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गरियाबंद में किसने लिखी करोड़ों के घोटाले की स्क्रिप्ट ? : 116 स्कूलों से टॉयलेट गायब, 513 चपरासियों की भर्ती, 4 करोड़ के कर्ज में विभाग, कलेक्टर बोले- जो हो गया, सो हो गया

गिरीश जगत, गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में आदिवासी विकास विभाग की तीन बड़ी योजनाओं में करोड़ों रुपए की गड़बड़ियां सामने आई हैं। स्कूल जतन योजना के तहत 2.88 करोड़ रुपए एडवांस लेने के बाद 23 स्कूलों के निर्माण कार्य अधूरे छोड़ दिए गए। वहीं, 116 स्कूलों में शौचालय निर्माण के लिए 61 लाख रुपए एडवांस लेने वाली कंपनी 10 महीने में सिर्फ 23 शौचालय ही बना सकी। दूसरी ओर, स्वीकृत पदों से ज्यादा चपरासियों की नियुक्ति के कारण विभाग पर 3.84 करोड़ रुपए के बकाया वेतन का बोझ भी आ गया है।

गरियाबंद जिला प्रशासन इन मामलों में अब ठेकेदारों से वसूली, एफआईआर और कार्रवाई की बात कर रहा है। गरियाबंद कलेक्टर भगवान सिंह उईके ने माना कि अधिकांश काम अधूरे हैं और कहा कि संबंधित ठेकेदारों को नोटिस जारी कर दिए गए हैं। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कुछ गड़बड़ियां उनके कार्यकाल में भी हुईं और कुछ पहले की हैं। कलेक्टर ने कहा- "अब क्या करें, जो हो गया सो हो गया... अब उसे ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं।"

डेढ़ साल में कई योजनाओं का बंटाधार

पिछले करीब डेढ़ साल में गरियाबंद जिले में सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। आरोप है कि आदिवासी विकास विभाग को कई योजनाओं की जिम्मेदारी देने के बाद उनका सही क्रियान्वयन नहीं हुआ। जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि कामों के आवंटन में बंदरबांट हुई, लेकिन जब निर्माण और क्रियान्वयन की बारी आई तो अब जांच और नोटिस तक ही कार्रवाई सीमित है।

केस-1: स्कूल जतन योजना में 2.88 करोड़ लेकर काम अधूरा छोड़ा

स्कूल जतन योजना के तहत जिले में 830 स्कूलों के निर्माण और मरम्मत कार्य ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (RES) को दिए गए थे, जिन्हें पूरा कर लिया गया। वहीं आदिवासी विकास विभाग के हिस्से आए 165 कार्यों में अब भी 50 से ज्यादा अधूरे पड़े हैं।

इनमें 24 ऐसे कार्य हैं, जिनके लिए महासमुंद की मेसर्स सुनील कंस्ट्रक्शन, कोरबा के अजय कुमार राठौर और जयनारायण यादव की फर्म को एडवांस राशि दी गई, लेकिन निर्माण कार्य पूरा नहीं हुआ। इन मामलों में कुल 2.88 करोड़ रुपए की वसूली होनी है।

विभाग ने 6 जुलाई को संबंधित ठेकेदारों को नोटिस जारी कर सात दिन के भीतर राशि लौटाने के निर्देश दिए हैं। ऐसा नहीं करने पर एफआईआर दर्ज कराने की चेतावनी भी दी गई है।

जिला पंचायत की शिक्षा समिति के तत्कालीन अध्यक्ष संजय नेताम ने आरोप लगाया कि स्थानीय ठेकेदारों को नजरअंदाज कर बाहरी ठेकेदारों को कथित तौर पर मोटे कमीशन के बदले काम दिया गया, जिसका नुकसान अब स्कूली बच्चों को उठाना पड़ रहा है।

केस-2: 61 लाख एडवांस, 10 महीने में सिर्फ 23 शौचालय बने

जिले के 116 स्कूलों में शौचालय निर्माण के लिए शिक्षा विभाग को एक करोड़ रुपए की मंजूरी मिली थी। कलेक्टर ने इस काम की निर्माण एजेंसी आदिवासी विकास विभाग को बनाया।

