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: कदमों पर पड़ा अन्नदाता, ठहाके मारते रहे SDM: पुश्तैनी ज़मीन पर कब्जा, न्याय के लिए घुटनों पर किसान, ऐसे 394 केस लटके, गरियाबंद में ये कैसा सुशासन तिहार ?

कदमों पर पड़ा अन्नदाता, ठहाके मारते रहे SDM: पुश्तैनी ज़मीन पर कब्जा, न्याय के लिए घुटनों पर किसान, ऐसे 394 केस लटके, गरियाबंद में ये कैसा सुशासन तिहार ?

गरियाबंद | देवभोग | गिरीश जगत की रिपोर्ट

छत्तीसगढ़ सरकार के बहुप्रचारित सुशासन तिहार का आख़िरी दिन था। मंच सजा था, माइक सेट था, अफसर कुर्सियों पर आराम से विराजमान थे। लेकिन तभी कुछ ऐसा हुआ, जिसने इस ‘सुशासन तिहार’ के मुखौटे को पल भर में उतार फेंका। ये वो लम्हा था जब एक ज़मीन का बेटा, अपनी ज़मीन के लिए ज़मीन पर गिर पड़ा था, और प्रशासन का अहंकार मंच पर अट्टहास कर रहा था।

देवभोग विकासखंड के निष्ठीगुड़ा में आयोजित समाधान शिविर के अंतिम दिन, लाटापारा का किसान अशोक कुमार कश्यप मंच पर आया... लेकिन हाथ जोड़कर नहीं, सिर झुकाकर नहीं, बल्कि पूरा का पूरा साष्टांग दंडवत हो गया। उसका स्वर कांप रहा था—“साहब, बंटवारा करा दो… अब तो जीना मुश्किल हो गया है!”

और जवाब में? एसडीएम तुलसी दास के चेहरे पर एक ठंडी, खिलखिलाती हँसी थी, जैसे किसान का दर्द मनोरंजन हो। अफसरों की इस बेरुखी पर न तो कोई सवाल उठा, न कोई संवेदना दिखी।

देखिए ये दंडवत होने का वीडियो


क्यों दंडवत पड़ा था किसान?

अशोक की पुश्तैनी जमीन — 4.28 एकड़, कागज़ों में उसी के नाम है। लेकिन असल में उस पर उसका बड़ा भाई कब्जा जमाए बैठा है। अशोक ने साल भर पहले ही खाता विभाजन के लिए आवेदन दिया था। तब से अब तक हर समाधान शिविर में अपनी अर्जी लेकर चक्कर काट रहा है।

हर बार एक ही उत्तर— “देखते हैं, निराकरण करेंगे…” इस बार तो उम्मीद भी नहीं थी, बस गिड़गिड़ाने का आखिरी साहस था। एसडीएम का जवाब सुनिए— “मौके पर कब्जा दिलाया था, पर दूसरा पक्ष फिर काबिज हो गया। अब स्थाई हल निकालेंगे।”

लेकिन कब?
जब किसान की हड्डियाँ थक जाएँगी? जब वो फिर से सड़क पर गिरकर मरेगा?


ये सिर्फ अशोक की नहीं, पूरे देवभोग की कहानी है

देवभोग तहसील में 93 राजस्व ग्राम हैं, और इन ग्रामों में 394 राजस्व मामले लंबित हैं।

  • नायब तहसीलदार न्यायालय: 129 मामले
  • तहसीलदार न्यायालय: 185 मामले
  • एसडीएम न्यायालय: 80 मामले

इनमें सीमांकन के 104, क्षतिपूर्ति के 72 और खाता विभाजन के 31 मामले शामिल हैं। जिला राजस्व मामलों के निपटारे में पूरे राज्य में चौथे नंबर पर है — यह स्थिति शर्मनाक है, क्योंकि लंबित मामलों की वजह से किसान रोज खेत नहीं, कोर्ट-तहसील के फेरे काट रहा है।


सिस्टम की जड़ से बीमारी – पटवारी नहीं, आरआई नहीं, नायब तहसीलदार तक गायब

देवभोग में 3 आरआई सर्कल होने के बावजूद सिर्फ 1 आरआई पदस्थ है। 27 हल्कों में केवल 14 पटवारी कार्यरत हैं — मतलब आधे हल्के बिना निगरानी के पड़े हैं। नायब तहसीलदार का पद भी रिक्त है। एक एसडीएम, एक तहसीलदार और फिर भगवान भरोसे पूरा राजस्व अमला!


बंदोबस्त की गड़बड़ियां – 1991 से अब तक सुधार नहीं

तहसीलदार चितेश देवांगन खुद मानते हैं—“अशोक के नाम सिर्फ 2 एकड़ ही दर्ज है, बाकी पुराने रिकॉर्ड के अनुसार है।”
देवभोग में 1991 के बंदोबस्त के बाद सुधार नहीं हुआ, जिसके चलते हर साल बोनी के समय जमीन विवाद के 20 से ज्यादा मामले थाने और तहसील तक पहुंचते हैं। बंदोबस्त सुधार के 13 मामले अभी भी लंबित हैं।


तो क्या ये ही है सुशासन तिहार का चेहरा?

जब मंच पर किसान रोए, ज़मीन पर लोट जाए, और अफसर ठहाके लगाएं — तो समझिए, विकास नहीं, व्यवस्था पर ताला लग चुका है। जब आवेदन साल भर घिसते रहे और हल नहीं निकले — तो समझिए, शासन की जड़ में सड़न पहुंच चुकी है।और जब एक साष्टांग किसान का दर्द भी किसी अफसर की संवेदना नहीं जगा पाए — तो फिर यह शिविर, यह तिहार, यह अभियान किसके लिए?


ये खबर नहीं, एक दस्तावेज़ है उस बेबसी का… जो देश की खाद उगाने वाला किसान आज मंच पर नंगे पांव लोटकर बया कर रहा है — और जवाब में सिर्फ हँसी मिल रही है।


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