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: कौन निगल गया किसान का 8 लाख ? गरियाबंद में सहकारी बैंक से नहीं मिला 255 क्विंटल धान का पैसा, 48 लाख का झोलझाल, बैंककर्मी 1 लाख में करा रहे रफादफा

कौन निगल गया किसान का 8 लाख ? गरियाबंद में सहकारी बैंक से नहीं मिला 255 क्विंटल धान का पैसा, 48 लाख का झोलझाल, बैंककर्मी 1 लाख में करा रहे रफादफा

गरियाबंद से गिरीश जगत की रिपोर्ट...

गरियाबंद जिले के दिवानमूड़ा की धरती पर उगी फसल ने अन्नदाता खेमा पांडे के चेहरे पर उम्मीद जगाई, लेकिन तीन महीने बाद वह बैंक की ठगी और शाखाओं की मिलीभगत का शिकार बनकर खाली बाजार लौट आया। 31 जनवरी को समर्थन मूल्य पर 255.20 क्विंटल धान बेचने का खर्चा उसने साल में महीनों के मोल-भाव पर झोला भर कर कमाया था, पर देवभोग सहकारी बैंक में जमा हुए 7.91 लाख रुपये की हकीकत कुछ और निकली।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, रकम तो जमा हुई थी, लेकिन गोहरापदर शाखा के ताबड़तोड़ फर्जी हस्ताक्षर और देवभोग शाखा के चुप्पी के चलते नकद इंटर-ब्रांच विदड्रॉल में उड़ चुकी। पीड़ित किसान के लिखित शिकायती पत्रों और बैंक की आंतरिक रिपोर्ट में फर्जीवाड़े की पुष्टि हो चुकी, लेकिन सहकारिता विभाग ने कलेक्टर के निर्देशों और सुशासन तिहार की अपील के बावजूद जांच शुरू नहीं की। अब किसानों की कोख में उगने वाला विश्वास दम तोड़ता दिख रहा है, जहां निगाह-ए-न्याय तक पहुंचने के लिए बिजली की रफ्तार से काम करने वाली मशीनरी तीन महीनों से धूल छांट रही है।

किसानों की कराह- धान बेचकर घर चलाना मुश्किल

खेमा पांडे जैसे दर्जनों किसान अपने खेतों के ऋण से पहले ही जूझ रहे थे। 15 एकड़ जमीन पर उगाई गई फसल का पैसा उनके लिए सिर्फ नहीं बचत, बल्कि बच्‍चे पढ़ाने, बीमार माँ-बहन का इलाज और ऋण चुकाने का सहारा था। पर अब 1.57 लाख का पिछला कर्ज़ भी अदा नहीं हो पाया। बैंक का पैसा छिन जाने के बाद नया उधार लेना संभव नहीं, परिवार भूख-प्यास और तनाव की कगार पर आ गया।


कौन ‘निगल’ गया 7.91 लाख? फर्जीवाड़े की खुली पोल

  • देवभोग ब्रांच में 29 अप्रैल को लिखित शिकायत के बाद ही बैंक ने 9 अप्रैल को केस दर्ज किया।
  • चार ट्रांजेक्शन (14–28 फरवरी) में ₹7,91,000 गोहरा-पदर शाखा से निकाले गए।
  • शाखा रिपोर्ट में हस्ताक्षर किसान के स्पेसिमेट से मेल नहीं खाते थे, पर हेड ऑफिस ने जिम्मेदारी तय करने की जहमत नहीं उठाई।
  • गोहरा-पदर के कर्मी तो 1.5 लाख में मामला रफा-दफा करने की भी पैरवी करने लगे।

प्रशासन की लुटी सहानुभूति, जांच की जा रही खरीद-फरोख्त

  • 29 अप्रैल को किसान ने कलेक्टर जनदर्शन में गुहार लगाई।
  • कलेक्टर भगवान सिंह उईके ने जिला सहकारी उपपंजीयक को ठोस कार्रवाई का निर्देश दिया, मगर सहकारिता विभाग ने तीन महीने तक जांच टीम तक गठित नहीं की।
  • सुशासन तिहार के हाथ पकड़े जाने पर ही बैंक ने 28 मई को एक अफसर भेजकर जांच शुरू कर दी—लेकिन चिकनी भाषा और लंबित रिपोर्ट ने किसान की बेचैनी कम नहीं की।

मिलावट का जाल—केवल खेमा का नहीं, 42 लाख का आंकड़ा

गोहरा-पदर शाखा में खेमा के अलावा कम से कम छह और खाताधारकों के करीब ₹42 लाख फर्जी ट्रांजेक्शन में गायब हुए।

  • कांडेकेला की नमिता का ₹90,000 का लोन खाता सूना।
  • माहुलकोट के यशवंत मांझी के ₹8,000 उड़ाए गए।
  • ये कांड इतने गुपचुप दबाये गए कि शिकायत पर भी कोई FIR दर्ज नहीं हुई।

‘टोकन कार्रवाई’ या सच्ची न्याय की चाह

  • 16 अप्रैल को जिला बैंक के CEO ने देवभोग के मैनेजर नयन सिंह ठाकुर को हटाकर दूसरी शाखा सौंपा, क्लर्क सुरेश साहू व एकाउंटेंट दीपराज मसीह को निलंबित किया—पर कानूनी मुकदमा दर्ज कराने की बजाए मामला वहीं ठहर-सा गया।

जानिए क्या बोले अधिकारी ?

  • नोडल अधिकारी शिवेश मिश्रा का मोबाइल कॉल तक रिसीव ना करना बताता है बैंकों-प्रशासन की बैरियर्स कितना ऊँचा खड़ा है।
  • उपपंजीयक महेश्वरी तिवारी कहती हैं कि “ऑडिट टीम गठित है, रिपोर्ट अभी आनी बाकी है।”

‘नज़राने’ में फंस जाते हैं किसान !

जब सहकारी बैंक मिलीभगत का अड्डा बन जाए और विभागीय जांच खरीद-फरोख्त की वजह से लंबित रहे, तो छोटे किसान बड़ी ताकतों के ‘नज़राने’ में फंस जाते हैं। खेमा पांडे जैसे अन्नदाता अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हुए दfख रहे हैं कि न्याय पाने की राह क्यों दफ्तरों के कबाड़खाने से होकर गुज़रती है।

अब सवाल यह है—क्या किसान की छीन ली गई 7.91 लाख का हिसाब सिस्टम से लिया जाएगा, या न्याय की खानापूर्ति वार्तालापों के खोलों में दबकर रह जाएगी?

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