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: पलाश, गुलाब और शहतूत से बनाए होली के रंग, चमका चेहरा, खिल उठे मन

News Desk / Mon, Feb 27, 2023


जिम्मी मगिलिगन सेंटर में होली महोत्सव के लिए प्राकृतिक रंग बनाने के प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू हो चुके हैं। इसी कड़ी में श्री अय्यप्पा पब्लिक एच.एस. स्कूल के छात्रों, फैकल्टी और प्रिंसिपल सुनंदा यादव ने प्रशिक्षण लिया। उन्होंने यहां पर पद्मश्री जनक पलटा मगिलिगन से प्राकृतिक रंग बनाना सीखा। इसमें फूलों की पंखुडिय़ों, सब्जियों, फलों, पेड़ और अन्य चीजों का इस्तेमाल सीखा। 

यह समझा कि प्राकृतिक रंग बनाने के लिए विभिन्न पौधों का किस तरह से उपयोग होता है। पानी उबालने और सुखाने के लिए इस्तेमाल होने वाले सभी सोलर कुकर और ड्रायर वगेरा देखने के साथ केंद्र का दौरा भी किया। जनक पलटा मगिलिगन ने बच्चों को बताया कि प्राकृतिक रंग कितने सुरक्षित हैं और किस तरह से हम सब प्रकृति की सुरक्षा में अपना योगदान दे सकते हैं। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक रंगों का उपयोग बेहद सुरक्षित है और यह हमारी त्वचा के लिए भी बेहद लाभकारी है। प्राकृतिक रंगों से होली खेलना न केवल स्वास्थ्य की दृष्टि से बल्कि हमारी खुशियों के लिए भी और सामाजिक रिश्तों की मजबूती के लिए भी बेहद जरूरी है। 

उन्होंने सात मिनट में पोई का तरल रंग बनाया जिसे मालवा में चमरिया कलर के नाम से जाना जाता है। वहीं टेसू और अम्बाडी का रंग भी दो मिनट में बनाया। जैसे ही पोई बेरी और फूलों को गर्म पानी में डाला उसका रंग आया और बच्चे खुशी से उछल पड़े। उन्हें हलके सूती कपड़े से छानकर अलग किया और बच्चों को दिया गया। 

टेसू (पलाश), गुलाब, शहतूत समेत कई फूलों से रंग बनाना सीखे
इसके बाद में पोई का पेस्ट बनाया जिसमें बस पोई फल को कुचल दिया और अपने हाथों को आपस में रगड़ लिया, यह उन सभी के लिए एक जादुई अनुभव था। सभी ने अपने दोनों हाथों से इन प्राकृतिक रंगों को एक दूसरे के माथे पर तिलक लगाकर अनुभव किया। जनक दीदी ने बताया यह सभी रंग बिना किसी डिटर्जेंट और बहुत कम पानी के उपयोग के निकल जाते हैं। वहीं रसायन वाले रंग और प्लास्टिक के पैकेट प्रदूषण का कारण बनते हैं और त्वचा की एलर्जी, आंखों और गले के लिए हानिकारक होते हैं। वहीं हमारे पास धोने के लिए ज्यादा पानी नहीं  है और हमारे कपड़ों पर लगे रासायनिक रंगों से छुटकारा बहुत मुश्किल से मिलता है। इससे तकलीफ होती है और समय बर्बाद होता है। वहीं पर्यावरण पर प्रभाव के साथ मानसिक तनाव बढ़ता है। रासायनिक रंग हिंसा का कारण बनते हैं जबकि प्राकृतिक रंग मजेदार होते हैं और हमें खुशियां प्रदान करते हैं। बच्चों ने यहां टेसू (पलाश) गुलाब, कई अन्य फूलों की पंखुडिय़ों, शहतूत, बोगेनविलिया और संतरे के छिलके से रंग बनाना भी सीखा। केंद्र पर इस प्रशिक्षण के लिए कोई शुल्क नहीं है और कोई भी संस्थान या लोग समय लेने के बाद यहां पर प्राकृतिक रंग बनाने के लिए आ सकते हैं। 
 


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