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: संभागीय आदेश से बच्चों की पढ़ाई पर ताला ? गरियाबंद में शिक्षकों की सुनवाई में नियम से ज्यादा राजनीति हावी, सैंकड़ों बच्चा का भविष्य खतरे में, खिलवाड़ या मिलीभगत ?

MP CG Times / Tue, Sep 16, 2025

गिरीश जगत, गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद ज़िले में युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया की भारी गड़बड़ी उजागर हो गई है। संभाग स्तरीय सुनवाई समिति ने जिला स्तर की प्रक्रिया को त्रुटिपूर्ण बताते हुए फिंगेश्वर से देवभोग भेजे गए ई संवर्ग के 38 सहायक शिक्षकों की वापसी कर दी है। आदेश जारी होते ही ज्यादातर शिक्षकों ने देवभोग से रिलीविंग ले ली, जिससे कई स्कूलों में शिक्षक संकट और गहरा गया है। अब 2 स्कूल पूरी तरह शिक्षक विहीन और 8 स्कूल एकल शिक्षक आधारित हो गए हैं, जिससे 600 से ज्यादा बच्चों का भविष्य दांव पर लग गया है।

विधायक जनक ध्रुव का तीखा हमला

क्षेत्रीय विधायक जनक ध्रुव ने मामले पर कड़ी नाराज़गी जताई है। उन्होंने कहा – “शीतकालीन सत्र में मैं विधानसभा में सरकार से सीधा सवाल करूंगा कि गलती किसकी है? जिला स्तर पर नियमों की अनदेखी हुई या संभाग स्तर पर मिलीभगत हुई। सैकड़ों छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों को जवाब देना होगा।” विधायक ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते छात्रों के साथ हुए अन्याय की भरपाई नहीं हुई तो वे आंदोलन करने से पीछे नहीं हटेंगे।

समिति ने ठहराया जिला स्तर की प्रक्रिया को गलत

संभाग स्तरीय सुनवाई समिति ने स्पष्ट कहा कि जिला स्तर पर काउंसलिंग क्रम निर्धारण और प्रक्रिया में खामियां थीं। शिक्षकों ने वरिष्ठता, दूरी और स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर आपत्ति दर्ज की थी। कुल 38 शिक्षकों में से 33 महिलाएं थीं। सुनवाई के बाद समिति ने उनके पक्ष को सही माना और जिला स्तर की कार्रवाई को गलत ठहराते हुए आदेश जारी कर दिए।

कोर्ट से लेकर संभाग तक मामला उलझा

जिले में ई संवर्ग के फिंगेश्वर और देवभोग ब्लॉक के बीच 200 किमी की दूरी है। पहले जिला प्रशासन ने नियमों का हवाला देकर कोर्ट में जवाब दिया था, जिसे कोर्ट ने स्वीकार भी कर लिया। लेकिन जब मामला संभाग स्तर पर पहुंचा तो समीकरण बदल गए। आरोप है कि संयुक्त संचालक दफ्तर में सुनवाई के नाम पर “व्यक्तिगत पेशी” और “सुविधा” को नियमों से ज्यादा महत्व दिया गया। समिति ने शिक्षकों के तर्कों को मानकर जिला प्रशासन की पूरी प्रक्रिया को खारिज कर दिया।

महिला शिक्षकों को दूरी का हवाला देकर लौटाया

अभ्यावेदन देने वाले शिक्षकों का कहना है कि जिले के ई संवर्ग में 81 पद रिक्त और 171 शिक्षक अतिशेष में थे, जिनमें 75 महिलाएं और 95 पुरुष शामिल थे। लेकिन काउंसलिंग में महिलाओं को प्राथमिकता नहीं दी गई। वरिष्ठ महिला शिक्षकों को भी 200 किमी दूर देवभोग भेजा गया। सुनवाई समिति ने इन्हीं बिंदुओं को सही मानकर जिला प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया।

शिक्षा विभाग ने मानी कमी, मांगा शासन से मार्गदर्शन

देवभोग के बीईओ देवनाथ बघेल ने स्वीकार किया कि अब ब्लॉक में शिक्षक संकट गहरा गया है। 38 में से 18 शिक्षकों ने ज्वाइन ही नहीं किया था और बाकी 20 नए आदेश के बाद रिलीव हो गए। जिला शिक्षा अधिकारी जगजीत सिंह धीर ने कहा – “चूंकि यह संभाग स्तरीय समिति का विधिवत आदेश है, इसलिए उसका पालन किया गया। अब अतिशेष और प्रभावित स्कूलों के संबंध में शासन से मार्गदर्शन लिया जाएगा।”

अब सवाल यह है कि आखिरकार नीति की व्याख्या में जिला और संभाग स्तर पर इतना अंतर क्यों आया? क्या यह महज अफसरशाही की गलती थी या फिर किसी सोची-समझी मिलीभगत का नतीजा? इसका जवाब सरकार को विधानसभा में देना ही होगा।

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