क्या आदिवासी समाज की जड़ों को डुबो देगा डैम ? : अनूपपुर Narmada Dam Project के खिलाफ हजारों ग्रामीण सड़क पर, नर्मदा बचेगी या जल-जंगल, जमीन आदिवासी उजड़ेंगे ?
MP CG Times / Sun, Jan 11, 2026
अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़, डिंडोरी के करंजिया और बजाग ब्लॉक में इन दिनों अपर नर्मदा परियोजना (Upper Narmada Dam Project) को लेकर जबरदस्त असंतोष देखने को मिल रहा है। सोशल मीडिया से लेकर गांवों की चौपाल तक यह सवाल उठ रहा है कि क्या मोहन सरकार (Mohan Government) विकास के नाम पर आदिवासियों को उनकी जमीन, जंगल और जल से बेदखल करने जा रही है। सरकार खुद को आदिवासी हितैषी (Tribal Welfare Government) बताती है, लेकिन ग्राउंड रियलिटी (Ground Reality) में हालात इसके उलट नजर आ रहे हैं।
डिजिटल भूमि पूजन और विस्थापन की आशंका
नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (Narmada Valley Development Authority – NVDA) द्वारा प्रस्तावित अपर नर्मदा परियोजना का डिजिटल भूमि पूजन (Digital Bhoomi Pujan) पहले ही हो चुका है। यह परियोजना अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ और डिंडोरी जिले के करंजिया एवं बजाग विकासखंड के कई आदिवासी गांवों को प्रभावित कर रही है। ये वही इलाके हैं जो पांचवीं अनुसूची (Fifth Schedule Area) और पेशा कानून (PESA Act) के अंतर्गत आते हैं, जहां ग्रामसभा की अनुमति (Gram Sabha Consent) अनिवार्य होती है, लेकिन यह प्रक्रिया पूरी नहीं की गई।

2021 से चल रहा है किसान संघर्ष
अपर नर्मदा बांध के खिलाफ किसान संघर्ष मोर्चा (Kisan Sangharsh Morcha) ने 4 अप्रैल 2021 को पुष्पराजगढ़ ब्लॉक के दमेहड़ी ग्राम पंचायत में सर्वसम्मति से बांध निरस्त करने का प्रस्ताव पारित किया था। इसके बाद 9 अप्रैल 2021 को महामहिम राष्ट्रपति, राज्यपाल और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (National Commission for Scheduled Tribes) को एसडीएम डिंडोरी के माध्यम से ज्ञापन सौंपा गया। इसी तरह 24 जुलाई 2023 को जिला कलेक्टर अनूपपुर को भी परियोजना निरस्त करने के लिए ज्ञापन दिया गया।
ग्रामीणों का कहना है कि 983 करोड़ 80 लाख रुपए की लागत से बनने वाले इस 33 मीटर ऊंचे बांध के कारण हजारों आदिवासी परिवार बेघर हो जाएंगे। प्रदर्शनकारियों ने पेसा कानून और पांचवीं अनुसूची का हवाला देते हुए कहा कि ग्राम सभाओं की सहमति के बिना इस परियोजना को मंजूरी देना उनके अधिकारों का हनन है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने कदम पीछे नहीं खींचे, तो पुष्पराजगढ़ बंद किया जाएगा।

धार्मिक स्थल और पर्यावरण को नुकसान
ज्ञापन में बताया गया कि बांध बनने से नर्मदा के उद्गम स्थल का जल स्रोत प्रभावित हो सकता है। साथ ही, शोभापुर और परसवाड के बीच स्थित धार्मिक स्थल 'करबे मट्ठा करम श्रीदेवी स्थल' और शिवनी संगम पर स्थित प्राचीन कल्पवृक्ष भी जलमग्न होकर नष्ट हो जाएंगे। इस प्रोजेक्ट से खेतगांव, थार पाथर और कोयलारी सहित कुल 10 गांव सीधे तौर पर प्रभावित होंगे।
पहले से चल रही परियोजनाओं से बढ़ी नाराजगी
अपर नर्मदा किसान संघर्ष मोर्चा के अनुसार, क्षेत्र में पहले से ही राघवपुर पावर प्रोजेक्ट और बसनीया बहुउद्देशीय परियोजना का काम चल रहा है। इन सभी प्रोजेक्ट्स को मिलाकर करीब 14,000 परिवारों के विस्थापित होने का खतरा है। ग्रामीणों का कहना है कि वे अपनी जमीन और संस्कृति को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाएंगे और आने वाले दिनों में आंदोलन को और तेज करेंगे।

