लगता है। इस लड़ाई में भाग लेने और खेलने के लिए आसपास के ग्रामीणों के अलावा दूर-दूर से भी लोग आते हैं। ये बाजार में घेरा बनाकर मुर्गों की लड़ाई का आयोजन ऐसा कहा जाता है कि मुर्गों को लड़ाई के लिए पहले से ही तैयार किया जाता है। मुर्गों की लड़ाई के लिए बाजार में ही गोल घेरा बनाया जाता है। दोनों मुर्गों के प्रत्येक पैर में एक धारदार हथियार बंधा होता है, जिस मुर्गे का हथियार पहले प्रतिद्वंद्वी मुर्गे को मारने में सफल हो जाता है, वह जीत जाता है। विजेता को दोगुनी या तिगुनी रकम मिलती है ऐसा कहा जाता है कि जीतने वाले मुर्गे का मालिक हारने वाले मुर्गो को अपने साथ ले जाता है। मुर्गों की लड़ाई में ग्रामीण पैसे की शर्त भी लगाते हैं। विजेता को दोगुनी या तिगुनी रकम मिलती है। मुर्गों के पैरों में नुकीले ब्लेड बांधे जाते हैं रंग के आधार पर इन मुर्गों को कबरी, चितरी, जोधारी, लाली नाम से पुकारा जाता है। मुर्गों की लड़ाई के शौकीन ग्रामीण मुर्गियां बड़े शौक से पालते हैं। असील नस्ल की मुर्गियां खासतौर पर आंध्र प्रदेश और बस्तर के सीमावर्ती इलाकों में पाई जाती हैं। Read more- Landmines, Tanks, Ruins: The Afghanista Taliban Left Behind in 2001 29 IAS-IPS

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