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‘नक्सलगढ़’ में जली शिक्षा की जोत: गोलियां की तड़तड़ाहट की जगह गूंज रही स्कूलों की घंटी, 16 साल बाद हजारों बच्चों के हाथों में कलम-कॉपी और किताब

बीजापुर । 16 साल से शिक्षा से वंचित सैकड़ों गांवों में स्कूलों की घंटियां बजते ही बच्चों के आने से फिर से रौनक लौट आई है. जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग के प्रयासों से दुर्गम और अतिसंवेदनशील गोरना, पेदाजोजेर, कमकानार, पुसनार, मेटापाल, पालनार, मल्लूर सहित 150 स्कूलों के 16 साल बाद खोले जाने से 5800 बच्चों को शिक्षा के अधिकार से जोड़ने में कामयाबी मिली है.

यह कामयाबी नक्सली इलाकों में एक बड़े बदलाव की शुरूआत है, जिसके जरिये शिक्षा के बुनियादी अधिकार से वंचित बच्चों को नयी दिशा मिलेगी. वहीं ग्रामीणों को मुख्य धारा में लाने की शासन की मुहिम कामयाब हो रही है.

2005 में नक्सलियों के खिलाफ सलवा-जुडू़म अभियान और नक्सली आतंक के चलते बीजापुर के 200 से ज्यादा स्कूल दहशत के साये में बंद हो गये. इन गांवों में स्कूलों के साथ-साथ शासन की सारी योजनाएं भी ठप हो गई थी. इन इलाकों के ग्रामीण माओवादियों के जनताना सरकार के प्रभाव में शासन के सारी योजनाओं और अधिकार से वंचित हो गए थे.

इन हालातों के बीच छत्तीसगढ़ में सरकार बदलने के साथ माओवाद प्रभावित इलाकों में ग्रामीणों के विश्वास जीतने और मुख्यधारा में लाने की कवायद शुरू हुई और एक सकारात्मक माहौल बनाने का प्रयास किया गया. इन इलाकों में मैदानी कर्मचारियों के जरिये पढ़े-लिखे युवाओं और ग्रामीणों से संवाद स्थापित कर बच्चों के भविष्य को पटरी पर लाने की मुहिम शुरू की गई.

कई दौर की बात-चीत और प्रयासों के बाद ग्रामीण स्कूलों को फिर से शुरू करने पर राजी हुये, जिसके बाद जिला प्रशासन ने स्कूल शुरू करने की मुहिम को अमलीजामा पहनाया.

इन इलाकों में स्कूल खोलना एक चुनौती भरे सफर से कम नहीं रहा है. दुर्गम इलाके, नदी-नाले, पहाड़ों की बांधाओं और माओवादी प्रभाव के बीच इन इलाकों में पहुंच पाना आम तैार पर आसान नहीं है. बारूदी रास्ते और माओवादियों की दहशत किसी भी इंसान के कदम यहां जाने से रोक देती है. इन हालातों में इन चुनौतियों के बीच ग्रामीणों से बात कर सकारात्मक माहौल पैदा कर अविश्वास की खाई को दूर किया गया, जिसके बाद शिक्षा के अधिकार से वंचित हजारों बच्चों के सुनहरे भविष्य की राह आसान हो पाई.

ग्रामीणों की सहमति के बाद जिला प्रशासन ने डी.एम.एफ. मद से स्थानीय पढे़-लिखे युवाओं को ज्ञान-दूत के रूप में 10 हजार रूपये के मानदेय पर नियुक्त किया और बच्चों के बैठने हेतु एक शेड निर्माण की मंजूरी दी. शिक्षा विभाग ने बच्चों के लिए बुनियादी सुविधाएँ- कापी, कलम, किताब, डेªस और मध्यान्ह भोजन की जरूरतो को पूरा किया.

इस कवायद के बाद माओवाद प्रभावित इलाकों में तेजी से सकारात्मक बदलाव दिखने लगा है, जिसके चलते साल भर के भीतर अंदरूनी और पहुंचविहीन इलाकों में दहशत की दीवारों को जोड़ते हुये 150 स्कूल खुल गये. अब ये ईलाके शासन के मुख्यधारा से जुड़कर शांति और विकास की दिशा में नया अध्याय लिखने में महत्वपूर्ण कड़ी बन रही है.

16 साल बाद बजने वाली स्कूल की घंटियां बारूद के धमाकों की दहशत को दूर कर एक सुनहरे भविष्य की तस्वीर को स्थापित कर रही है. कलेक्टर रितेश अग्रवाल का कहना है कि प्रशासन अंदुरुनी क्षेत्रों के स्कूलों को खोलने आगे भी प्रयास करेगा, जो स्कूल खुल गए हैं, वहां हर उचित व्यवस्था की जाएगी. जहां संभव होगा, वहां स्कूल भवन भी बनाये जाएंगे. आदिवासी छात्रों को प्रशासन हर सुविधा मुहैया कराई जाएगी.

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