2024 में सरकार का लिखित आश्वासन
6 अक्टूबर 2024 को नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के कार्यपालन यंत्री डिंडोरी और एसडीएम पुष्पराजगढ़ ने किसान संघर्ष मोर्चा को लिखित में आश्वासन दिया था कि किसी भी प्रकार का बांध निर्माण कार्य नहीं किया जाएगा। लेकिन इसके बावजूद केंद्र सरकार के नवीन बजट में अपर नर्मदा परियोजना को 983 करोड़ 80 लाख रुपये के साथ फिर से शामिल कर लिया गया, जिससे आदिवासी इलाकों में गहरी चिंता पैदा हो गई है।
पहले भी कोर्ट के दबाव में वापस ली गई थी परियोजना
इससे पहले किसान संघर्ष मोर्चा द्वारा अपर नर्मदा परियोजना के खिलाफ न्यायालय में याचिका दायर की गई थी, जिसके बाद राज्य सरकार और नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण को यह परियोजना वापस लेनी पड़ी थी। अब उसी परियोजना को दोबारा लागू करना सरकार की मंशा पर सवाल खड़े कर रहा है।
बांध की रूपरेखा और वैज्ञानिक चेतावनी
परियोजना के तहत 33.80 मीटर ऊंचा पक्का बांध (Concrete Dam) और 23.77 मीटर ऊंचा मिट्टी का बांध (Earthen Dam) बनाया जाना प्रस्तावित है। वैज्ञानिकों (Environmental Experts) का कहना है कि नर्मदा उद्गम (Narmada Origin) के पास इस तरह का निर्माण जल स्रोतों को क्षति पहुंचा सकता है, इसलिए इसे उद्गम से 40 किलोमीटर नीचे बनाने की बात कही गई थी। बावजूद इसके, इसका असर पूरे अपर नर्मदा कैचमेंट एरिया (Upper Catchment Area) पर पड़ेगा।

पेशा कानून और सुप्रीम कोर्ट आदेशों की अनदेखी
किसान संघर्ष मोर्चा का सवाल है कि कलेक्टर अनूपपुर और डिंडोरी ने पेशा कानून (PESA Act) और वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act) के तहत ग्रामसभा की अनुमति क्यों नहीं ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court Orders) के निर्देशों के बाद भी सरकार इन नियमों का उल्लंघन कर रही है, जो संवैधानिक अधिकारों (Constitutional Rights) का सीधा हनन है।
जल, जंगल और जमीन पर सीधा हमला
आदिवासी समाज के लिए यह परियोजना सिर्फ एक बांध नहीं, बल्कि उनके जल (Water Rights), जंगल (Forest Rights) और जमीन (Land Ownership) पर सीधा हमला है। सरकार द्वारा विस्थापन (Forced Displacement) को बढ़ावा देना उनकी आजीविका और सांस्कृतिक पहचान (Cultural Identity) दोनों को खतरे में डाल रहा है।
धार्मिक स्थलों पर भी संकट
परियोजना के कारण शोभापुर और परसवाह सीमा क्षेत्र में स्थित करबेमट्टा करम श्री देवी स्थल जलमग्न हो जाएगा। यह सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि आदिवासी समाज की आस्था और परंपरा का केंद्र है, और इसके डूबने से धार्मिक स्वतंत्रता (Freedom of Religion) पर भी असर पड़ेगा।
जनमानस की चार प्रमुख मांगें
ग्रामीणों की प्रमुख मांग है कि ग्रामसभा की सहमति के बिना अपर नर्मदा परियोजना निरस्त की जाए। भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 की धारा 41(क) का उल्लंघन हुआ है, इसलिए यह परियोजना रद्द हो। धार्मिक स्थलों और आजीविका को बचाया जाए और विस्थापन से होने वाले सामाजिक-आर्थिक नुकसान (Livelihood Loss) को रोका जाए।
धरना-प्रदर्शन और राजनीतिक समर्थन
एक दिवसीय धरना-प्रदर्शन और रैली में सैकड़ों ग्रामीणों ने एसडीएम को ज्ञापन सौंपा। इस आंदोलन में विधायक फुंदेलाल सिंह मार्को, जिला पंचायत सदस्य भुनेश्वरी, पूर्व जनपद उपाध्यक्ष बबलू पांडे, जिला कांग्रेस अध्यक्ष गुड्डू चौहान, आदिवासी जिलाध्यक्ष आशुतोष सिंह मार्को, आदिवासी छात्र संगठन उपाध्यक्ष डॉ. रोहित मरावी, NSUI अध्यक्ष रफी अहमद और NSUI विधानसभा अध्यक्ष जितेंद्र खांडे सहित बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।
विकास या विस्थापन
अपर नर्मदा परियोजना अब केवल एक विकास परियोजना (Development Project) नहीं रही, बल्कि यह आदिवासी अधिकारों बनाम सरकारी नीतियों (Tribal Rights vs Government Policy) की लड़ाई बन चुकी है। अगर सरकार सच में आदिवासी हितैषी है, तो उसे ग्रामसभा की सहमति, कानून और पर्यावरणीय न्याय (Environmental Justice) को प्राथमिकता देनी होगी, नहीं तो यह परियोजना न केवल नर्मदा बल्कि पूरे आदिवासी समाज की जड़ों को डुबो देगी।
विज्ञापन
विज्ञापन
जरूरी खबरें
विज्ञापन