विभाग ने टेंडर प्रक्रिया पूरी कर दुर्ग की कंचन कंस्ट्रक्शन को पांचों ब्लॉक में शौचालय निर्माण का ठेका दिया और 61 लाख रुपए एडवांस जारी कर दिए।

स्थानीय स्तर पर इस निर्णय का विरोध भी हुआ। आरोप लगे कि ब्लॉकवार पंचायतों या स्थानीय एजेंसियों को काम देने के बजाय एक ही कंपनी को पूरा ठेका दिया गया। मिलीभगत के आरोप भी लगे।

आरोपों के बीच ठेका कंपनी 10 महीने में सिर्फ 23 शौचालय ही बना सकी। इसके बाद अप्रैल में कलेक्टर ने 36 लाख रुपए की अंतर राशि की वसूली के लिए पत्र जारी किया, लेकिन कंपनी ने अब तक राशि जमा नहीं की।

जिला पंचायत निर्माण समिति के सभापति का आरोप है कि ठेकेदार जिले के एक प्रभावशाली अधिकारी का करीबी है, इसलिए नोटिस जारी करना केवल औपचारिकता बनकर रह गया। उनका कहना है कि प्रशासन चाहता तो अब तक कंपनी को ब्लैकलिस्ट कर सकता था।

केस-3: मंजूर पद 255, नियुक्त कर दिए 513 चपरासी

आदिवासी विकास विभाग ने जिले की 79 आश्रम-शालाओं में स्वीकृत पदों से कहीं ज्यादा चपरासियों की नियुक्ति कर दी। आरोप है कि नेताओं और बड़े अधिकारियों की सिफारिश पर मौखिक आदेशों से नियुक्तियां की गईं। शिकायतों के मुताबिक कुछ नियुक्तियां दलालों के जरिए पैसे लेकर की गईं, जबकि कुछ में जनप्रतिनिधियों की भी भूमिका रही।

स्थिति यह हुई कि जहां केवल 255 पद स्वीकृत थे, वहां चपरासियों की संख्या बढ़कर 513 पहुंच गई। शासन से सिर्फ स्वीकृत पदों के हिसाब से ही राशि मिलती रही, इसलिए कर्मचारियों को रोटेशन के आधार पर वेतन दिया जाता रहा।

बाद में वित्तीय बोझ बढ़ने पर दिसंबर 2025 में अतिरिक्त नियुक्त कर्मचारियों को हटा दिया गया। इसके बाद ये कर्मचारी अब तक सात बार से ज्यादा धरना-प्रदर्शन कर चुके हैं।

मार्च 2026 में लंबित वेतन के लिए भेजे गए मांग पत्र में 3.84 करोड़ रुपए के भुगतान की मांग की गई। पांच दिन पहले इसी मांग का हवाला देकर कर्मचारियों का प्रस्तावित अनिश्चितकालीन आंदोलन टाल दिया गया। हालांकि सहायक आयुक्त लोकेश्वर पटेल का कहना है कि जब तक शासन से आवंटन नहीं मिलेगा, तब तक भुगतान संभव नहीं है।

भगवान सिंह उईके कलेक्टर गरियाबंद से सीधी बात

सवाल: आदिवासी विकास विभाग से कराए गए ज्यादातर काम अधूरे हैं?

जवाब: हां, कई काम अधूरे हैं। उनका भौतिक सत्यापन कराया गया है। अंतर की राशि की वसूली के लिए संबंधित ठेकेदारों को नोटिस भेजे गए हैं। जिन जिलों में ठेकेदार रहते हैं, वहां आरआरसी (राजस्व वसूली प्रमाणपत्र) के प्रकरण दर्ज कराए जाएंगे, ताकि उनकी संपत्ति कुर्क कर राशि की वसूली की जा सके।

सवाल: कलेक्टर की मंजूरी के बिना काम आवंटित नहीं हो सकता। फिर गलती किसकी है?

जवाब: कुछ काम पहले के हैं और कुछ मेरे कार्यकाल के हैं। तत्कालीन सहायक आयुक्त नवीन भगत के कार्यकाल में ये गड़बड़ियां हुई हैं। पूरे मामले की जांच कर शासन को रिपोर्ट भेजी जा रही है।

सवाल: क्या फैसले लेने में दूरदर्शिता की कमी रही?

जवाब: अब क्या करें... जो हो गया, सो हो गया। उसे ठीक करने की कोशिश जारी है।

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