: देश में पहली बार गोबर-गौमूत्र से बनी चटाई: 54 कारीगरों ने 11 महीने में किया तैयार, PM मोदी को देंगे गिफ्ट
MP CG Times / Fri, Dec 29, 2023
Will present mat made of cow dung and cow urine to PM Modi in Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ जिले के धरमपुर रोड स्थित मनोहर गौशाला में देश की पहली सौम्या कामधेनु गाय के 100 किलो गोबर और गोमूत्र से चटाई बनाई गई है। जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया जाएगा। एक सप्ताह के अंदर स्पीड पोस्ट से भेज दिया जाएगा। 14.5 किलो वजनी इस चटाई को 54 कारीगरों ने मिलकर 11 महीने में तैयार किया था।
इसे बनाने वाले कारीगरों का कहना है कि गाय के गोबर का कालीन चरक ऋषि की चरक चटाई है। इसका वर्णन शास्त्रों में भी है। हमने वैसा ही बनाने का प्रयास किया है। पूर्व राज्यपाल अनुसुइया उइके भी गौशाला कामधेनु माता के दर्शन के लिए 5 बार खैरागढ़ आ चुकी हैं। 10 देशों के प्रतिनिधि, आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज और जगन्नाथ पुरी के जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी निखिलानंद सरस्वती भी गौशाला पहुंचे हैं।
'पांच साल से चटाई बनाने की कोशिश कर रहा था'
गौशाला संचालक अखिल पदम डाकलिया ने बताया कि यह चटाई पूरी तरह से गौमूत्र और सौम्या कामधेनु गाय के गोबर से बनी है। पांच साल से इसे बनाने की कोशिश कर रहे थे। हमने यह चटाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए तैयार की है। इससे पहले हम गौशाला में गाय के गोबर से दीपक, राखी, कंगन और गणपति जी भी बनाते हैं। राज्यपाल अनुसुइया उइके ने पीएम मोदी को गाय के गोबर से बनी राखी बांधी है।
'प्लास्टिक मानव समाज का दुश्मन है'
अखिल पदम ने साधारण और गोबर की चटाई के बीच अंतर बताते हुए कहा कि प्लास्टिक मानव समाज का दुश्मन है। अब हम पुराने समय में लौट रहे हैं। गाय के अंदर देवी लक्ष्मी का वास होता है। हम बहुत करीब से काम कर रहे हैं। हम मानव स्वास्थ्य के अच्छे प्रचार के लिए काम कर रहे हैं। इस चटाई में स्वास्थ्य के देवता निवास करते हैं। इससे कई बीमारियां भी दूर हो जाएंगी।
गोबर की चटाई बनाने की विधि
अखिल पदम डाकलिया ने बताया कि यह चटाई पूरी तरह से 'चरक ऋषि की पद्धति के अनुसार' हाथ से बनाई गई है। सबसे पहले सुबह 7 बजे गाय के गोबर को 14 दिन तक धूप दिखाना है। यह कामधेनु के गोबर से ही बनाया जाता है। फिर गोबर गोंद की तरह रसीला और चिपचिपा निकलता है। इसके बाद गाय के गोबर से पतले आकार के बट बनाए जाते हैं।
स्लिम बट्स बनाने की कोशिश में 90 प्रतिशत मामलों में टूट-फूट होती है। केवल 10 प्रतिशत बिट्स से ही मैट बनाए जाते हैं। चटाई में सिर्फ गाय के गोबर, गोमूत्र और नायलॉन की रस्सी का इस्तेमाल किया गया है। उन्होंने बताया कि कोलकाता के कारीगरों और गौशाला के कर्मचारियों ने मिलकर काम किया है।
Video देखें
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Read more- Landmines, Tanks, Ruins: The Afghanistan Taliban Left Behind in 2001 29 IAS-IPS
इसे बनाने वाले कारीगरों का कहना है कि गाय के गोबर का कालीन चरक ऋषि की चरक चटाई है। इसका वर्णन शास्त्रों में भी है। हमने वैसा ही बनाने का प्रयास किया है। पूर्व राज्यपाल अनुसुइया उइके भी गौशाला कामधेनु माता के दर्शन के लिए 5 बार खैरागढ़ आ चुकी हैं। 10 देशों के प्रतिनिधि, आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज और जगन्नाथ पुरी के जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी निखिलानंद सरस्वती भी गौशाला पहुंचे हैं।
'पांच साल से चटाई बनाने की कोशिश कर रहा था'
गौशाला संचालक अखिल पदम डाकलिया ने बताया कि यह चटाई पूरी तरह से गौमूत्र और सौम्या कामधेनु गाय के गोबर से बनी है। पांच साल से इसे बनाने की कोशिश कर रहे थे। हमने यह चटाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए तैयार की है। इससे पहले हम गौशाला में गाय के गोबर से दीपक, राखी, कंगन और गणपति जी भी बनाते हैं। राज्यपाल अनुसुइया उइके ने पीएम मोदी को गाय के गोबर से बनी राखी बांधी है।
'प्लास्टिक मानव समाज का दुश्मन है'
अखिल पदम ने साधारण और गोबर की चटाई के बीच अंतर बताते हुए कहा कि प्लास्टिक मानव समाज का दुश्मन है। अब हम पुराने समय में लौट रहे हैं। गाय के अंदर देवी लक्ष्मी का वास होता है। हम बहुत करीब से काम कर रहे हैं। हम मानव स्वास्थ्य के अच्छे प्रचार के लिए काम कर रहे हैं। इस चटाई में स्वास्थ्य के देवता निवास करते हैं। इससे कई बीमारियां भी दूर हो जाएंगी।
गोबर की चटाई बनाने की विधि
अखिल पदम डाकलिया ने बताया कि यह चटाई पूरी तरह से 'चरक ऋषि की पद्धति के अनुसार' हाथ से बनाई गई है। सबसे पहले सुबह 7 बजे गाय के गोबर को 14 दिन तक धूप दिखाना है। यह कामधेनु के गोबर से ही बनाया जाता है। फिर गोबर गोंद की तरह रसीला और चिपचिपा निकलता है। इसके बाद गाय के गोबर से पतले आकार के बट बनाए जाते हैं।
स्लिम बट्स बनाने की कोशिश में 90 प्रतिशत मामलों में टूट-फूट होती है। केवल 10 प्रतिशत बिट्स से ही मैट बनाए जाते हैं। चटाई में सिर्फ गाय के गोबर, गोमूत्र और नायलॉन की रस्सी का इस्तेमाल किया गया है। उन्होंने बताया कि कोलकाता के कारीगरों और गौशाला के कर्मचारियों ने मिलकर काम किया है।
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